खेती से लें लाभ, करें ये काम

खेती को फायदे का सौदा बनाने के लिए अनेक सहयोगी काम हैं, जिन्हें अपना कर खेती को कहीं अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है. इस में पशुपालन, मधुमक्खीपालन, वर्मी कंपोस्ट बनाना, फलसब्जियों की प्रोसैसिंग करना आदि अनेक काम हैं. इस तरह के कामों में से कोई भी काम किसान खेती के साथसाथ कर सकता है. इस तरह के कामों के लिए समयसमय पर अनेक कृषि संस्थानों आदि द्वारा फ्री में ट्रेनिंग भी दी जाती है, जो काफी कम समय की भी होती है. वहां से ट्रेनिंग ले कर आप अपने काम को आसानी से अंजाम दे कर खेती को कहीं अधिक लाभकारी बना सकते हैं.

सहायक कृषि गतिविधियां

– दूध उत्पादन के लिए पशुपालन.
– मांस के लिए बकरीपालन.
– मांस और ऊन के लिए भेड़पालन.
– मांस के लिए मुरगी और बतखबटेरपालन.
– अंडे के लिए मुरगीबतखपालन.
– मधुमक्खीपालन.
– मछलीपालन.
– मशरूम उत्पादन.
– वर्मी कंपोस्ट उत्पादन.
– जैविक खेती.
– सब्जी फसलों का उत्पादन.
– पुष्प फसलों का उत्पादन.
– फलफसलों का उत्पादन.
– औषधीय फसलों का उत्पादन.
– सुगंधित फसलों का उत्पादन.

ProcessingFlower

 

मूल्य संवर्धन के लिए कृषि एवं उद्यानिकी फसलों को निम्न फसल समूहों में बांटा जा सकता है:

1. अनाज: गेहूं, जौ एवं चावल (आटा, दलिया, पोहा).
2. मोटा अनाज: जई, मक्का, ज्वार, रागी, सावां, कोदो, कुटकी आदि (आटा, दलिया).
3. दलहन: चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, मोठ, चंवला, कुल्थ, राजमा आदि (दाल).
4. तिलहन: सोयाबीन, मूंगफली, सरसों, अलसी, तिल, रामतिल, कुसुम, सूरजमुखी, अरंडी, तारामीरा आदि (सोया मिल्क, तेल).
5. रेशेवाली: कपास, सन, जूट आदि.
6. शर्करा फसलें: गन्ना, चुकंदर, मीठी ज्वार आदि (गन्ने से गुड़).
7. फल: आम, केला, पपीता, चीकू, अमरूद, नीबू, संतरा, मोसम्मी, अंगूर, अनार, बेर, आवंला, जामुन, करोंदा, कटहल, किन्नू, सीताफल आदि (ग्रेडिंग, कोल्ड स्टोरेज, निर्यात, फूड प्रोसैसिंग).
8. सब्जी: टमाटर, बेंगन, भिंडी, मिर्ची, शिमला मिर्च, कद्दू, तुरई, गिलकी, चिरचिडा, लौकी, करेला, ककड़ी, खीरा, तरबूज, खरबूजा, टिंडा, ग्वार, लोबिया, सेम, फ्रेंच बीन, मटर, गाजर, चुकंदर, मूली, अरबी, आलू, शलजम, शकरकंद, सूरन, फूलगोभी, पत्तागोभी, गांठगोभी, प्याज आदि (ग्रेडिंग, फूड प्रोसैसिंग).
9. फूल: गुलाब, गेंदा, रजनीगंधा, ट्यूबरोज आदि.
10. मसाले: अदरक, हलदी, धनिया, मेथी, जीरा, अजवाइन, सुआ, सौंफ, एनीसीड, कलौंजी, राई, लहसुन आदि (ग्रेडिंग, पाउडर बना कर).
11. औषधीय: सफेद मूसली, अश्वगंधा, कालमेघ, सनाय, स्टीविया, एलोवेरा, कोलियस, तुलसी, मुलेठी आदि.
12. सुगंधित: तुलसी, मेंथा, लेमनग्रास, सिट्रोनेला, खस, रोजमेरी, पामरोसा, पचोली आदि (तेल निकाल कर).
13. अन्य: पान.

अपने उत्पादन को सीधे मंडी में बेचने की अपेक्षा उस में मूल्य संवर्धन की संभावना तलाश कर गांव के लैवल पर ही रोजगार बढ़ाए जा सकते हैं. मूल्य संवर्धन विधियां अपना कर किसान अपनी फसल का मूल्य संवर्धन कर सकते हैं या अपनी रुचि के अनुसार फसल बदल कर अपनी आय को बढ़ा सकते हैं. मूल्य संवर्धन गतिविधियों के लिए किसान समूह बना कर अधिक तरक्की कर सकते हैं.

कृषि आय कैसे बढे ?

आय बढ़ाने के लिए 3 स्तरों पर काम करना होगा. पहला, लागत कम करना. दूसरा, उत्पादन बढ़ाना और तीसरा, जो उत्पादन किया है, उस का अधिक से अधिक मूल्य प्राप्त करना.

सभी किसान जानते हैं कि किसी भी फसल के उत्पादन के लिए बहुत सी चीजों की जरूरत होती है, जिन्हें हम इस तरह बांट सकते हैं, जैसे बाजार से खरीदी जाने वाली कई चीजें जैसे बीज, खाद व उर्वरक व पौध संरक्षण, स्वयं के संसाधन (ट्रैक्टर, मशीनरी, जैविक खाद, कृषि यंत्र आदि), लगने वाली इनसानी मेहनत और ऊर्जा (सिंचाई, खेत की तैयारी, फसल काल में निंदाईखुदाई, फसल में दवा का छिड़काव, फसल की कटाईगहाई) आदि.

कृषि उत्पादन में इन चीजों का इस्तेमाल किया जाना बेहद जरूरी है, परंतु सही समय पर, सही मात्रा में सही तरीके से इन चीजों का उपयोग कर के या इन का दुरुपयोग रोक कर फसल उत्पादन की लागत को कम किया जा सकता है. अनियंत्रित लागत किसान की फसल उत्पादन लागत को बढ़ाने के साथ ही मुनाफे को कम करती है. बहुत सी लागत को कुछ तरीके से कम किया जा सकता है.

1. बीज की लागत कम करने के लिए निम्न उपाय अपनाएं:
(अ) उन्नत किस्म का बीज प्रयोग करें.
(ब) स्वयं का बीज उत्पादन करें या समूह के माध्यम से बीज उत्पादन करें.
(स) बीज की सिफारिश की गई मात्रा का ही उपयोग करें. अधिक बीज दर से उत्पादन कम होता है.
(द) घर का बीज उपयोग करने पर बोआई से पहले अंकुरण परीक्षण अवश्य करें.

Seeds2. रासायनिक उर्वरकों की पूरी मात्रा कभी फसल को नहीं मिलती है. उर्वरक उपयोग दक्षता को बढ़ाने के लिए निम्न उपाय अपनाएं:
(अ) अपनी भूमि का मिट्टी परीक्षण करवाएं.
(ब) मिट्टी परीक्षण की सिफारिश के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करें.
(स) जैविक खाद एवं जीवाणु खाद का उपयोग अवश्य करें.
(द) खड़ी फसल में दिए जाने वाला यूरिया सल्फर या नीम लेपित हो या स्वयं नीम खली से लेपित यूरिया तैयार कर फसल को देवें.
(य) दूसरों को देख कर उर्वरकों का प्रयोग नहीं करें.
(र) संतुलित पोषण के लिए मिट्टी परीक्षण के आधार पर सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग करें.

3. सिंचाई की दक्षता बढ़ाने के लिए निम्न उपाय अपनाएं:
(अ) क्यारियां छोटी बनाएं.
(ब) स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई करें और पानी बचाएं.
(स) कृषि फसलों में भी ड्रिप सिंचाई विधि का सफल प्रयोग कर पानी की बचत करने के साथ उत्पादन भी बढ़ाया जा रहा है.
(द) सब्जी फसलों एवं दूरी पर लगाई गई फसलों में मल्च का उपयोग भी प्रभावी है.

4. पौध संरक्षण रसायनों का संतुलित उपयोग इस प्रकार करें:
(अ) पूरी जानकारी के बिना किसी भी रसायन का उपयोग न करें.
(ब) पौध संरक्षण रसायनों के साथ चिपकाने एवं फैलाने वाले पदार्थों का उपयोग दवा को प्रभावी बनता है.
(स) अत्यधिक जहरीली (लाल एवं पीले त्रिकोण वाली) दवाओं का प्रयोग खाद्य फसलों में न करें.
(द) सभी फसलों में आईपीएम विधि से कीट नियंत्रण करें. फैरोमौन ट्रैप, लाइट ट्रैप, घर पर बने जैविक कीटनाशकों का प्रयोग कर लागत को कम कर सकते हैं.

नेटाफिम : सिंचाई की  उन्नत तकनीक

अच्छी उपज लेने के लिए खेत में अच्छे खादबीज के साथसाथ सही समय पर सही सिंचाई का होना भी बहुत जरूरी है. कई फसलों को ज्यादा पानी की दरकार होती है, तो कई फसलें ऐसी हैं, जो कम पानी में भरपूर उपज देती हैं.

आज के समय में पानी व सिंचाई ऐसा विषय है, जिन पर बहुतकुछ सोचा व किया जा रहा है, खासकर खेती की सिंचाई बात करें, तो हमारे देश में अलगअलग जलवायु है. कहीं बेहिसाब पानी है, तो कहीं सूखा पड़ता है, इसलिए हमें पानी को ले कर जल संरक्षण के बारे में सोचना होगा. कम पानी में भी अच्छी खेती की जा सकती है. इस के लिए हमें खेती में सिंचाई के लिए आधुनिक तौरतरीकों को जानना होगा और उन्हें अपनाना होगा.

सिंचाई की आधुनिक तकनीकों में स्पिंकलर विधि (फव्वारा), ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) जैसी तकनीकें हैं, जिन्हें नेटाफिम जैसी कंपनियों ने बढ़ावा दिया है. वे सिंचाई के ऐसे उपकरण बना रही हैं, जो हर छोटेबड़े किसानों की पहुंच में हो सकती हैं. शुरुआत में यह महंगा सौदा जरूर मालूम होता है, लेकिन कुलमिला कर पानी की खपत को ले कर हिसाब लगाया जाए तो यह बेहद फायदेमंद हैं.

ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) 

NetaFemनेटाफिम प्रणाली दुनियाभर के देशों में पिछले 4 दशकों से भी अधिक समय से काम कर रही है. साल 1997 से भारतीय किसानों को उच्च प्रति की ड्रिप सिंचाई प्रणाली और विभिन्न सेवाएं प्रदान कर रही है. आज भारत में 8 लाख एकड़ से भी ज्यादा क्षेत्र पर नेटाफिम ड्रिप प्रणाली सफलतापूर्वक काम कर रही है.

 

ड्रिपलाइन

अत्याधुनिक इजरायली तकनीक से बनी नेटाफिम ड्रिपलाइन का निर्माण भारतीय खेती की जरूरतों को ध्यान में रख कर किया गया है. ड्रिपलाइन के हर ड्रिपर में फिल्टर होता है, जो  ड्रिपर में कचरा जमा नहीं होने देता. जमीन व फसल की जरूरत के मुताबिक ड्रिपर के बीच की दूरी 20, 30, 40, 50, 60, 75 व 90 सैंटीमीटर और ड्रिपर 1.4/2.1/2.9 लिटर प्रति घंटा प्रवाह दर में उपलब्ध है. सभी प्रकार की सब्जियों, गन्ना, कपास, फूलों की खेती व सघन बागबानी के लिए खास उपयोगी है.

ड्रिपनेट पीसी (प्रवाह नियंत्रित ड्रिपलाइन)

अत्याधुनिक इजरायली तकनीक से बनी यह ड्रिपर प्रैशर नियंत्रित करते हुए समान प्रवाह से ऊंचीनीची जमीन पर सिंचाई करती है. सभी प्रकार की सब्जियों, गन्ना, कपास, फूलों की खेती व सघन बागबानी के लिए खास उपयोगी है.

ड्रिपर के माध्यम से यह ड्रिपर प्रैशर नियंत्रित करते हुए समान प्रवाह से ऊंचीनीची जमीन पर सिंचाई करती है. यह ड्रिपर 1/2/4/8 व 12 लिटर प्रति घंटा प्रवाह दर में उपलब्ध है.

बटन ड्रिपर्स (औनलाइन)

अत्याधुनिक इजरायली तकनीक से बने ड्रिपर के रास्ते में कचरा ठहरता नहीं और ड्रिपर बंद होने की संभावना बहुत ही कम होती है. यह ड्रिपर 1/2/4/8 लिटर प्रति घंटा प्रवाह दर में उपलब्ध है.

कूलनेट प्रो

यह 80 से 90 माइक्रोन आकार के अत्यंत सूक्ष्म जलबिंदुओं का वातावरण में छिड़काव करता है, जिस से तापमान कम करने व आर्द्रता बढ़ाने में मदद मिलती है. ग्रीनहाउस, पोल्ट्री और डेरी में तापमान कम करने के लिए भी यह काफी खास है.

माइक्रो स्प्रिंकलर्स

यह 20 से 140 लिटर प्रति घंटा प्रवाह दर से सिंचाई करता है. इस का उपयोग नर्सरी व बागों में किया जा सकता है. अदरक और अन्य सब्जियों के लिए, खासतौर पर तापमान नियंत्रण के लिए स्ट्राबेरी में उपयोगी है.

सुपरनेट ( प्रैशर कंपनसेटेड माइक्रो स्प्रिंकलर्स )

ऊंचीनीची जमीन पर एकसमान प्रवाह से सिंचाई करने के लिए उपयोगी है. यह 20 से 90 लिटर प्रति घंटा की दर से सिंचाई करता है.

NetaFemनेटाफिम मिडरेंज कंट्रोलर

इस श्रेणी में 2 मौडल एनएमसी 64 और एनएमसी प्रो उपलब्ध हैं. डिजिटल तंत्र ज्ञान पर आधारित ये कंट्रोलर्स एक ही जगह से विभिन्न जगहों पर स्थित वाल्वों को संचालित करते हैं. एनएमसी 64 सिंचन और खाद नियंत्रक है. एनएमसी प्रो भी सिंचन और खाद नियंत्रक है.

डिस्क फिल्टर

उच्च दर्जे की प्लास्टिक से बनने के कारण पानी के दबाव से टूटने और जंग लगने की संभावना नहीं है. एसिड और खाद प्रवाह से फिल्टर पर कोई असर नहीं पड़ता. यह 4,000 से 50,000 लिटर प्रति घंटा प्रवाह क्षमता व 40, 80, 120, 140 और 200 मेश में उपलब्ध है. साथ ही, 0.75, 1, 1.5, 2 और 3 इंच के आकार में उपलब्ध है.

फर्टिलाइजर पंप

पूरी तरह से प्लास्टिक से बनने के कारण इस में जंग नहीं लगता है. इस के इस्तेमाल से आवश्यक खाद एकसमान मात्रा से दिया जाता है. यह पंप ड्रिप सिंचाई प्रणाली में एसिड व क्लोरीन ट्रीटमैंट के लिए बेहद उपयोगी है.

अधिक जानकारी के लिए आप नेटाफिम इरिगेशन इंडिया प्रा. लि. पर उन की वैबसाइट या  फोन नंबर 011-32313249 पर संपर्क कर सकते हैं.

स्मार्ट सिंचाई के लिए फ्लेक्सी स्प्रिंकलर किट

नेटाफिम इंडिया ने छिड़काव के जरीए फसलों की सिंचाई से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘फ्लेक्सी स्प्रिंकलर किट’ को बाजार में उतारा है. वर्ष 2022 तक इस उपकरण के जरीए 15,000 हेक्टेयर जमीन को सिंचाई के दायरे में शामिल करने का लक्ष्य रखा है.

यह किट सब्जियों और खेतों में उगाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की फसलों के लिए उपयुक्त है. इस में मुख्य रूप से गेहूं, बाजरा, ज्वार, सोयाबीन, मूंगफली आदि फसलें हैं.

फ्लेक्सी स्प्रिंकलर किट भारत में इस प्रकार का पहला उपकरण है, जो फसलों की पैदावार को अधिकतम करने के लिए पूरे खेत में पानी के एकसमान वितरण को सुनिश्चित करता है. यह उपकरण यूवी किरणों के साथसाथ हर तरह की जलवायु का सामना करने में सक्षम है. इसी वजह से यह उत्पाद बेहद टिकाऊ है और लंबे समय तक बिना किसी परेशानी के इस का इस्तेमाल किया जा सकता है. कई नलिकाओं वाला यह पोर्टेबल और सुविधाजनक पाइपिंग सिस्टम सिंचाई के लिए बेहद स्मार्ट और टिकाऊ समाधान है.

इस उत्पाद की प्रमुख विशेषताओं में से एक यह है कि काफी हलके और मजबूत होने के कारण किसानों के लिए इसे इंस्टौल करना और इस्तेमाल में लाना बेहद आसान हो जाता है. इसे खेतों में आसानी से बिछाया जा सकता है और उपयोग के बाद एकदम सुरक्षित तरीके से निकाला जा सकता है.

इस के अलावा इस किट को अपने घर सहित किसी भी स्थान पर उपयोग में लाया जा सकता है और इस्तेमाल के बाद इस के सभी कलपुरजों को खोल कर कहीं भी रखा जा सकता है, क्योंकि इसे रखने के लिए बेहद

कम जगह की जरूरत होती है. इसी वजह से यह किसानों के लिए लंबे समय तक चलने वाला और मेहनत बचाने वाला उत्पाद है.

रणधीर चौहान, मैनेजिंग डायरैक्टर, नेटाफिम इंडिया ने कहा, ‘‘नेटाफिम में हम किसानों को अत्याधुनिक समाधान उपलब्ध कराने की दिशा में लगातार काम करने और पूरी दुनिया में पानी की कमी की समस्या से निबटने के अपने वादे पर कायम हैं. भारतीय किसानों के लिए ‘पोर्टेबल ड्रिप किट’ को सफलतापूर्वक पेश करने के बाद फ्लेक्सी स्प्रिंकलर किट को लौंच करते हुए हमें बेहद खुशी हो रही है. अत्याधुनिक तकनीक वाला यह नया उपकरण उन सभी किसानों के लिए बेहद मददगार है, जो आसान तरीके से खेतों में समान रूप से पानी का वितरण करना चाहते हैं.’’

नेटाफिम के डीलर के माध्यम से यह किट पूरे भारत में उपलब्ध है.

पोर्टेबल ड्रिप सिंचाई किट

भारत के छोटे व मझोले किसानों के लिए स्मार्ट सिंचाई की एक पोर्टेबल ड्रिप सिंचाई किट किफायती दाम पर मौजूद है. पोर्टेबल ड्रिप किट की कीमत 21,000-25,000 रुपए है. किट नेटाफिम के डीलर नैटवर्क के माध्यम से देशभर में उपलब्ध हैं. हलके वजन और पोर्टेबल ड्रिप किट को आसानी से लगाया जा सकता है.

पोर्टेबल ड्रिप किट सब्जियों, खीरा, केला और पपीता सहित सभी प्रकार की फसल किस्मों के लिए उपयुक्त है.

 पानी की खपत होगी कम : किट का प्रमुख पार्ट फ्लेक्सनेट है. यह एक लीक प्रूफ फ्लेक्सिबल मेनलाइन और मैनिफोल्ड पाइपिंग सौल्यूशन है, जो सटीक जल वितरण समाधान प्रदान करता है. इस की वजह से पानी की खपत कम होती है. साथ ही, ड्रिप सिंचाई के माध्यम से फसलों को पूरा पानी मिलता है.

पोर्टेबल ड्रिप किट में फील्ड इंस्टौलेशन और संचालन के लिए सभी आवश्यक पार्ट शामिल हैं, जिस में स्क्रीन फिल्टर, फ्लेक्सनेट पाइप, ड्रिपलाइन और कनैक्टर शामिल हैं.

ड्रिप और मल्चिंग पद्धति से शिमला मिर्च की खेती

परंपरागत खेती में रोज ही नएनए तरीके अपना कर किसान उन्नत खेती के साथ मुनाफा ले रहे हैं. ड्रिप और मल्चिंग पद्धति से खेती कर के फसलों की पैदावार बढ़ाई जा सकती है. इन के इस्तेमाल से न सिर्फ अच्छा उत्पादन मिलता है, बल्कि खरपतवार नियंत्रण और सिंचाई जल की बचत भी की जा सकती है.

पिछले दिनों  मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के गरहा गांव के प्रगतिशील किसान विजय शंकर शर्मा ने अपने खेत के 2 एकड़ रकबे में शिमला मिर्च की खेती की है. ड्रिप व मल्चिंग पद्धति से पूरे खेत में बिछी सिल्वर कलर की पौलीथिन और उस में से झांकते पौधे देखने के लिए राह चलते लोग भी रुक जाते हैं.

विजय शंकर शर्मा बताते हैं कि जब लौकडाउन में सबकुछ बंद था, लोग घरों में बैठे थे, उस दौरान उन्हें खाली समय का सही इस्तेमाल खेती में करने का विचार आया. इस तरीके से खेती करने की प्रेरणा उन्हें सिवनी जिले के लखनादौन के पास विजना गांव में मल्चिंग पद्धति से खेती करने वाले रिश्तेदार से मिली थी.

ड्रिप और मल्चिंग पद्धति की पूरी जानकारी ले कर उन्होंने 2 एकड़ में शिमला मिर्च की खेती करने की योजना बनाई. इस के तहत पूरे खेत में ड्रिप इरिगेशन के लिए पाइपलाइन बिछाई गई. मल्चिंग के लिए मिट्टी ऊंची कर के पूरे खेत को पौलीथिन से ढक दिया. 2 एकड़ खेत में बीज समेत सभी खर्च मिला कर तकरीबन 2 लाख रुपए की लागत आई.

किसान विजय शंकर शर्मा ने बताया कि इस काम को करते वक्त शुरू में उन का लोगों ने काफी मजाक उड़ाया. वहीं उन के छोटे भाई शिक्षक सतीश शर्मा व शिवम शर्मा ने पूरा सहयोग दे कर उन्हें खेती करने के लिए पे्ररित किया. बस फिर क्या था, अच्छी देखरेख के चलते तकरीबन 3-4 महीने में पौधे फल देने लगे.

आजकल फुटकर बाजार में शिमला मिर्च का भाव 100 रुपए प्रति किलोग्राम है. विजय शंकर की मेहनत से उगाई शिमला मिर्च में एक अनूठी मिठास भी है. इस से बाहर की शिमला मिर्च के उलट उन की मिर्च क्वालिटी में उम्दा साबित हो रही है.

जहां आमतौर पर किसानों को सब्जी बेचने के लिए भटकना पड़ता है, वहीं उन की उपज थोक विक्रेता खुद और्डर पर मंगाते हैं.

वर्तमान में 8-10 क्विंटल उपज बाजार में बिक चुकी है. आगे 1-2 महीने और मिर्च उपज देगी, जिस में अनुमानित 20 से 30 क्विंटल उत्पादन होगा.

उन्होंने साथ में खाली जमीन में लहसुन भी लगाया है. इस से जहां लहसुन से खेत में कीटाणु नहीं हो रहे, वहीं खाली जगह का सही इस्तेमाल भी हो रहा है. अगली बार शिमला मिर्च के पौधे अलग कर टमाटर की खेती करेंगे.

विजय शंकर शर्मा ने अपनी मेहनत से आसपास के किसानों के लिए उम्मीद जगाई है. आसपास के गांव के किसान उन की खेती देखने रोज ही आते हैं. उन्होंने बताया कि उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने आ कर फसल देखी है और शासन से इस पद्धति को प्रोत्साहन और मदद दिलाने का भरोसा दिलाया है. 2 लाख रुपए की लागत में कम से कम 6 लाख रुपए की उपज निकलने का अंदाजा है.

एक पौधे पर दर्जनों मिर्च

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले की जलवायु शिमला मिर्च उत्पादन के लिए सही नहीं मानी जाती है, लेकिन किसान की मेहनत और लगन ने शिमला मिर्च की खेती कर के यह साबित कर दिया है कि कोई काम नामुमकिन नहीं है.

खेत पर लगे 1-1 पौधे पर तकरीबन एक दर्जन से ज्यादा शिमला मिर्च के फल लगे हुए हैं. इतना ही नहीं, बाजार में मिलने वाली शिमला मिर्च की तुलना में इन की उपज में ज्यादा चमक और बड़ी साइज भी देखने को मिली है.

Capsicum
Capsicum

इसलिए है फायदेमंद

इस तकनीक से खेतों में नमी बनी रहती है और मिट्टी का कटाव नहीं होता है. क्षेत्र के दूसरे जानकार किसानों के मुताबिक, मल्चिंग व ड्रिप इरीगेशन के तालमेल से एकबार में लागत लगा कर जब तक पौलीथिन खराब नहीं होती, खेती की जा सकती है. तकरीबन 2-3 साल में एक बार इस तरह पौलीथिन बिछा कर खेती करने में बखरनी और ट्रैक्टर चलाने का खर्च बचता है. वहीं खेत में कोई दवा डालनी हो, तो ड्रिप पद्धति से दवा पाइप से सीधे पौधों तक आसानी से पहुंचाई जाती है. इस से अलग से दवा डालने की मेहनत बचती है. सब से बड़ी बात ड्रिप इरीगेशन से पानी की बचत होती है.

सब्जियों की फसल में इस का इस्तेमाल कैसे करें

मल्चिंग विधि के जानकार किसान बताते हैं कि जिस खेत में सब्जी वाली फसल लगानी है, उसे पहले अच्छी तरह से जुताई कर लें, फिर उस में गोबर की खाद और मिट्टी परीक्षण करवा कर उचित मात्रा में खाद दे कर खेत में उठी हुई क्यारी बना लें. फिर उन के ऊपर ड्रिप सिंचाई की पाइप लाइन को बिछा लें. 25 से 30 माइक्रोन प्लास्टिक मल्च फिल्म, जो सब्जियों के लिए बेहतर रहती है, को उचित तरीके से बिछा दें, फिर फिल्म के दोनों किनारों को मिट्टी की परत से दबाना चाहिए. इसे आप ट्रैक्टरचालित यंत्र से भी दबा सकते हैं.

फिर उस फिल्म पर गोलाई में पाइप से पौधों से पौधों की दूरी तय कर के छेद कर लें. किए हुए छेदों में बीज या नर्सरी में तैयार पौधों का रोपण करना चाहिए.

खेत में मल्चिंग करते समय रखी जाने वाली सावधानियां

* प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए.

* फिल्म में ज्यादा तनाव न रखें.

* प्लास्टिक फिल्म लगाते समय उस में सिलवटें नहीं पड़नी चाहिए.

* फिल्म में सिंचाई नली का ध्यान रख कर छेद सावधानी से करने चाहिए.

* छेद एकजैसे करें और फिल्म न फटे, इस बात का ध्यान रखें.

* मिट्टी चढ़ाने में दोनों साइड एकजैसी रखें.

* फिल्म को फटने से बचाएं, ताकि उस का इस्तेमाल दूसरी बार भी कर पाएं और उपयोग होने के बाद उसे सुरक्षित रखें.

उत्तर प्रदेश गन्ना प्रतियोगिता के विजेताओं को मिला इनाम

लखनऊ : राज्य गन्ना प्रतियोगिता वर्ष 2022-23 के लिए अनुमन्य संवर्ग यथाशीघ्र पौधा, पेड़ी, सामान्य पौधा, ड्रिप विधि से सिंचाई (पौधा व पेड़ी) एवं युवा गन्ना किसान संवर्ग (पौधा व पेड़ी) के तहत पूरे प्रदेश से कुल 432 आवेदनपत्र प्राप्त हुए थे.

विभाग द्वारा नामित कटाई अधिकारियों से प्राप्त परिणामों के आधार पर किसानों को विजयी घोषित किया गया है.

आयुक्त, गन्ना एवं चीनी प्रभु एन. सिंह ने बताया कि शीघ्र ही पौधा संवर्ग में नागेंद्र सिंह पुत्र बृजपाल सिंह, ग्राम-पाटकुआं, जोन-हरियावां, जिला-हरदोई ने प्रदेश में सर्वाधिक 2,758 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर प्रथम स्थान प्राप्त किया, वहीं सत्यनारायण पुत्र सीताराम, ग्राम-तरया हंसराज, जोन-सेवरही, जिला कुशीनगर ने 2446.75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर द्वितीय स्थान व श्याम बहादुर सिंह पुत्र हरिहर सिंह, ग्राम-उतरा, जोन-हरियावां, जिला-हरदोई ने 2370.50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर तृतीय स्थान प्राप्त किया है.

इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार विजेता को 15,000 रुपए , द्वितीय को 10,000 रुपए और तृतीय को 7,500 रुपए की धनराशि एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान किया जाएगा.

उन्होंने बताया कि घोषित परिणामों के अनुसार पेड़ी संवर्ग के अंतर्गत जोगेंद्र सिंह पुत्र ओम प्रकाश, ग्राम-शामली, जोन-शामली, जिला-शामली ने 1993.05 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है, वहीं योगेंद्र सिंह पुत्र रामप्रसाद सिंह, ग्राम-चरौरा, जोन-अनूपशहर, जिला- बुलंदशहर द्वारा 1970 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर द्वितीय स्थान एवं अशोक पाल सिंह पुत्र हरपाल सिंह ग्राम- ब्यौंधा, जोन- सेमीखेड़ा, बरेली द्वारा 1857.25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर तृतीय स्थान प्राप्त किया गया है.

इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार विजेता को 15,000 रुपए, द्वितीय को 10,000 रुपएऔर तृतीय को 7,500 रुपए की धनराशि एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान किया जाएगा. उन के द्वारा यह भी बताया कि इस विधि से सिंचाई-पौधा संवर्ग में रोहित कुमार, पुत्र कृष्ण पाल, ग्राम-सुल्तानपुर, जोन- खाईखेड़ी, जिला- मुजफ्फरनगर ने 1,979 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है, वहीं शोभा राम, पुत्र मान सिंह, ग्राम-ढासरी, जोन-टिकौला, जिला- मुजफ्फरनगर द्वारा 1475 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर द्वितीय स्थान एवं महेंद्र सिंह, पुत्र होशियारा, ग्राम-कवाल, जोन-मंसूरपुर, जिला- मुजफ्फरनगर द्वारा 1468 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर तृतीय स्थान प्राप्त किया गया है.

इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार विजेता को 15,000 रुपए, द्वितीय को 10,000 रुपए और तृतीय को 7,500 रुपए की धनराशि एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान किया जाएगा.

ड्रिप विधि से सिंचाई-पेड़ी संवर्ग में कमलकांत शर्मा, पुत्र जय नारायण शर्मा, ग्राम-शाहजहांपुर, जोन- अनूपशहर, जिला- बुलंदशहर ने 1,754 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है, वहीं हरवीर आर्य, पुत्र बलवीर सिंह, ग्राम- रसूलपुर जाटान, जोन- मंसूरपुर, जिला- मुजफ्फरनगर द्वारा 1,640 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर द्वितीय स्थान एवं विजय पुत्र जवाहर सिंह, ग्राम- भटीपुरा, जोन- नंगलामल, जिला- मेरठ द्वारा 1524 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर तृतीय स्थान प्राप्त किया है.

इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार विजेता को 15,000 रुपए, द्वितीय को 10,000 रुपए और तृतीय को 7,500 रुपए की धनराशि एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान किया जाएगा.

इसी प्रकार युवा गन्ना किसान संवर्ग-पौधा के अंतर्गत मनप्रीत कौर, पत्नी अमरजीत, ग्राम- इंद्रराज रूपपुर, जोन- खाईखेड़ी, जिला- मुजफ्फरनगर ने 1917 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर प्रथम स्थान पाया है, वहीं वैभव निरवाल, पुत्र जगेंद्र सिंह, ग्राम- शामली, जोन- शामली, जिला- शामली द्वारा 1827 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर द्वितीय स्थान एवं पंकज कुमार पुत्र लाल सिंह, ग्राम- खानूजट, जोन- धामपुर, जिला- बिजनौर द्वारा 1669 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर तृतीय स्थान हासिल किया है. इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार विजेता को 15,000 रुपए। द्वितीय को 10,000 रुपए और तृतीय को 7,500 रुपए की धनराशि एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान किया जाएगा.

युवा गन्ना किसान संवर्ग-पेड़ी के अंतर्गत मोहित पुत्र अशोक कुमार, ग्राम- बढ़पुरा, जोन- अनूपशहर, जिला- बुलंदशहर ने 1949 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर प्रथम स्थान पाया है, वहीं बलराम, पुत्र राधेश्याम, ग्राम-नयागांव, जोन- खाईखेड़ी, जिला- मुजफ्फरनगर द्वारा 1712.50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर द्वितीय स्थान एवं कुलवंत, पुत्र अजय, ग्राम- अलीपुरा, जोन- सरसावां, जिला- सहारनपुर द्वारा 1638.50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर तृतीय स्थान हासिल किया है. इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार विजेता को 15,000 रुपए, द्वितीय को 10,000 रुपए और तृतीय को 7,500 रुपए की धनराशि एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान किया जाएगा.

उन्होंने यह भी बताया कि सभी संवर्गों के प्रतियोगी गन्ना किसान, जिन्होंने राज्य गन्ना प्रतियोगिता वर्ष 2022-23 के पौधा गन्ना संवर्ग में 2,000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर या अधिक और पेड़ी गन्ना संवर्ग में 1,500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर या अधिक गन्ना उत्पादकता प्राप्त की है, उन्हें भी अच्छी गन्ना उपज प्राप्त करने के लिए प्रशस्तिपत्र दिए जाने की घोषणा की गई है.

गन्ना आयुक्त ने यह भी बताया कि राज्य गन्ना प्रतियोगिता आयोजन का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के चीनी मिल क्षेत्रों में गन्ने की प्रति हेक्टेयर उपज को बढ़ाने के लिए गन्ना किसानों में स्वस्थ प्रतियोगी भावना का संचार कर उपज बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा कायम करना है.

गन्ना आयुक्त द्वारा गन्ना प्रतियोगिताओं के वृहद स्तर पर प्रचारप्रसार हेतु विभागीय अधिकारियों को निर्देश भी दिए गए. जिस से सभी गन्ना किसानों को राज्य गन्ना प्रतियोगिता के संबंध में समय से जानकारी प्राप्त हो सके और अधिक से अधिक गन्ना किसान प्रतियोगिता में प्रतिभाग कर सकें, जिस से प्रदेश के विजयी घोषित होने वाले गन्ना किसानों से प्रेरणा ले कर अन्य गन्ना किसान भी गन्ने की खेती में अच्छी उपज प्राप्त कर सकें

पहला स्वदेशी ई ट्रैक्टर लौंच

आज भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि स्टार्टअप्स की महत्वपूर्ण भूमिका है. मंत्री डा. जितेंद्र सिंह ने कहा कि ई ट्रैक्टर, कचरे की रीसाइक्लिंग, ड्रिप सिंचाई, आम और कमल जैसी जीनोम अनुक्रमित खेती सहित विशिष्ट प्रौद्योगिकियों पर फोकस करते हुए कृषि क्षेत्र में बड़ी संख्या में नए स्टार्टअप प्रवेश कर रहे हैं.

डा. जितेंद्र सिंह ने कहा, “यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिस में भारत ने अपेक्षित गति नहीं पकड़ी है.”

उन्होंने यह भी कहा, “यह एक विशाल अज्ञात संसाधन है, जो केवल भारत के लिए विशिष्ट है. जो देश आईटी को बढ़ावा दे रहे थे, वे अपने दृष्टिकोण से बढ़ावा दे रहे हैं, क्योंकि उन के पास संपत्ति है; उनके पास वह कृषि संपत्ति नहीं है, जो हमारे पास है. इसलिए हमें उन की नकल करने की आवश्यकता नहीं है. अगर मेरे पास भरपूर कृषि संसाधन हैं तो मैं इस का उपयोग क्यों न करूं. इसलिए यह मार्ग अगले 25 वर्षों में भारत की भविष्य की अर्थव्यवस्था में एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक होगा.

डा. जितेंद्र सिंह ने सरकार द्वारा संचालित वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में आयोजित अनुसंधान एवं विकास की सफलता के लिए 5 एस – शोकेसिंग, स्टेकहोल्डर, स्टार्टअप, सिनर्जिंग और स्ट्रेटेजाइजिंग इंडस्ट्री लिंकेज (प्रदर्शन, हितधारक, स्टार्टअप, सिनर्जिंग और उद्योग लिंकेज की रणनीति) का मंत्र दिया.

E-Tractorउन्होंने आगे यह भी कहा, “जब तक हम इन सभी 5 घटकों को शामिल करने में सक्षम नहीं होंगे, हम अधिकतम परिणाम प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे.”

उन्होंने एकीकृत दृष्टिकोण का आह्वान करते हुए संबंधित मंत्रालयों सहित सभी हितधारकों के साथ इंटरेक्शन की बात की. इस में सीएसआईआर प्रयोगशालाओं और उद्योग के बीच व्यापक संबंध शामिल हैं. विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री ने निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए एक अलग प्रकोष्ठ बनाने का प्रस्ताव किया.

उन्होंने कहा, “स्वयं को बनाए रखने के लिए आप को पहले दिन से ही उद्योग जगत की भागीदारी रखनी होगी.“

उन्होंने आगे कहा, “हमारे पास एक उद्योग है, जो निवेश करने के लिए तैयार है, लेकिन वे नहीं जानते कि कहां और कैसे निवेश करना है.’’

डा. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने पिछले 9 वर्षों में कृषि क्षेत्र में व्यापार को आसान बना कर आजीविका के नए साधन सृजित किए हैं.

उन्होंने यह भी कहा, “हमारे पास एक बहुत ही अनुकूल वातावरण और एक सक्षम नेतृत्व है, जो काफी संरक्षण दे रहा है. ”

उन्होंने आगे बताया, “पीएम मोदी ने न केवल हमें अपनी पूरी क्षमता और योग्यता के साथ प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता दी है, बल्कि उन्होंने विज्ञान और वैज्ञानिकों का सम्मान भी बढ़ाया है.”

डा. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जोर दे कर कहा है कि अमृत काल में कृषि क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होगी, क्योंकि भारत का लक्ष्य एक विकसित राष्ट्र के रूप में उभरना है.

E-Tractor“अगले 25 वर्षों में सरकारी नौकरियों के बाहर आजीविका के अवसरों पर बल दिया जा रहा है, यह कृषि क्षेत्र न केवल अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहा है, बल्कि यह युवाओं के लिए व्यवसाय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी बनने जा रहा है.

डा. जितेंद्र सिंह ने इस अवसर पर सीएसआईआर-सीआईएमएपी की पुस्तक और सीएसआईआर द्वारा विकसित 75 प्रौद्योगिकियों पर एक सार संग्रह का विमोचन किया.

मंत्री ने सीएमईआरआई द्वारा विकसित रिसाइक्लिंग वाहनों और उत्पादों में गहरी रूचि दिखाई.
सीएसआईआर-सीएमईआरआई 11 से 15 सितंबर 2023 तक विषय आधारित अभियान “वन वीक वन लैब” मनाएगा, जिस में विभिन्न हितधारकों को प्रयोगशाला के अत्याधुनिक अनुसंधान, उत्पाद और प्रौद्योगिकी, विशेषज्ञता और सुविधाएं दिखाई जाएंगी.

खेती को बनाएं फायदेमंद

गरमी में खेतों की गहरी जुताई करनी चाहिए. ऐसा करने से खेत की पानी सोखने की कूवत बढ़ेगी,साथ ही नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का सफाया होगा और फायदेमंद कीटों को पनपने का मौका मिलेगा. इस से कीटनाशकों पर होने वाले गैरजरूरी खर्च में कमी आएगी.

* बरसात के पानी को सहेजने का इंतजाम करना चाहिए. खेत की उपजाऊ मिट्टी को बह कर जाने से रोकने के लिए मजबूत व ऊंची मेंड़ बनानी चाहिए. पानी रोकने के उपाय करने चाहिए. पहली बरसात का पानी खेत में जरूर रोकें.

* जिस फसल की बोआई करनी हो, उस की क्षेत्र के लिए स्वीकृत प्रजातियों के आधार पर या प्रमाणित बीज की ही बोआई करें.

* हमेशा खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर खेत में खाद व उर्वरक का इस्तेमाल करें.

* धान और गेहूं फसल चक्र में हरी खाद का इस्तेमाल जरूर  करना चाहिए.

* मृदा स्वास्थ्य सुधार के लिए कार्बनिक खादों, जैविक खाद/जैविक उर्वरक, दलहनी फसलों का इस्तेमाल जरूर करें.

* फसलों की सिंचाई पलेवा या पारंपरिक तरीके से न करें. आधुनिक व सूक्ष्म सिंचाई के तरीकों जैसे टपक सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, रेन गन सिंचाई वगैरह का प्रयोग करें. इस से समय, मेहनत और पानी की बचत होगी और फसल से अच्छा उत्पादन मिलेगा.

* खेती से ज्यादा आमदनी लेने के लिए फसल उत्पादन के साथ ही साथ पशुपालन, बागबानी, सब्जी उत्पादन, फलफूल, मत्स्यपालन, कुक्कुटपालन, मौनपालन वगैरह कामों को भी करें.

* कम समय में तैयार होने वाली नकदी फसलें, जैसे तोरिया, आलू, प्याज, उड़द, मूंग, लोबिया, ग्वार, मशरूम उत्पादन जरूर करें.

* कम लागत में टिकाऊ व ज्यादा उत्पादन के लिए समेकित पोषक तत्त्व प्रबंधन, समेकित कीट व रोग प्रबंधन अपनाएं.

* खेतों में कभी भी धान का पुआल, गेहूं के डंठल, भूसा वगैरह न जलाएं, उन्हें मिट्टी में ही मिला दें.

Farmingइन बातों को अपनाने से खेती फायदेमंद, टिकाऊ होगी, मिट्टी और खेत का स्वास्थ्य ठीक होगा, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण व समुचित उपयोग होगा और खेत की मिट्टी की पानी सोखने की कूवत बढ़ेगी. फसल में कीट व बीमारियां कम लगेगीं. साथ ही, फसल पैदावार में बढ़ोतरी होगी.

ऐसा होने से निश्चित रूप से गांव, जिला, प्रदेश व देश की तरक्की होगी, इसलिए किसानों से अनुरोध है कि इन बातों पर जरूर ध्यान दें और अपने खेतों में इन का इस्तेमाल करें.

नर्सरी में तैयार करें लतावर्गीय सब्जियों की पौध

जनवरीफरवरी का महीना लतावर्गीय सब्जियों की रोपाई के लिए बेहद ही खास माना जाता है. इस महीने लतावर्गीय सब्जियों की रोपाई कर गरमी के लिए अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.
इन बेल वाली सब्जियों में लौकी, तोरई, खीरा, टिंडा, करेला, तरबूज, खरबूजा, पेठा की रोपाई जनवरी या फरवरी महीने में कर गरमी के मौसम में मार्च से ले कर जून महीने तक अच्छी उपज ली जा सकती है.
इन लतावर्गीय सब्जियों की खेती बीज को सीधे खेत में बो कर या नर्सरी में पौध तैयार कर खेत में रोप सकते हैं.
जनवरीफरवरी माह में पौधों के उचित जमाव के लिए प्लास्टिक ट्रे, प्लास्टिक लो टनल या पौलीबैग तकनीकी का प्रयोग कर लतावर्गीय सब्जियों की नर्सरी तैयार की जा सकती है.
इस विधि से प्लास्टिक शीट से लो टनल में भी पौध तैयार की जाती है. इस में बीज को बो कर पौध तैयार की जाती है. इस के बाद तैयार पौध को खेत में रोपा जाता है. इस विधि से लतावर्गीय सब्जियों की रोपाई से पौधों के मरने पर उस की जगह पर दूसरे पौध को रोप कर नुकसान से बचा जा सकता है.
इन सब्जियों के पौधों की तैयार करें नर्सरी
इस समय बोआई के लिए जिन लतावर्गीय सब्जियों का चयन करते हैं, उस में लौकी, करेला, खीरा, कद्दू, टिंडा, खरबूजा, तरबूज, तोरई जैसी किस्में प्रमुख हैं.
ऐसे तैयार करें पौध
सर्दी के मौसम में लतावर्गीय सब्जियों की खेती के लिए नर्सरी में पौध तैयार करने के लिए कई विधियों का प्रयोग किया जाता है, जिस में  मुख्य रूप से प्लास्टिक ट्रे, प्लास्टिक लो टनल या पौली पैक में पौधों को तैयार करना ज्यादा मुफीद होता है.
ऐसे तैयार करें प्लास्टिक लो टनल
प्लास्टिक लो टनल में सब्जियों के पौध तैयार करने के लिए सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था कर लें. इस के लिए ड्रिप इरिगेशन ज्यादा मुफीद होता है.
प्लास्टिक लो टनल बनाने  के लिए जमीन से उठी हुई क्यारियां हवा की निकासी को नजर में रखते हुए उत्तर से दक्षिण दिशा में बनाई जानी चाहिए. इस के बाद क्यारियों के मध्य में एक ड्रिप लाइन बिछा दी जाती है. इन क्यारियों के ऊपर अर्धवृत्ताकार लोहे के 2 मिलीमीटर मोटे लोहे के तारों को मोड़ कर दोनों सिरों की दूरी 50 से 60 सैंटीमीटर और ऊंचाई 50 से 60 सैंटीमीटर रख कर सेट कर लेते हैं.
यह ध्यान रखें कि मोड़े गए तारों के बीच की दूरी 1.5 से 2 मीटर हो. 20-30 माइक्रोन मोटाई और 2 मीटर चौड़ाई वाली पारदर्शी प्लास्टिक की चादर को इन तारों पर चढ़ा कर ढक दिया जाता है.
बिना मिट्टी के पौध तैयार करना 
विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार, इस विधि से लतावर्गीय सब्जियों की पौध तैयार करने के लिए मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाता है, बल्कि इस विधि में मृदाविहीन विधि से बीज की रोपाई कर पौध तैयार की जाती है.
जो किसान इस विधि से नर्सरी में पौध तैयार करते हैं, उस से स्वस्थ पौधे तो तैयार किए ही जा सकते हैं. साथ ही, इस में कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी कम पाया जाता है.
मृदाविहीन विधि से नर्सरी तैयार करने के लिए सब्जी के बीज की बोआई जमीन में न कर के प्लास्टिक की ट्रे में की जाती है, जिस के लिए जरूरी चीजों में कोकोपिट, प्लास्टिक ट्रे, वर्मी कंपोस्ट, सब्जी बीज और फफूंदीनाशक में 50 फीसदी में घुलनशील पाउडर बावस्टीन की जरूरत होती है.
इस विधि से बीज को प्लास्टिक ट्रे में रोपाई के पूर्व कोकोपिट ब्रिक को एक प्लास्टिक या जूट के बोरे में भर कर ऊपर से बोरे का मुंह बांध देते हैं. इस के बाद उस को 5-6 घंटे के लिए बोरे को पानी में डुबो कर  भिगो देते हैं. इस के बाद बोरे को पानी से बाहर निकाल कर भीगे हुए कोकोपिट को साफ प्लास्टिक की पन्नी पर पतली परत बनाते हुए फैला देते हैं. उस के बाद कोकोपिट को खूब दबा कर पानी निकाल लेते हैं.
जब इस कोकोपिट से पूरा पानी छन जाता है, तो उस में जितनी मात्रा कोकोपिट की होती है, उतनी ही मात्रा में वर्मी कंपोस्ट मिला लेते हैं. जब कोकोपिट और वर्मी कंपोस्ट का मिश्रण तैयार हो जाए, तो उस में प्रति किलोग्राम मिश्रण की दर से 2 ग्राम बावस्टीन को मिला लेते हैं.
जब यह मिश्रण पूरी तरह से तैयार हो जाए, तो प्लास्टिक ट्रे में इस मिश्रण को दबा कर भर लेते हैं. ट्रे में मिश्रण को भरने के बाद उस में बीज की बोआई कर ऊपर से कोकोपिट मिश्रण की एक हलकी परत से ढक दिया जाता है.
ट्रे में तैयार किए जाने वाले इस नर्सरी में पौधों को हलकी सिंचाई की जरूरत होती है. इस की सिंचाई हजारे से किया जाना ज्यादा उचित होता है.
पौलीबैग में नर्सरी तैयार करना
लता वाली सब्जियों की पौध तैयार करने के लिए पौलीथिन की छोटी थैलियों का भी उपयोग किया जा सकता है. इन थैलियों में पौध को उगाने के लिए मिट्टी, खाद व रेत का मिश्रण बराबर के अनुपात में मिला कर भरा जाता है.
मिश्रण भरने से पहले प्रत्येक थैली की तली में 2 से 3 छेद पानी के निकास के लिए बना लेते हैं. बीज को मिश्रण में रोपने के पहले केप्टान दवा की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिला कर उपचारित कर लेते हैं.
बीजों के अच्छे जमाव के लिए उन्हें 6 से 12 घंटे तक पानी में डुबो कर निकाल लेते हैं और फिर किसी सूती कपड़े या बोरे के टुकड़े में लपेट कर किसी गरम जगह पर रख देते हैं. जब बीजों का अंकुरण हो जाए, तो इसे तैयार पौलीबैग में बो देते हैं. इस से जमाव अच्छा होता है. अच्छे जमाव के लिए प्रत्येक थैली में 2 से 3 बीजों की बोआई करना उचित होता है बाद में एक पौधा छोड़ कर अन्य को निकाल देते हैं. बीज रोपाई के बाद इन पैकेटों को लो टनल या पौलीहाउस में रख दिया जाता है.
दोनों विधियों से पौधों की रोपाई करने के लिए अधिक ठंड से बचाने के लिए प्लास्टिक लो टनल के भीतर रख देते हैं. अगर  पौधों में पोषक तत्वों की कमी हो, तो पानी में घुलनशील एनपीके मिश्रण का छिड़काव कर देना चाहिए.
नर्सरी में लतावर्गीय पौधों को तैयार करने के दौरान देखभाल से जुड़ी जरूरी बातें
बस्ती जिले के पचारी कला गांव के प्रगतिशील किसान विजेंद्र बहादुर पाल के अनुसार, लतावर्गीय सब्जियों की नर्सरी तैयार करने के दौरान हमें कुछ विशेष बातों का खयाल रखना पड़ता है, जिस में पहला यह कि नर्सरी में पर्याप्त नमी बनाए रखें. बीज को नर्सरी में बोने के बाद 11वें एवं 21वें दिन 2 मिलीलिटर मैंकोजेब प्रति लिटर पानी के साथ घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए, जिस से कि नर्सरी में आर्द्रगलन, पौधगलन व अन्य फफूंदजनित बीमारियों से बचाव होता है.
यह भी ध्यान दें, जब नर्सरी में पौध 4 से 5 पत्ती वाले यानी 30 से 35 दिन के हो जाएं, तो ऊंची उठी हुई क्यारियों में अथवा गड्ढा बना कर निश्चित दूरी पर पौधों की रोपाई कर लेनी चाहिए.
नर्सरी से सब्जी फसलों की रोपाई से लाभ
सर्द मौसम में सब्जी की रोपाई बीज द्वारा सीधे खेत में किए जाने की अपेक्षा नर्सरी में पौध तैयार कर रोपना ज्यादा मुफीद होता है. इस से न केवल पौधों के लिए उपयुक्त आवश्यक वातावरण प्रदान कर समय से पौधे तैयार किए जा सकते हैं, बल्कि बीज की मात्रा भी कम लगती है और स्वस्थ पौधे भी तैयार होते हैं.
इस विधि से खेती करने से  उत्पादन लागत भी लगती है. चूंकि पौधे नर्सरी में लो टनल में या पौलीहाउस में पौध तैयार करने से वर्षा, ओला, कम या अधिक तापमान, कीड़े व रोगों का प्रभाव पौधों पर कम पड़ता है. नर्सरी में तैयार किए गए पौधों का विकास तेजी से होता है, इसलिए उपज जल्दी मिलनी शुरू हो जाती है.
तैयार पौधों की खेत में रोपाई 
नर्सरी में लतावर्गीय सब्जियों की पौध तैयार कर खेती करने वाले प्रगतिशील किसान राममूर्ति मिश्र का कहना है कि जब नर्सरी में लतावर्गीय सब्जियों के पौधों की खेत में रोपाई के लिए सर्वप्रथम नाली या थाले बना लेना उचित होता है. नाली को पूरब से पश्चिम दिशा की ओर बनाया जाता है. यह नालियां 45 सैंटीमीटर चौड़ी और 30 से 40 सैंटीमीटर गहरी बनाई जाती हैं.
नाली बनाते समय यह ध्यान रखें कि खीरा, टिंडा के लिए एक नाली से दूसरी नाली के बीच की दूरी 2 मीटर और कद्दू, पेठा, तरबूज, लौकी, तोरई के लिए 4 मीटर तक रखी जाए. इसी प्रकार नाली के उत्तरी किनारों पर थाले बनाए जाने चाहिए, जिस में  चप्पन कद्दू, टिंडा व खीरा के लिए 0.50 मीटर रखें.
इसी प्रकार कद्दू, करेला, लौकी, तरबूज के लिए एक मीटर की दूरी रखी जाती है. इन पौधों की रोपाई करने से कम लागत में अधिक पैदावार ली जा सकती है.
किसान राममूर्ति मिश्र के अनुसार, नर्सरी में लतावर्गीय सब्जियों की तैयार पौध की रोपाई फरवरी माह में शुरू करें, क्योंकि तब तक पाला पड़ने की संभावना कम हो जाती है. ऐसे में पौधों को नुकसान से बचाया जा सकता है.
नर्सरी से पौधों को खेत में पौलीबैग या प्लास्टिक ट्रे से पौधा मिट्टी सहित निकाल कर तैयार क्यारियों में शाम के समय रोपें. जैसे ही पौधों की रोपाई खेत में की जाए, उस के तुरंत बाद पौधों की हलकी सिंचाई करना न भूलें. पौधों के खेत में रोपाई के 10 से 15 दिन बाद फसल की निराई कर के खरपतवार साफ कर देना चाहिए. साथ ही, पहली गुड़ाई के बाद जड़ों के आसपास हलकी मिट्टी चढ़ानी चाहिए. खेत में रोपे गए इन लतावर्गीय सब्जियों में जब फूल और फल आ रहा हो, उस समय सिंचाई अवश्य करें.
खाद और उर्वरक 
कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती में विशेषज्ञ फसल सुरक्षा डा. प्रेमशंकर के अनुसार, नर्सरी से तैयार कर लता वाली सब्जियों को खाद व उर्वरक देने में काफी सतर्कता बरती जाए. ऐसे किसानों को रोपाई के पूर्व ही फसल में उर्वरक देने की पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए.
खेत में जब पौध रोपाई के लिए अंतिम जुताई हो जाए, तो उस समय 200 से 500 क्विंटल सड़ी खाद के साथ 2 लिटर ट्राईकोडर्मा मिला देना चाहिए. इस से फसल को मिट्टी से फैलने वाले फफूंद से बचाया जा सकता है.
फसल से अधिक उत्पादन के लिए प्रति हेक्टेयर 240 किलोग्राम यूरिया, 500 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 125 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश की आवश्यकता पड़ती है. इस में सिंगल सुपर फास्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा और यूरिया की आधी मात्रा नाली बनाते समय कतार में डालते हैं, जबकि यूरिया की चौथाई मात्रा रोपाई के 20 से 25 दिन बाद दे कर मिट्टी चढ़ा देते हैं. चौथाई मात्रा 40 दिन बाद टापड्रेसिंग दी जाती है.
पौधों को गड्ढे में रोपते समय प्रत्येक गड्ढे में 30 से 40 ग्राम यूरिया, 80 से 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 40 से 50 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश की मात्रा मिला कर रोपाई की जानी चाहिए.
पौधों की कटाई, छंटाई व सहारा देना
बड़े स्तर पर सब्जियों की खेती करने वाले बस्ती जिले के दुबौलिया गांव के प्रगतिशील किसान अहमद अली का कहना है कि लतावार्गीय सब्जियों की फसल से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए पौध की कटाईछंटाई फायदेमंद होती है. इसलिए पौधों को 3 से 7 गांठ के बाद सभी द्वितीय शाखाओं को काट देना चाहिए. पौधों को सहारा देने के लिए मचान बना कर मचान के खंभों के ऊपरी सिरे पर तार बांध कर पौधों को मचान पर चढ़ा लेते हैं.
इस प्रकार लतावर्गीय सब्जियों की खेती कर के अच्छी उपज एवं आमदनी भी अधिक प्राप्त की जा सकती है.

वैज्ञानिक तरीके से तैयार करें मिर्च की पौधशाला

मिर्च की खेती बरसात में जुलाई से अक्तूबर तक, सर्दी में सितंबर से जनवरी माह तक और जायद मौसम में फरवरी से जून माह तक की जाती है. मिर्च को सुखा कर बेचने के लिए सर्दी के मौसम की मिर्च का इस्तेमाल होता है.

मिर्च की खासीयत यह है कि यदि पौध अवस्था में ही इस की देखभाल ठीक से कर ली जाए तो अच्छा उत्पादन मिलने में कोई शंका नहीं होती है. भरपूर सिंचाई समयानुसार करने से ज्यादा फायदा लिया जा सकता है.

टपक सिंचाई अपनाने से मिर्च की फसल से दोगुनी उपज हासिल की जा सकती है. टपक सिंचाई से 50-60 फीसदी जल की बचत होती है और खरपतवार से नजात मिल जाती है.

पौधशाला के लिए जगह का चुनाव

* पौधशाला के आसपास बहुत बड़े पेड़ नहीं होने चाहिए.

* जमीन उपजाऊ, दोमट, खरपतवार से रहित व अच्छे जल निकास वाली हो, अम्लीय क्षारीय जमीन का चयन न करें.

* पौधशाला में लंबे समय तक धूप रहती हो.

* पौधशाला के पास सिंचाई की सुविधा मौजूद हो.

* चुना हुआ क्षेत्र ऊंचा हो ताकि वहां पानी न ठहरे.

* एक फसल के पौध लगाने के बाद दूसरी बार पौध उगाने की जगह बदल दें यानी फसलचक्र अपनाएं.

क्यारियों की तैयारी व उपचार

पौधशाला की मिट्टी की एक बार गहरी जुताई करें या फिर फावड़े की मदद से खुदाई करें. खुदाई करने के बाद ढेले फोड़ कर गुड़ाई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लें और उगे हुए सभी खरपतवार निकाल दें. फिर सही आकार की क्यारियां बनाएं. इन क्यारियों में प्रति वर्गमीटर की दर से 2 किलोग्राम गोबर या कंपोस्ट की सड़ी खाद मिलाएं.

मिट्टी का उपचार

जमीन में विभिन्न प्रकार के कीडे़ और रोगों के फफूंद जीवाणु वगैरह पहले से रहते हैं, जो मुनासिब वातावरण पा कर क्रियाशील हो जाते हैं व आगे चल कर फसल को विभिन्न अवस्थाओं में नुकसान पहुंचाते हैं. लिहाजा, नर्सरी की मिट्टी का उपचार करना जरूरी है.

सूर्यताप से उपचार

इस विधि में पौधशाला में क्यारी बना कर उस की जुताईगुड़ाई कर के हलकी सिंचाई कर दी जाती है, जिस से मिट्टी गीली हो जाए. अब इस मिट्टी को पारदर्शी 200-300 गेज मोटाई की पौलीथिन की चादर से ढक कर किनारों को मिट्टी या ईंट से दबा दें ताकि पौलीथिन के अंदर बाहरी हवा न पहुंचे और अंदर की हवा बाहर न निकल सके. ऐसा उपचार तकरीबन 4-5 हफ्ते तक करें. यह काम 15 अप्रैल से 15 जून तक किया जा सकता है.

उपचार के बाद पौलीथिन शीट हटा कर खेत तैयार कर के बीज बोएं. सूर्यताप उपचार से भूमिजनित रोग कारक जैसे फफूंदी, निमेटोड, कीट व खरपतवार वगैरह की संख्या में भारी कमी हो जाती है.

रसायनों द्वारा जमीन उपचार

बोआई के 4-5 दिन पहले ही क्यारी को फोरेट 10 जी 1 ग्राम या क्लोरोपायरीफास 5 मिलीलिटर पानी के हिसाब से या कार्बोफ्यूरान 5 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से जमीन में मिला कर उपचार करते हैं. कभीकभी फफूंदीनाशक दवा कैप्टान 2 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से मिला कर भी जमीन को सही किया जा सकता है.

जैविक विधि द्वारा उपचार क्यारी की जमीन का जैविक विधि से उपचार करने के लिए ट्राइकोडर्मा विरडी की 8 से 10 ग्राम मात्रा को 10 किलोग्राम गोबर की खाद में मिला कर क्यारी में बिखेर देते हैं. इस के बाद सिंचाई कर देते हैं. जब खेत का जैविक विधि से उपचार करें, तब अन्य किसी रसायन का इस्तेमाल न करें.

बीज खरीदने में बरतें सावधानी

* बीज अच्छी किस्म का शुद्ध व साफ होना चाहिए, अंकुरण कूवत 80-85 फीसदी हो.

* बीज किसी प्रमाणित संस्था, शासकीय बीज विक्रय केंद्र, अनुसंधान केंद्र या विश्वसनीय विक्रेता से ही लेना चाहिए. बीज प्रमाणिकता का टैग लगा पैकेट खरीदें.

* बीज खरीदते समय पैकेट पर लिखी किस्म, उत्पादन वर्ष, अंकुरण फीसदी, बीज उपचार वगैरह जरूर देख लें ताकि पुराने बीजों से बचा जा सके. बीज बोते समय ही पैकेट खोलें.

बीजों का उपचार : बीज हमेशा उपचारित कर के ही बोने चाहिए ताकि बीजजनित फफूंद से फैलने वाले रोगों को काबू किया जा सके. बीज उपचार के लिए 1.5 ग्राम थाइरम, 1.5 ग्राम कार्बंडाजिम या 2.5 ग्राम डाइथेन एम 45 या 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरडी का प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहिए.

यदि क्यारी की जमीन का उपचार जैविक विधि (ट्राइकोडर्मा) से किया गया है, तो बीजोपचार भी ट्राइकोडर्मा विरडी से ही करें.

बीज बोने की विधि : क्यारियों में उस की चौड़ाई के समानांतर 7-10 सैंटीमीटर की दूरी पर 1 सैंटीमीटर गहरी लाइनें बना लें और उन्हीं लाइनों पर तकरीबन 1 सैंटीमीटर के अंतराल से बीज बोएं.

क्यारियों को पलवार से ढकना : बीज बोने के बाद क्यारी को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पुआल, सरकंडों, गन्ने के सूखे पत्तों या ज्वारमक्का के बने टटियों से ढक देते हैं ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे और सिंचाई करने पर पानी सीधे ढके हुए बीजों पर न पड़े, वरना मिश्रण बीज से हट जाएगा और बीज का अंकुरण प्रभावित होगा.

सिंचाई : क्यारियों में बीज बोने के बाद 5-6 दिनों तक हलकी सिंचाई करें ताकि बीज ज्यादा पानी से बैठ न जाए. बरसात में क्यारी की नालियों में मौजूद ज्यादा पानी को पौधशाला से बाहर निकालना चाहिए.

क्यारियों से घासफूस तब हटाएं, जब तकरीबन 50 फीसदी बीजों का अंकुरण हो चुका हो. बोआई के बाद यह अवस्था मिर्च में 7-8 दिनों बाद, टमाटर में 6-7 दिनों बाद व बैगन में 5-6 दिनों बाद आती है.

खरपतवार नियंत्रण : क्यारियों में उपचार के बाद भी यदि खरपतवार उगते?हैं, तो समयसमय पर उन्हें हाथ से निकालते रहना चाहिए. इस के लिए पतली और लंबी डंडियों की भी मदद ली जा सकती है.

बेहतर रहेगा, अगर पेंडीमिथेलिन की 3 मिलीलिटर मात्रा को प्रति लिटर पानी में घोल कर बोआई के 48 घंटे के भीतर क्यारियों में अच्छी तरह छिड़क दें.

पौध विगलन : अगर क्यारियों में पौधे अधिक घने उग आए हैं तो उन को 1-2 सैंटीमीटर की दूरी पर छोड़ते हुए दूसरे पौधों को छोटी उम्र में ही उखाड़ देना चाहिए, वरना पौधों के तने पतले व कमजोर बने रहते हैं.

वैसे, घने पौधे पदगलन रोग लगने की संभावना बढ़ाते हैं. उखाड़े गए पौधे खाली जगह पर रोपे जा सकते हैं.

पौध सुरक्षा: पौधशाला में रस चूसने वाले कीट जैसे माहू, जैसिड, सफेद मक्खी व थ्रिप्स से काफी नुकसान पहुंचता है. विषाणु अन्य बीमारियों को फैलाते?हैं, लिहाजा इन के नियंत्रण के लिए नीम का तेल 5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में या डाईमिथोएट (रोगोर) 2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल बना कर बोआई के 8-10 दिनों बाद और 25-27 दिनों बाद दोबारा छिड़कना चाहिए.

क्यारी और बीजोपचार करने के बाद भी अगर पदगलन बीमारी लगती है (जिस में पौधे जमीन की सतह से गल कर गिरने लगते हैं और सूख जाते हैं), तो फसल पर मैंकोजेब या कैप्टान 2.5 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

पौधे उखाड़ना : क्यारी में तैयार पौधे जब 25-30 दिनों के हो जाएं और उन की ऊंचाई 10-12 सैंटीमीटर की हो जाए या उन में 5-6 पत्तियां आ जाएं, तब उन्हें पौधशाला से खेत में रोपने के लिए निकालना चाहिए.

क्यारी से पौध निकालने से पहले उन की हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. सावधानी से पौधे निकालने के बाद 50 या 100 पौधों के बंडल बना लें.

पौधों का रोपाई से पहले उपचार : पौधशाला से निकाले गए पौध समूह या रोपी गई जड़ों को कार्बंडाजिम बाविस्टीन 10 ग्राम प्रति लिटर पानी में बने घोल में 10 मिनट तक डुबोना चाहिए, रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई जरूर करें.

गरमी के मौसम में कतार से कतार की दूरी 45 सैंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 30 सैंटीमीटर और बरसात में कतार से कतार की दूरी 60 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 45 सैंटीमीटर रखें.