बागबानी : शहतूत की खेती (Mulberry Cultivation)

बीते दशक में किसान जहां एक तरफ मौसम की मार से हलकान हैं, तो वहीं दूसरी तरफ सरकार के उदासीन रवैए ने तोड़ कर रख दिया है. ऐसे में खाद व बीज की किल्लत, खेती में बढ़ती लागत व घाटे की खेती से उबरने के लिए किसानों को कुछ ऐसा करना होगा, जिस से उन की माली हालत में सुधार हो, बल्कि वह खेती के घाटे से उबर पाने में सक्षम हो.

किसान नकदी फसल के रूप में अगर शहतूत की नर्सरी तैयार करें और खेती की तरफ कदम बढ़ाएं, तो वे अपने हालात को सुधार सकते हैं. शहतूत की पत्तियों से कीटपालन करने के इच्छुक किसान रोजगार के बेहतर अवसर ले सकते हैं. रेशम कीटपालन करने वालों को शहतूत की पत्तियों की जरूरत पड़ती है. किसान शहतूत की खेती कर कीट पालें, तो वे ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं.

रेशम कीटपालन के व्यवसाय में 50 फीसदी खर्च पत्तियों पर ही हो जाता है, जिस पर रेशम कीट का जीवनचक्र चलता है. इसी जीवनचक्र में ये कीट रेशम के कोए को बनाते हैं. रेशम का कोया 300 से 400 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से आसानी से बेचा जा सकता है.

शहतूत की नर्सरी तैयार करना

हम सभी जानते हैं कि पेड़पौधे लगाने के लिए हमें स्वस्थ पौधों पर आश्रित रहना होता है और हम एक अच्छी नर्सरी से ही अच्छा पौधा प्राप्त कर सकते हैं. शहतूत के पौधे को तैयार करने की अनेक विधियां हैं :

– बीज द्वारा

– ग्राफ्टिंग द्वारा

– लेयरिंग द्वारा

– कटिंग द्वारा

कम लागत में उच्च गुणवत्ता के पौधे कटिंग विधि से ही तैयार किए जाते हैं. उन्नत किस्म के शहतूत की कटिंग तैयार करने के लिए 6 से 9 महीने पुरानी टहनियों को काट लेते हैं और उन टहनियों को छाया में रखते हैं, जिस से कि सूखने न पाएं. फिर टहनियों को 6-8 इंच लंबी 45 डिगरी त्रिकोण पर तेज धार के चाकू या सिकटियर से काट लेते हैं, जिस से सिरे पर टहनियों का छिलका न निकलने पाए.

कटिंग करते समय यह ध्यान रहे कि वहां की टहनी लें, जिस की मोटाई तकरीबन 22 सैंटीमीटर या एक पैंसिल जितनी मोटी हो और उस में 4-5 बड (कली) हों.

अगर आप को तुरंत कटिंग न लगाना हो, तो उसे बंडल बना कर मिट्टी या बोरे से ढक दें और हलकी सिंचाई करते रहें. जब खेत में लगाना हो, तब सीधे ही रोपाई करें.

पौधशाला में कटिंग को लगाने का समय व तरीका

पौधशाला में शहतूत की कटिंग लगाने का बेहतर समय जुलाईअगस्त व दिसंबरजनवरी होता है. दिसंबरजनवरी में लगाई गई कटिंग जुलाईअगस्त में और जुलाईअगस्त में लगाई गई कटिंग दिसंबरजनवरी में खेत में रोपने के लिए तैयार हो जाती है.

पहले छोटीछोटी क्यारी तैयार करें, फिर 6-6 इंच की दूरी पर लंबीलंबी लाइन बना लें. उस के बाद दोतिहाई भाग 3 इंच की दूरी पर लाइनों में तिरछा गाड़ दें. 8-10 लाइन लगाने के बाद एक फुट की जगह छोड़ दें, ताकि घास निकालने में आसानी हो. कटिंग लगाने के बाद चारों ओर की मिट्टी दबा दें और भुरभुरी गोबर की खाद बिछा कर सिंचाई कर दें.

एक एकड़ पौधशाला में कटिंग से 6-8 पत्ती आने के बाद 15-20 दिन पर उर्वरक का प्रयोग करें और तुरंत बाद सिंचाई करें.

दीमक से बचाव के लिए एल्ड्रिन का प्रयोग करें.

रोपण विधि

नर्सरी में कटिंग लगाने के 6 माह बाद नर्सरी में पौधे रोपण को तैयार हैं. एक एकड़ खेत में लगभग 5,000 पौधों की आवश्यकता पड़ती है. इन की रोपाई 3×3 अथवा 6×3×2 मीटर की दूरी पर करें.

पौधे के विकास में एक वर्ष लगता है. तीसरे वर्ष से उचित देखभाल करने पर एक एकड़ में लगभग 10,000 किलोग्राम पत्ती का उत्पादन किया जा सकता है. इतनी पत्ती पर 300 किलोग्राम कोया उत्पादन हो सकता है.

शहतूत की प्रजाति

के-2, एस-146, टीआर-10, एस-54 आदि शहतूत की उन्नति प्रजातियां हैं, जिन का प्रयोग कर किसान ज्यादा लाभ ले सकते हैं.

भूमि का चयन

शहतूत के लिए बलुई व दोमट मिट्टी सब से अच्छी है. सिंचाई की अच्छी व्यवस्था के साथ जिस खेत में वर्षा का पानी न रुके, ऐसी समतल जमीन में शहतूत अच्छे ढंग से तैयार किया जा सकता है.

खेत में जलनिकासी का अच्छा प्रबंध हो व खेत बाढ़ क्षेत्र में न हो. पौधों की रोपाई के पूर्व खेत की गहरी जुताई करें व खरपतवार, कंकड, पत्थर निकाल दें और 5-6 टन प्रति एकड़ कंपोस्ट खाद मिला दें.

खाली जगह की भराई (गैप फिलिंग)

वृक्षारोपण के एक माह बाद खेत का सूक्ष्म निरीक्षण करें और देखें कि जो पौधे सूख गए हैं, उन की जगह नए पौधे लगाएं. यही प्रक्रिया गैप फिलिंग कहलाती है. इसे वृक्षारोपण के 45 दिन के भीतर पूरा कर लें.

उर्वरक, कीटनाशक व सिंचाई

वृक्षारोपण के 2-3 माह बाद प्रति एकड़ 50 किलोग्राम नाइट्रोजन का प्रयोग करें और सिंचाई कर निराईगुड़ाई करें. जुलाई, अगस्त महीने में बारिश न होने पर 15-20 दिनों पर सिंचाई की व्यवस्था करें. मईजून महीने में सिंचाई का विशेष ध्यान रखें.

दीमक लगने पर खेत तैयार करते समय प्रति एकड़ 100 किलोग्राम बीएचसी पाउडर 20 फीसदी, एल्ड्रिन 5 फीसदी मिलाएं.

कटाइछंटाई (प्रूनिंग)

शहतूत से लगभग 15 सालों तक उचित देखभाल कर उच्च गुणवत्ता की पत्तियां प्राप्त की जा सकती हैं. इस की कटाईछंटाई जूनजुलाई माह में जमीन से 6 इंच की ऊंचाई से व दिसंबर के मध्य में जमीन से 3 फुट की ऊंचाई पर करते हैं. कटाईछंटाई करते समय ध्यान रखें कि पौधे की छाल न निकले.

साल में 2 बार कटाईछंटाई से ज्यादा पत्तियां प्राप्त की जा सकती हैं. वृक्षनुमा पेड़ की छंटाई वर्ष में एक बार दिसंबर माह में की जा सकती है. कटाईछंटाई से ज्यादा पत्ते आने पर ज्यादा लाभ मिलेगा, क्योंकि कोया उत्पादन में 50 फीसदी व्यय पत्तियों पर आता है.

लाभ

शहतूत की खेती के लिए एक एकड़ में लगभग 5,000 पौध की आवश्यकता होती है, जबकि एक पौधे 2 से ढाई रुपए तक मिल जाते हैं. एक किलोग्राम कोया की कीमत तकरीबन 250-300 रुपए है, जिसे रेशम पालन विभाग को आसानी से बेचा जा सकता है. कीमत में उतारचढ़ाव होते रहते हैं.

फलदार पौधों (Fruit plants) को रोपने से पहले करें यह तैयारी

मानसून के दस्तक देने के साथ ही अधिकतर फलदार आम, नीबू, अमरूद, लीची, अनार आदि पौधों की रोपाई का काम शुरू हो जाता है. फलदार पौधे की रोपाई के बाद सूखे न और उन का समुचित विकास हो, इस के लिए जरूरी हो जाता है कि किसान पौध रोपाई के पूर्व की जाने वाली सावधानियों और कामों को समय से पूरा करें.

तुरंत गड्ढा खोद कर पौध लगाने से एक तो पौध की सही से बढ़वार नहीं हो पाती और जड़ें नीचे तक नहीं जा पाती हैं. वहीं पौधे को पोषक तत्त्वों की खुराक नहीं मिल पाती और पत्तियां जलने लगती हैं.

इस के अलावा पौधा गोमोसिस बीमारी की चपेट में आ जाता है, जो धीरेधीरे सूख जाता है. बाग लगाने के पहले खोदे गए गड्ढे में पौध रोपण से पौधे को भरपूर पोषक तत्त्व मिलते हैं और फल भी जल्दी प्राप्त होने लगता है.

एक बात का खास खयाल रखें कि बाग लगाने की तैयारी कर रहे हैं, तो मिट्टी जांच जरूर कराएं, इसलिए बगीचों की स्थापना के लिए जगह के चयन, रेखांकन के बाद गड्ढे बनाने का काम जल्द पूरा किया जाना चाहिए. समय पर इस में डाले जाने वाले उर्वरक और खाद को मिट्टी में मिला कर इन का उचित रोपण करें.

ये काम पौध रोपित करने के बाद नहीं किए जा सकते हैं, इसलिए खेत की तैयारी और गड्ढा बनाने का काम शीघ्र पूरा करना चाहिए. पौधा लगाते समय अगर किसी प्रकार की कोई कमी रह जाती है, तो बगीचों के संपूर्ण जीवनकाल में इस कमी को पूरा नहीं किया जा सकता है.

जो किसान मानसून सीजन में पौध रोपण की तैयारी कर रहे हैं, वे जिस खेत का चुनाव बाग लगाने के लिए कर रहे हैं, उस खेत के खाली होने की दशा में अप्रैल महीने में सिंचाई करने के बाद उचित नमी रहते जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बना कर समतल कर लेना जरूरी हो जाता है. इस दौरान यह सुनिश्चित कर लें कि खेत में खरपतवार न हों. खरपतवार होने की दशा में खेत से खरपतवार हटा दें.

पौध रोपने लिए खेत की तैयारी और दूरी का निर्धारण

बाग लगाने के लिए जब आप रेखांकन यानी पौध से पौध और लाइन से लाइन की दूरी का निर्धारण कर रहे हों, तो यह सुनिश्चित कर लें कि जब बाग सघन हो जाएं, तब भी सूरज की सही रोशनी पेड़ों को मिलती रहे. इस के लिए किसान पौधों की बढ़वार के हिसाब से दूरी तय कर सकते हैं.

वर्गाकार विधि दूसरी सभी विधियों में सब से अच्छी और सफल मानी जाती है, क्योंकि इस में पौधों से पौधों की दूरी और पंक्ति से पंक्ति की दूरी समान होती है. पौधों के रोपने के लिए सीधी लाइनों का निर्धारण करने के लिए आप रस्सियों या बड़े इंचटेप का सहारा ले सकते हैं.

जब आप पौध लगाने के लिए रेखांकन कर रहे हों, उसी दौरान यह सुनिश्चित कर लें कि जितनी दूरी पर आप को पौध रोपना है, वहां कोई लकड़ी का टुकड़ा या खूंटी गाड़ते जाएं, जो बाद में गड्ढा खुदाई के काम को आसान कर देता है.

अगर आप बड़ी लंबाई और सघनता वाले पारंपरिक किस्मों की रोपाई करने जा रहे हैं, तो उस के लिए पौध से पौध और लाइन से लाइन 10×10 मीटर की सीधी दूरी पर वर्गाकार स्थिति में रखें, जबकि मध्यम लंबाई वाली किस्मों के लिए 5 से 6 मीटर लाइन से लाइन और 5 से 6 मीटर पौध से पौध की दूरी का निर्धारण करते हुए रेखा खींच लें, जबकि आम्रपाली, सेंसेशन, टौमी एटकिंस, अरुणिका, अरुणिमा या अन्य फलदार पौधों की बौनी किस्मों के लिए 3 से 4 मीटर लाइन से लाइन और 3 से 4 मीटर पौध से पौध की दूरी रखते हुए रेखांकन कर लें.

गड्ढों की खुदाई और भराई

बाग लगाने के लिए जब आप दूरी का रेखांकन कर लें, तो निर्धारित की गई दूरी पर ट्रैक्टर से संचालित होने वाले होल डिगर या फावड़े से बड़े लंबाई वाले पेड़ों के लिए 1 मीटर गहरा, 1 मीटर चौड़ा और 1 मीटर लंबा, जबकि मध्यम और बौने किस्म के फल पेड़ों के लिए आधा मीटर गहरा और आधा मीटर चौड़ा और आधा मीटर लंबा गड्ढा खोद लें.

इस दौरान यह ध्यान रखें कि गड्ढे से निकाली गई निचली और ऊपरी सतह की मिट्टी अलगअलग रखनी चाहिए, जो बाद में गड्ढा भराई के दौरान काम आती है. गड्ढा खुदाई से निकाली गई मिट्टी को कम से कम 14 दिनों तक कड़ी धूप में पड़ा रहने दें. इस से मिट्टी के नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े और खरपतवार समाप्त हो जाते हैं.

जब मिट्टी पूरी तरह से धूप से शोधित हो जाए, तो प्रति गड्ढा 40 से 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई या कंपोस्ट खाद, 100 ग्राम से 500 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 500 ग्राम से 1 किलोग्राम पोटाश को अच्छी तरह से मिला लेना चाहिए. इस के बाद गड्ढे से निकाली गई ऊपर वाली मिट्टी को पहले और नीचे वाली मिट्टी को बाद में गड्ढों में डालते हुए भराई कर देनी चाहिए.

मिट्टी की भराई के दौरान इस बात का ध्यान रखें कि जब आप गड्ढों की भराई कर रहे हों, तो गड्ढे में आसपास की सतह से कम से कम 20 सैंटीमीटर से अधिक मिट्टी की ऊंचाई रखें. ऐसा करने से रोपे जाने वाले पौधों के आसपास जल जमाव की स्थिति नहीं होती है.

गड्ढा भराई के तुरंत बाद ही सभी गड्ढों के बीचोंबीच कोई मजबूत लकड़ी की खूंटी गाड़ दें, जो बाद में पौध रोपण के दौरान यह निर्धारित करता है कि गड्ढे के मध्य खूंटी वाली जगह है और उसी स्थान पर पौधों की रोपाई की जानी है.

गड्ढों में यह प्रक्रिया पूरी करने के बाद अगर बारिश हो जाती है तो ठीक है, नहीं तो भरे गए गड्ढों की सिंचाई कर दें. इस से गड्ढों वाली जगह की मिट्टी जितनी बैठनी होगी उतनी बैठ जाती है. बाग लगाने के लिए तैयार किए गए गड्ढे मानसून की 2-3 बारिश के बाद पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाता है.

फलदार पौधों (Fruit plants)

फलदार पौधों के रोपाई का सब से मुफीद समय जुलाई से सितंबर महीने का होता है. आप बाग लगाने के लिए जब भी पौधे खरीदें, तो यह तय कर लें कि या तो वह सरकारी पौधशाला हो या सरकार द्वारा लाइसैंसप्राप्त पंजीकृत पौधशाला हो.

आप जब भी पहले तैयार गड्ढों में पौध रोपण करने जाएं, तो पौध रोपण के 5 दिन पहले दीमकरोधी के साथ अन्य नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों से पौधों को बचाने के लिए ऊपरी सतह को क्लोरोपाइरीफास या फेनवैलरेट दवाओं से उपचारित कर लें.

इस के बाद गड्ढे को तैयार करते समय गड्ढों के बीचोंबीच जो खूंटियां गाड़ी थीं, उसे उखाड़ कर वहां पौध रोपण के लिए पौलीपैक या पिंडी के बराबर गहराई के गड्ढे खोद लें और पिंडी से प्लास्टिक कवर को हटा कर पौधे की रोपाई कर दें. इस के बाद मिट्टी को अच्छी तरह से दबा कर पौधों को तुरंत पानी दें या सिंचाई कर दें.

पौध रोपाई के बाद पौधों की उचित बढ़वार और फलन प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि आप समयसमय पर पौधों को खादउर्वरक देने के साथ ही निराईगुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण का काम करते रहें. साथ ही, पौधों में कीट व रोगों की रोकथाम के लिए समयसमय पर निगरानी भी करते रहें.

अगर पौधे में किसी तरह का कीट व रोग दिखाई पड़ता है, तो अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि महकमे या कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों से सलाह ले कर उचित उपाय अपनाएं.

बाग लगाने के दौरान इन बातों का रखें विशेष खयाल

* किसान जब पौधे की रोपाई कर रहे हों, तो यह ध्यान रखें कि पौधों को गड्ढे में उतनी गहराई में ही लगाएं, जितना कि वह नर्सरी या गमले में या पौलीथिन की थैली में था, क्योंकि पौधे को अधिक गहराई में लगाने से तने को हानि पहुंचती है और कम गहराई में लगाने से जड़ें मिट्टी के बाहर जाती हैं, जिस से उन को नुकसान पहुंचता है.

* पौधों को रोपने के पहले उस की अधिकांश पत्तियों को तोड़ देना चाहिए, लेकिन ऊपरी भाग की 4-5 पत्तियां लगी रहने देना चाहिए, क्योंकि पौधों में अधिक पत्तियां रहने से जमीन से पानी अधिक उड़ता है. इस वजह से पौध जमीन से पानी नहीं खींच पाते, क्योंकि जड़ें क्रियाशील नहीं हो पाती हैं. इस के चलते पानी की कमी से पौधा मर भी सकता है.

* पौधे का कलम किया हुआ स्थान भूमि से ऊपर रखें, अन्यथा मिट्टी में दब जाने से वह स्थान सड़ने लग जाता है और पौधा मर सकता है.

* पौधे में ग्राफ्टिंग के जोड़ की दिशा दक्षिणपश्चिम की ओर रहनी चाहिए, इस से तेज हवा से जोड़ टूटता नहीं है.

* जब पौध को रोप लें, तो उस के आसपास की मिट्टी अच्छी तरह से दबा देनी चाहिए, जिस से सिंचाई करने में पौधा टेढ़ा न हो.

* पौधा लगाने के तुरंत बाद ही सिंचाई करनी चाहिए.

* जहां तक मुमकिन हो, पौधे शाम को ही लगाए जाने चाहिए.

* यदि पौधे दूर के स्थान से लाए गए हैं, तो उन्हें पहले गमले में रख कर एक सप्ताह के लिए छायादार स्थान में रख देना चाहिए. इस से पौधों के आवागमन में हुई क्षति पूरी हो जाती है. इस के पश्चात उन्हें गड्ढों में लगाना चाहिए. तुरंत ही गड्ढे में लगा देने से पौधों के मरने का डर रहता है.

पौधों का चयन करते समय रखें खास खयाल

* आप जब भी पौधशाल से पौधे खरीदें, तो यह सुनिश्चित कर लें कि पौधों में कलम बांधें यानी ग्राफ्टिंग किए हुए कम से कम उस की अवधि एक वर्ष हो गई हो. इस से पौधों के सूखने की संभावना नहीं होती है.

* जब भी पौधे खरीदें, उस की विश्वसनीयता की जांच जरूर करें. उस नर्सरी से पौधे नहीं लेने चाहिए, जिस के पास मदर प्लांट न हो.

* यह सुनिश्चित कर लें कि रोपे जाने वाले पौधे किसी भी प्रकार के रोग से संक्रमित न हों.

* एक तने वाले सीधे, कम ऊंचाई वाले, फैले हुए उत्तम रहते हैं.

* पौधों का मिलन बिंदु यानी जहां कलम बांधी गई है या ग्राफ्टिंग की गई है, वह अच्छी तरह जुड़ा हो.

* हमेशा पौलीपैक यानी पौलीथिन में लगाए गए पौधे ही खरीदें.

लीची की उन्नत बागबानी (Litchi Horticulture)

गरमियों में बिकने वाले लजीज फलों में लीची सब से ज्यादा पसंद किया जाने वाला फल है. यह बहुत स्वादिष्ठ और रसीला फल है. इस के खाए जाने वाले भाग को ‘एरिल’ कहते हैं. लीची को भारत में ताजा फल के रूप में खाया जाता है, जबकि लीची को चीन और जापान में यह सूखे फल के रूप में खाया जाता है.

लीची को पकाने के लिए किसी भी कैमिकल की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि यह कुदरती रूप से ही पकता है, इसलिए इसे स्वाद और सेहत का खजाना माना जाता है.

फलों के राजा आम से ठीक पहले बाजार में आ जाने के चलते किसानों के लिए आर्थिक लिहाज से काफी महत्त्वपूर्ण माना जाता है. लीची का फल लाल रंग का होता है, इसीलिए इसे ‘फलों की रानी’ कहते हैं.

अगर क्षेत्रफल के लिहाज से देखा जाए, तो भारत चीन के बाद पूरी दुनिया में दूसरे नंबर पर है. जबकि चीन पहले स्थान पर है. भारत फलों के क्षेत्रफल और उत्पादन की नजर से दुनिया में 9 वें नंबर पर है.

भारत में लीची का औसत उत्पादन 6 टन प्रति हेक्टेयर है, देश में बिहार लीची उत्पादन में पहले नंबर पर है, जबकि पश्चिम बंगाल दूसरे नंबर पर है.

लीची के फल की ऋतु बहुत छोटी होती है, जो 45 से 60 दिन की होती है. इस के ठीक बाद आम की फसल आ जाती है. कभीकभी कम समय में लीची के अधिक उत्पादन से किसानों को भारी माली नुकसान उठाना पड़ता है.

बाजार में लीची के फलों की बाढ़ आ जाती है. लीची का फल चूंकि पकी अवस्था में तोड़ा जाता है, इसलिए यह लंबे समय तक टिक नहीं पाता और किसान को इसे औनेपौने दाम पर बेचना पड़ता है.

इस नुकसान से बचने के लिए हमारे किसानों को फल की तुड़ाई के प्रबंधन की जानकारी होनी चाहिए. फल प्रबंधन में फल तोड़ने के बाद प्रीकूलिंग, सल्फरिंग और कम तापमान पर स्टोर करना होगा.

बागबानी के लिए मुफीद आबोहवा

लीची समशीतोष्ण फल है. यह कम ऊंचाई और अच्छे जल निकास वाली भूमि में आसानी से उगाया जा सकता है.

लीची की खेती हलकी अम्लीय मिट्टी में बहुत अच्छे तरीके से की जा सकती है, इसलिए ऐसे क्षेत्रों में, जहां का तापमान 7 डिगरी से 40 डिगरी सैल्सियस के मध्य होता है, वहां लीची का उत्पादन बहुत अच्छा होता है. फ्लावरिंग के समय वर्षा जहां न होती हो, वहां पर लीची का अच्छा उत्पादन होता है.

देश में लीची त्रिपुरा से ले कर जम्मू तक, हिमालय के तलहटी क्षेत्र में जहां जलोढ़ भूमि है, इस की खेती बहुत सुगमता से होती है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक इस की खेती का विस्तार हुआ है.

लीची की उन्नत किस्में

अगर हम देश में उगाई जाने वाली लीची की उन्नत किस्मों की बात करें, तो हमारे देश में प्रचलित प्रमुख जातियों में चाइना, शाही, मुजफ्फरपुर, अर्ली बेदाना, लेट बेदाना और इलायची कोलकाता जैसी उन्नत किस्मों की बागबानी की जाती हैं.

खेत की तैयारी

लीची के पौधों की रोपाई के पूर्व भूमि को समतल कर लेना चाहिए. नए पौधे की स्थापना के लिए पहले गहरी जुताई जरूरी है. पौधों की रोपाई से पहले हैरो से जुताई कर 10 3 10 मीटर की दूरी पर पौधों को लगाना चाहिए. पौधों को रोपने के पहले एक मीटर लंबे, एक मीटर चौड़े और एक मीटर गहरे आकार के गड्ढे खोद लेने चाहिए.

इन गड्ढों में 20 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद, 2 किलोग्राम हड्डी का चूर्ण, 300 ग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम लीची के खेत की मिट्टी इन गड्ढों में भरनी चाहिए.

लीची के बाग की मिट्टी में माइकोराइजा नामक कवक होता है, जो लीची के पौधों को जरूरी पोषक तत्त्व भूमि से उपलब्ध कराता है और लीची की जड़ों के विकास में सहयोग करता है. इन गड्ढों के मध्य में जुलाईअगस्त के महीने में या फिर सिंचाई की सुविधा अगर उपलब्ध है, ड्रिप इरीगेशन है, तो वसंत ऋतु में भी इस के पौधे लगाए जा सकते हैं.

लीची के पौध रोपने के तुरंत बाद सिंचाई कर देनी चाहिए. पौधों को गरमी से बचाने के लिए विंड ब्रेक का निर्माण करना चाहिए. इस के लिए दक्षिण दशा और पश्चिम दिशा में गरम हवा रोकने वाले लंबे पौधों को लगाना चाहिए. लीची का पौधा अच्छे आकार का हो, इसलिए ट्रेनिंग और प्रूनिंग जरूर करनी चाहिए.

लीची के पौधे का सफल उत्पादन लेने के लिए 10 साल से व्यावसायिक उत्पादन प्रारंभ हो जाता है. उस समय 50 से 60 किलोग्राम गोबर की खाद, 2 किलोग्राम फास्फोरस और 600 ग्राम पोटाश अच्छे तरीके से जितने में पौधे की छाया हो, मिला देनी चाहिए. लीची बहुत ही हार्डी पौधा है, इसलिए कम से कम सिंचाई में भी अच्छा उत्पादन हो जाता है.

लीची की उन्नत बागबानी (Litchi Horticulture)

फूल का रखें ध्यान

जब लीची में फूल आने वाले हों, उस के 2 महीने पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए और जब उन की फलियां मटर के दाने के बराबर हो जाएं, तो हर 15 दिन पर उचित नमी बनाए रखने के लिए सिंचाई करते रहना चाहिए.

लीची में सिंचाई की 3 प्रमुख विधियां हैं, बेसिन या ताला विधि, अंगूठी विधि और आधुनिक सिंचाई विधि में ड्रिप इरीगेशन या टपक सिंचाई बहुत उपयोगी है.

सिंचाई और जल प्रबंधन के साथ भूमि संरक्षण के लिए मल्चिंग का बहुत बड़ा योगदान है. इसलिए एक हेक्टेयर में जो भी फसल अवशेष हों, उस पर 20 से 30 किलोग्राम कैल्शियम नाइट्रेट का छिड़काव प्रत्येक फसल अवशेष के ऊपर करने से यह अवशेष जल्दी अपघटित हो जाते हैं और जल संरक्षण के साथ खरपतवार से बचाव, रोगों से बचाव और कीड़ों से बचाव में अहम भूमिका निभाते हैं.

सहफसली के रूप में ले सकते हैं अधिक मुनाफा

लीची के बाग में खाली जगह पर गरमी के महीने में कद्दूवर्गीय फसलें और जाड़े के महीने में मटर, चना, मूली जैसी फसलें लगा कर अतिरिक्त लाभ लिया जा सकता है, जबकि लीची के बड़े पौधे हो जाने पर छाया में हलदी और अदरक की खेती कर अतिरिक्त लाभ उठाया जा सकता है.

कीट व बीमारियों की रोकथाम

लीची की फसल में फल बेधक कीट अधिक नुकसान पहुंचाते हैं. लीची में कोई विशेष रोग नहीं लगता है, लेकिन फल गिरने और फटने की समस्या आमतौर पर देखने को मिलती है. इस के लिए हमेशा सजग रहना चाहिए.

लीची की शाही प्रजाति फल फटने की समस्या से ज्यादा ग्रसित पाई गई है. यह चाइना की अपेक्षा शीघ्र पकने वाली प्रजाति है. इस के नियंत्रण के लिए खेत में नमी बनाए रखना चाहिए और 20 पीपीएम तक एनए नामक हार्मोन का प्रयोग लाभदायक है.

जब लीची के फल मटर के दानों के बराबर हो जाएं, तो 0.4 फीसदी बोरिक एसिड या 10 फीसदी, तो 10 पीपीएम तक टू4डी का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए.

फलों की तुड़ाई फलों के हलके गुलाबी रंग की शुरुआत होने पर करनी चाहिए. लीची नौनक्लाइमेट्रिक फल है, इसलिए यह पकी अवस्था में तोड़ा जाता है. यह 1-2 दिन में ही खराब होने लगते हैं. इस के चलते किसान को किसी भी दाम पर बेचने और भेजने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

आधुनिक तकनीकी में 1.6 से 1.7 डिगरी सैंटीग्रेड और सापेक्ष आर्द्रता 85 से 90 फीसदी रख कर लीची को 8 सप्ताह तक स्टोर किया जा सकता है, इसलिए बहुत ध्यान से लीची की तुड़ाई, कुछ पत्तियों के साथ गुच्छे में करने से इस की गुणवत्ता बनी रहती है. लीची का व्यावसायिक उत्पादन 10 साल से होने लगता है. लीची में कार्बनिक खेती बहुत ही लाभदायक है.

किसान ने बागबानी (Gardening) से की बंपर कमाई

भिंड : सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए उद्यानिकी फसलों के लिए प्रोत्साहित कर रही है. इस की महत्ता को समझ कर कई किसान परंपरागत खेती को छोड़ कर बागबानी कर रहे हैं. ऐसे ही भिंड जिले के विकासखंड अटेर के ग्राम ऐंतहार के प्रगतिशील किसान डीपी शर्मा ने परंपरागत खेती को छोड़ बागबानी शुरू की और अब वे इस से अच्छी आमदनी कर रहे हैं.

किसान डीपी शर्मा ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र और उद्यानिकी विभाग से परामर्श ले कर 8 अगस्त, 2020 को वीएनआर अमरूद का बगीचा लगाया गया, जिस में 550 पौधे अमरूद के और 50 पौधे नीबू, 100 पौधे करौंदा और  11 पौधे कटहल का रोपण किया गया.

उन्होंने बताया कि उद्यानिकी विभाग भिंड की तरफ से उन के बगीचे में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगवाया गया है. ड्रिप के माध्यम से सभी पौधों को पर्याप्त मात्रा में पानी और खाद दिया जा रहा है. वर्तमान में पौधे में लगभग 18 महीने में फल आने लगे हैं, जिस में एक फल लगभग 400 ग्राम से ले कर 650 ग्राम तक का अमरूद का उत्पादन होने लगा है.

किसान डीपी शर्मा ने किसानों को संदेश दिया है कि धान व गेहूं की खेती में पानी ज्यादा लगता है, जलस्तर को बचाने के लिए बागबानी की तरफ रुझान बढ़ाएं. अमरूद का बाग लगा कर अन्य किसान भी अच्छी आमदनी कर सकते हैं. पानी की बचत में बागबानी खेती सब से बेहतर है.

संस्थान ने किया मशरूम की अच्छी प्रजातियों का विकास

सोनीपत: महाराणा प्रताप उद्यान विश्वविद्यालय, करनाल के कुलपति डा. सुरेश कुमार मल्होत्रा ने क्षेत्रीय मशरूम अनुसंधान केंद्र, मुरथल, सोनीपत का औचक निरीक्षण किया.

निरीक्षण के दौरान उन्होंने पौलीहाउस, नेटहाउस और ओपन में लगी सब्जियों की फसल को देखा और प्रगति के बारे में पूछा.

कुलपति डा. सुरेश कुमार मल्होत्रा ने क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र से जानकारी हासिल की कि केंद्र में कौनकौन सी फसलों के बीज किसानों को दिए जा रहे हैं.

कुलपति डा. संजीव कुमार मल्होत्रा को अनुसंधान केंद्र द्वारा किसानों को दिए जाने वाले बीज व मशरूम के बीज और पौध के बारे में विस्तार से जानकारी दी.

कुलपति डा. संजीव कुमार मल्होत्रा ने अनुसंधान केंद्र द्वारा उत्कृष्ट कार्य किए जाने की सराहना की और सुझाव दिया कि इस केंद्र ने ओस्टर मशरूम और बटन मशरूम की बहुत अच्छी प्रजातियों का विकास किया है. इन सभी प्रजातियों के नामाकंन करने की आवश्यकता है. संरक्षित खेती की अवसंरचनाओं में केंद्र द्वारा शिमला मिर्च, टमाटर या बंदगोभी की जो किस्में लगाई जा रही हैं, उन पर रिसर्च कर इस क्षेत्र की कृषि जलवायु के लिए प्रजनन का काम शुरू हो, ताकि किसानों को एमएचयू की किस्मों से ज्यादा से ज्यादा लाभ पहुंचे.

उन्होंने वैज्ञानिकों से कहा कि जिस उद्देश्य के लिए यूनिवर्सिटी की स्थापना की है, उस पर सभी को तेजी से आगे बढ़ना है, ताकि किसानों को विश्वविद्यालय से उच्च गुणवत्ता के बीज व पौध मिलें. साथ ही, नईनई तकनीकों का विकास कर के किसानों को उपलब्ध कराई जाए. उन्होंने वैज्ञानिकों से यह भी आग्रह किया कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में किसानों को बागबानी विश्वविद्यालय के साथ जोड़ा जाए.

किचन गार्डन बनाएं – उगाएं सब्जियां और फल

अगर आप हर रोज ताजी और हरी सब्जियों के खाने के शौकीन हैं तो आप के लिए किचन गार्डन सब से मुफीद तरीका हो सकता है. बस इस के लिए आप को घर का प्लान करने के समय ही ध्यान देने की जरूरत होती है. आप जब भी घर बनवाने की सोचें तो आपने आर्किटेक्ट को बोल कर कुछ खाली हिस्से को किचन गार्डन के लिए जरूर छोड़ निकलवा लें. आप द्वारा किचन गार्डन के लिए छोड़ी गई थोड़ी सी जमीन आप को हर साल हजारों रुपए का फायदा करा सकती है.

गमले भी हो सकते हैं किचेन गार्डन का हिस्सा

जिन लोगों के घर में सब्जियां उगाने के लिए खाली जमीन नहीं हैं. वह भी घर पर किचेन गार्डन बना कर सब्जियां उगा सकते हैं. इस के लिए गमले का इस्तेमाल किया जा सकता है. गमलों में सब्जियां उगाने के पहले गमलों में भरी जाने वाली मिट्टी को पहले से तैयार कर लेना चाहिए. इस के लिए, मिट्टी में गोबर की सड़ी खाद, वर्मी कंपोस्ट, या नाडेप कंपोस्ट को मिट्टी में अच्छी तरह से मिला लेना चाहिए. मिट्टी में इन खादों को मिलाने के बाद ही गमले में मिट्टी को भरा जाना चाहिए.

गमले में लगाईं जाने वाली सब्जियों के मामले में यह ध्यान दें की एक बार में ही खत्म हो जाने वाली सब्जियों की जगह उन मौसमी सब्जियों को उगाएं जिस से कई बार फलत ली जा सकें. गमले में सब्जी बीज बोने से पहले यह सुनिश्चित कर लें की आप अच्छी किस्म के बीज का इस्तेमाल ही कर रहे हैं. गमले में उगाए जाने वाले सब्जी के मामले में इस बात का विशेष ध्यान देना होता की उस में ली जाने वाली सब्जी के पौधें और जड़ों का फैलाव ज्यादा न हो. इसलिए उन्हीं सब्जियों को लगाना चाहिए  जो कम जगह घेरती हों.

गमलों में लगाईं गई सब्जियों को छत के ऊपर, टेरिस पर या खिड़कियों और दरवाजों के पास आसानी से रखा जा सकता है. जिसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है. इस से गमले में लगाए जाने वाले पौधों को सूरज की रौशनी दिखाना और पानी देना भी आसान होता है.

किचन गार्डन के लिए इन सब्जियों का करें चयन

आप मौसम को ध्यान में रख कर अपने किचन गार्डन के लिए सब्जियों का चयन करें. बारिश के शुरुआत में यानी जून जुलाई में बैगन, मिर्च,  खीरा, तोरई, लोबिया, बरसाती प्याज, अगेती फूलगोभी लोबिया,  भिंडी, अरबी, करेला, लौकी, टमाटर, मिर्च, कद्दू की रोपाई या बुआई की जा सकती है. वही रबी सीजन के शुरुआत यानी अक्तूबरनवंबर में चौलाई, लहसुन, टमाटर, भिंडी, बींस, गांठ गोभी, पत्ता गोभी, शिमला मिर्च, बैगन, सोया, पालक, चुकंदर, मूली मेथी, प्याज, लहसुन, पालक, फूल गोभी, गाजर, शलगम, ब्रोकली, सलाद पत्ता, बाकला, बथुआ, सरसों साग जैसी सब्जियों की बुआई या रोपाई की जा सकती है. जायद के सीजन यानी फरवरीमार्च में घिया, तोरी, करेला, टिंडा, खीरा, लौकी, परवल, कुंदरू, कद्दू. भिंडी, बैगन, धनियां, मुली, ककड़ी, हरा मिर्च, खरबूजा, तरबूज, राजमा, ग्वार जैसी सब्जियों की बुआई कर सकते हैं.

इस के अलावा कुछ मेडिशनल प्लांट को भी उगाया जा सकता है. जिस का उपयोग अगर हम रोज करें तो स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद मिलती है. इन में नीम, तुलसी, एलोवेरा, गिलोय, पुदीना, अजवायन, सौंफ, मीठी नीम, अदरक का फसल लिया जाना आसान है. इन के साथ ही हम मौसमी फूलों के पौधों की रोपाई कर घरघर की खूबसूरती में भी चारचांद लगा सकते हैं.

जिन के पास पर्याप्त मात्रा में किचन गार्डन के लिए जमीन उपलब्ध हो वह सब्जियों के साथ फलदार पौधे जैसे पपीता, केला, नीबू, अंगूर, अमरूद, स्ट्राबैरी, रसभरी, अनार, करौंदा आदि रोप कर आसानी ताजे फल प्राप्त कर सकते हैं.

Kitchen Garden
Kitchen Garden

 

किचन गार्डन में काम आनेवाले यंत्र

अगर हम किचन गार्डन में सब्जियां या फल उगाने जा रहें है तो उस के लिए काम आने वाले कुछकुछ यंत्रों की भी जरूरत पड़ती है. जिस से किचन गार्डन का काम आसान बनाया जा सकता है. किचन गार्डन में गुड़ाई के लिए कुदाल और फावड़ा को जरूरी यंत्रों में शामिल किया जा सकता है. इस के अलावा निराई के लिए खुरपी, पानी देनें के लिए पाइप और फौआरा, के साथ दरांती, टोकरी, बालटी, सुतली, बांस या लकड़ी का डंडा, एक छोटा स्प्रेयर की भी जरूरत पड़ती है. जो आसानी से नजदीक के मार्केट से खरीदी जा सकती है.

आप भी बना सकतें हैं और्गेनिक खाद

अगर आप को जैविक या कंपोस्ट खाद मौके से बाजार में न भी मिले तो चिंता नहीं करनी चाहिए. क्यों की हम खुद ही घर पर जैविक और कंपोस्ट बना खाद बना कर न केवल बाजार पर निर्भरता कम कर सकते हैं बल्कि पैसों की बचत भी कर सकते हैं. इस के लिए हम घर से निकलने वाले कूड़ेकरकट, सब्जियों के छिलकों, रेत मिट्टी व थोड़ी मात्रा में गोबर की जरूरत पड़ती है. कंपोस्ट खाद बनानें के लिए हम जमीन में एक गहरा गड्ढा खोद सकते हैं. या मिट्टी के बड़े गमलें का प्रयोग भी कर सकते हैं. सब से पहले इस गड्ढे या गमले के तले मिट्टी की मोटी परत बिछाई जाती है. इस के ऊपर किचन से निकलने वाले सब्जियों और फलों के मुलायम छिलके और पल्प डाला जाता है इस के बाद ऊपर से मिट्टी की मोटी परत डाल कर ढक दिया जाता है. 15-20 दिन में यह खाद इस्तेमाल के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है. जिसे अपने किचन गार्डन में खाद के रूप में किया जा सकता है.

ऐसे करें बीज की बुआई और पौधों की रोपाई-कचन गार्डन में कुछ सब्जियों को सीधे बीज द्वारा बोकर उपजाया जा सकता है. तो कुछ के पौधों को नर्सरी में तैयार किए जाने के बाद रोपा जाता है. जिन सब्जियों की मिट्टी में सीधे बुआई की जाती है उन में करेला, बीन्स, लौकी, घिया, तरोई, कद्दू, लहसुन, प्याज, ककड़ी, पालक, अरबी, लोबिया, खीरा, मूली, धनियां, चौलाई, अजवायन, तुलसी जैसी फसलें शामिल की जा सकती हैं. जिन सब्जियों के पौधों की रोपाई करनी पड़ती है उस में फूल व पत्ता गोभी, टमाटर, बैगन, परवल, सौंफ, पुदीना, हरी व शिमला मिर्च, जैसी तमाम सब्जियां शामिल हैं. सीधे बुआई की जाने वाली सब्जियों की बुआई मेड़ या क्यारी बना कर की जानीं चाहिए. धनियां, प्याज, पुदीना को गार्डन में आनेजाने के रास्तों के बगल और मेड़ पर उगाया जा सकता है. जिन सब्जियों के पौधों की रोपाई करनी होती है उसे किसी विश्वसनीय नर्सरी से ही लेना उचित होता है.

आप ने अपने किचन गार्डन में जिन सब्जियां की बुआई कर रखी है उस में कोशिश करें की आप हर पंद्रह दिन पर फसल को में और्गेनिक खाद मिलती रहे. इस के अलावा फसल में उपयुक्त नमी बनाएं रखने के लिए समय से सिंचाई करते रहना भी जरूरी है. गर्मियों में सिंचाई पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है. कोशिश करें की फसल में खरपतवार न उगने पाए इसलिए नियमित रूप से खरपतवार निकालते रहें.

रखे यह सावधानी

किचन गार्डन की शुरुआत करने के पहले कुछ सावधानियों को बरतनें की खासा आवश्यकता होती है. इसलिए अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्रों से इस की जानकारी ले सकते है. देशभर में बनाए गए ज्यादतर कृषि विज्ञान केंद्र शहरों से सटे हुए हैं जहां गृह विज्ञान और किचन गार्डन से जुड़े एक्सपर्ट भी होते हैं. इन से जानकारी ले कर किचन गार्डन में सब्जियां उगाना ज्यादा फायदेमंद होता है. इस के अलावा कृषि महकमें की वेबसाइटों, आइसीएआर की वेबसाइट से भी जानकारी ली जा सकती है.

कृषि विज्ञान केंद्र बस्ती के विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह का कहना है की किचन गार्डन में लगाए जाने वाली सब्जियों के उचित बढ़वार के लिए खुली धूप मिलना जरूरी है. इसलिए हमें घर बनाने का प्लान करते समय इन चीजों का ध्यान रखना चाहिए. घर बनाते समय उस के आसपास की मिट्टी में कंकड़म पत्थर की मात्रा बढ़ जाती है. जिसे गुड़ाई कर निकाल कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना उचित होता है.

हम जिन सब्जियों के बीज को सीधे मिट्टी में बो रहे है उसे बुआई के पूर्व में ही जैव फफूंदनाशी व जैव कल्चर से उपचारित करने कर लेना चाहिए. इस के अलावा बेल वाली सब्जियां जैसे लौकी, तोरई, करेला, खीरा आदि को दीवार के सहारे छत के ऊपर ले जा सकते हैं. इस से बाकी जमीन पर लताएं नहीं फैलती है और खाली जमीन पर हम दूसरी सब्जियों की बुआई कर सकते हैं. सब्जियों की सालभर उपलब्धता बनी रहे इस के लिए हमें सब्जियों के चयन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है.

किचन गार्डन बनाने के लाभ

कृषि विज्ञान केंद्र बस्ती के विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह का कहना है की किचन गार्डन में सब्जियां और फलफूल से यह न केवल हर समय ताजा मिलती है बल्कि घर के आसपास की खाली भूमि का सदुपयोग हो भी हो जाता है. इस से सब्जियों और फलफूल के ऊपर होने वाले खर्च की पूरी तरह से बचत हो जाती है. इस के साथ ही हमारी बाजार की सब्जियों पर निर्भरता कम होने से सब्जी खरीदने में होने वाले समय की भी बचत हो जाती है. उन का कहना है की किचन गार्डन में घर के व्यर्थ पानी और कूड़े करकट का उपयोग भी हो जाता है.

विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह का कहना है की किचन गार्डन आपको प्राकृति और भी के करीब लाता है और सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद होता है. क्यों की पौधे की देखभाल करने में आप को संतुष्टि मिलती है और आप तनाव कम होता है. इस के साथ रसायन मुक्त सब्जियां होने से सेहत भी अच्छा रहता.

राघवेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार किचन गार्डन में हम ऐसे कई पौधे उगा सकते है जिस से मच्छर को भगाने में मदद मिलती है. यह पौधे दूसरे तरह के कीड़ों को भी भगाने में कारगर होते हैं. इस में गेंदा, लेमनग्रास, तुलसी, नीम, लैवेंडर, रोजमेरी, हार्समिंट और सिट्रोनेला जैसे पौधे प्रमुख हैं.

अगर आप भी चाहते हैं की बाजार से आने वाली पेस्टिसाइड मिली हुई बासी फल, साग व सब्जियों की जगह ताजे फल व सब्जियां मिलती रहे तो इस में किचन गार्डन विधि आप के लिए सब से कारगर साबित हो सकती है. क्यों की आप को यह पता होता है की आप के किचन गार्डन में उगाई गई सब्जियों में किसी तरह के पेस्टीसाइड का इस्तेमाल नहीं किया गया है. और सब से बड़ी बात अगर कभी आप को लौकडाउन जैसी स्थिति का सामना करना पड़े तो आप बिना घर से निकले ही समय पर उन्हें तोड़ कर खाने में उपयोग कर सकते हैं.

सर्दी में घर के पौधों में डालें ये खास तरह की खाद, खराब नहीं होगी बागबानी

बागबानी के लिए सर्दी का मौसम सब से ज्यादा मुश्किल भरा होता है. इस मौसम में पौधों की बढ़वार धीमी हो जाती है, इसलिए उन्हें अधिक पोषण की जरूरत होती है.

ऐसे में पौधों को सही खाद देना बहुत ही महत्वपूर्ण है. पौधों को सर्दियों में मजबूत और स्वस्थ बनाए रखने के लिए कुछ खास तरह की खादें दी जाती हैं. ये खादें घर पर भी बनाई जा सकती है.

इस के लिए आप चाय का पत्ती, अंडे के छिलके, सब्जी और फलों के छिलके आदि को कंपोस्ट कर सकते हैं. कंपोस्ट बनाने के लिए आप एक गड्ढा खोद सकते हैं या किसी बरतन में भी. पौधों को खाद देने से पहले मिट्टी को अच्छी तरह से ढीला कर लें. फिर खाद को मिट्टी में मिला दें. खाद को पौधे की जड़ों के पास न डालें. खाद देने के बाद मिट्टी को अच्छी तरह से पानी दें. पौधों को खाद देने का सब से अच्छा समय सुबह या शाम का होता है. जब मौसम ठंडा हो, तब खाद देनी चाहिए.

डीएपी खाद प्राकृतिक खाद है, जो पौधों को पोटैशियम, नाइट्रोजन और फास्फोरस देती है. यह खाद पौधों की बढ़वार में बहुत अच्छी है. डीएपी खाद पौधों को सर्दियों में देने से वे स्वस्थ और मजबूत होते हैं.

कंपोस्ट खाद एक कार्बनिक खाद है, जो पौधों को सभी पोषक तत्व देती है. यह खाद पौधों के आसपास की मिट्टी भी उपजाऊ बनाती है. कंपोस्ट खाद सर्दियों में पौधों को मजबूत और स्वस्थ बनाती है.

गोबर खाद एक प्राकृतिक खाद है, जो पौधों को सबकुछ देती है. यह खाद पौधों के आसपास की मिट्टी भी उपजाऊ बनाती है. गोबर खाद सर्दियों में पौधों को स्वस्थ और मजबूत बनाती है.

मस्टर्ड केक खाद एक प्राकृतिक खाद है, जो पौधों को पोटैशियम, नाइट्रोजन और फास्फोरस देती है. पौधों की प्रतिरक्षा प्रणाली भी इस खाद से मजबूत होती है. सर्दियों में मस्टर्ड केक खाद देने से पौधे ठंड से बचते हैं और अच्छी तरह से विकसित होते हैं.

सर्दियों के समय पौधों में डालने के लिए वर्मी कंपोस्ट खाद बहुत अच्छी खाद है. आप इस खाद को सभी प्रकार के पौधों में इस्तेमाल कर सकते हैं. हालांकि, फूलों, फलों और सब्जियों वाले पौधों के लिए यह खाद अधिक फायदेमंद है.

वर्मी कंपोस्ट, मिट्टीरहित माध्यम जैसे कोकोपिट आदि में उगाए जाने वाले पौधों के लिए भी अच्छी मानी जाती है. यह पौधों को अतिरिक्त पोषक तत्व देती है. इस के अलावा वर्मी कंपोस्ट खाद का इस्तेमाल करने से मिट्टी की संरचना में भी सुधार होता है.

वर्मी कंपोस्ट खाद का उपयोग नए पौधों को लगाने के दौरान पौटिंग मिक्स बनाने के लिए किया जाता है. वर्मी कंपोस्ट खाद का प्रयोग पौधों की बढ़वार अवस्था में भी किया जाता है. पौधे की बढ़वार अवस्था के दौरान हर 2-3 महीने में एक गमले में एक मुट्ठी वर्मी कंपोस्ट खाद डाली जा सकती है.

सर्दियों में पौधों की बढ़वार के लिए एप्सम साल्ट एक सब से अच्छा उर्वरक है. इस का इस्तेमाल तकरीबन सभी प्रकार के पौधों में कर सकते हैं. यह उर्वरक पौधों को झाड़ीदार यानी घना बनाने में मदद करता है, अधिक फूल पैदा करता है, पत्तियों में क्लोरोफिल उत्पादन बढ़ाता है और पौधों को मैग्नीशियम और सल्फर पोषक तत्व प्रदान करता है.

यदि सर्दी के दौरान पौधों में पत्तियों, फलों और फूलों का उत्पादन कम हो रहा हो, तो एप्सम साल्ट को पौधों में डाल सकते हैं. एप्सम साल्ट का प्रयोग पौटिंग मिक्स बनाने के दौरान और पौधे की बढ़वार अवस्था में किया जा सकता है. पौधे की बढ़वार अवस्था के दौरान महीने में 1-2 बार 1 लिटर पानी में 1 चम्मच एप्सम साल्ट मिला कर पौधों की जड़ों में डाल दें या इस पानी का दिन के समय पौधों पर छिड़काव (स्प्रे) करें.

अगर सर्दी में होम गार्डन में लगे सब्जियों और फूलों वाले पौधे नहीं बढ़ रहे हैं या फिर उन में फूल और फल नहीं आ रहे हैं, तो इस के लिए किसान मस्टर्ड केक उर्वरक का उपयोग पौधों में कर सकते हैं. यह उर्वरक पौधों की ग्रोथ को बढ़ाता है और साथ ही साथ पौधों को कीड़ों और बीमारी से भी बचाता है.

पौधों में इस फर्टिलाइजर का इस्तेमाल घोल बना कर किया जाता है. सौल्यूशन बनाने के लिए मिट्टी के बरतन में थोड़ी मात्रा में मस्टर्ड केक ले कर उस में 1 लिटर पानी डालें और फिर उसे कुछ दिनों के लिए ढक कर रख दें. इस के बाद इस घोल को कपडे की मदद से अच्छे से छान लें. छानने के बाद तकरीबन 50 मिलीलिटर मस्टर्ड घोल को 1 लिटर पानी में मिलाएं और फिर उसे पौधों में डालें.

सर्दी के मौसम में पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए लकड़ी की राख, एक बैस्ट खाद का काम करती है. इस में पोटैशियम, कैल्शियम, फास्फोरस, मैंगनीज और जस्ता जैसे उपयोगी पोषक तत्व पाए जाते हैं. लकड़ी की राख का गार्डन में अनेक उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयोग किया जाता है: जैसे यह मिट्टी के पीएच स्तर को बढ़ा देती है, स्लग और घोंघे जैसे कीटों को गार्डन से दूर रखती है और पौधों को जरूरी पोषक तत्व प्रदान कर के पौधों की ग्रोथ को बढाती है.

होम गार्डन में लकड़ी की राख का उपयोग करने का सब से अच्छा तरीका यह है कि इसे पौधों की मिट्टी के ऊपर फैला (टौप ड्रैसिंग) दिया जाए. सभी पौधों पर लकड़ी की राख का उपयोग न करें, केवल वे पौधे, जिन्हें पोटैशियम पोषक तत्व की जरूरत हो या मिट्टी के पीएच लैवल को बढ़ाना हो, तभी इस का प्रयोग थोड़ी मात्रा में करें.

केला खाने के बाद जो छिलका बचता है, उस का उपयोग जैविक खाद बनाने में किया जा सकता है. सर्दी के मौसम में यह खाद पौधों के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है. इस में पोटैशियम, मैग्नीशियम और फास्फोरस पोषक तत्व की भरपूर मात्रा पाई जाती है. केले के छिलकों को फर्टिलाइजर के रूप में इस्तेमाल करने के लिए सब से पहले एक बरतन लें और उस में 3-4 छिलकों को डाल कर पानी भर दें. कुछ (4-5) दिनों के बाद केले के छिलकों को पानी में से निकाल कर अलग कर दें और पानी को पौधों में फर्टिलाइजर के रूप में इस्तेमाल करें.

मीणा परिवार ने खेती में अपनाए प्राकृतिक तौरतरीके

भरतपुर जिले की भरतपुरबयाना सड़क पर गांव पना के पास कमल मीणा परिवार ने अपने 16 बीघा खेत यानी फार्महाउस में विभिन्न प्रकार के फल व फूलदार पौधे, औषधीय व सब्जियों और खाद्यान्नों की फसलें लगा कर किसानों के लिए समन्वित खेती का बेहतरीन उदाहरण सामने रखा है.

गांव पना में कमल मीणा के इस फार्महाउस को लोग मिनी कृषि विश्वविद्यालय के नाम से अधिक जानते हैं. इस मिनी कृषि विश्वविद्यालय को रोजना दर्जनों लोग देखने आते हैं, ताकि वे इन विधियों को अपने खेतों पर अपना कर आमदनी बढ़ा सकें.

इसी तर्ज पर उन्होंने अपने खेतों में अधिक आमदनी देने वाली फसलें उगाने का मन बनाया, जिसे भरतपुर की लुपिन फाउंडेशन नामक स्वयंसेवी संगठन ने तकनीकी जानकारी दी और उन्नत किस्म के फल व फूलदार पौधे और खाद्यान्नों के बीज मुहैया कराए. उन्होंने अपने फार्महाउस के चारों तरफ की तकरीबन 8 फुंट ऊची दीवार बनाई, ताकि फार्महाउस में लगाई जाने वाली फसलें महफूज रह सकें.

फल व फूलदार पौधे बने अधिक आमदनी का जरीया

गांव पना के सड़क के किनारे बने कृषि फार्महाउस में कमल मीणा ने मलिहाबाद लखनऊ से ललित, कोलकाता से थाई 7, सवाई माधोपुर से बर्फखान व धवन किस्मों के अमरूद के पौधे ला कर लगाए. ये पौधे अभी डेढ़ साल के हैं. जब वे फल देने लगेंगे, तो निश्चय ही तकरीबन 5 लाख रुपए की आमदनी शुरू हो जाएगी.

इसी प्रकार उन्होंने पुष्कर से जामुन, सऊदी अरब से खजूर के पौधे मंगा कर लगाए और काजरी से बेर के रैड कश्मीरी एपल किस्मों के और नीबू के सीडलैस व कागजी किस्मों के पौधे मंगवा कर अपने फार्महाउस में लगाए.

इस के अलावा कमल मीणा ने अपने फार्महाउस में आंवला, अनार, चीकू, शहतूत, सहजन, कचनार, अमलतास के अलावा इमारती लकड़ी व सजावटी किस्मों के सागवान, नीम, फाइकस, मछलीपाम, पाम, अर्जुन, शीशम, बांस वगैरह के पौधे लगाए हैं.

फूलदार पौधों से महका फार्महाउस

कृषि फार्महाउस में गुलाब, गेंदा, मोरपंखी, बारहमासी समेत विभिन्न किस्मों के फूलदार पौधे लगाए हैं, जिस से पूरा फार्महाउस महक रहा है. इन फूलों की बिक्री से

कमल मीणा के परिवार को हर महीने तकरीबन 8,000 से 10,000 रुपए की आमदनी अलग से  हो जाती है.

जैविक सब्जियां व खाद्यान्न बिक रहे हैं अधिक दामों पर

कमल मीणा ने अपने फार्महाउस पर गेहूं की देशी किस्म के बंशी, काली मूंछ वाला, बोधका व काला प्रजाति के गेहूं और देशी किस्म के चना व मसूर की बोआई की है, वहीं सब्जियों में मिर्च, बैगन, टमाटर, गाजर, मेथी, मटर, पालक, धनिया, बथुआ, पत्तागोभी, फूलगोभी, लहसुन व प्याज के साथ गन्ना भी लगा रखा है.

इन सभी फसलों में कैमिकल खादों और कीटनाशक दवाओं के स्थान पर जैविक खाद व डाक्टर सुभाष पालेकर द्वारा विकसित की गई प्राकृतिक कृषि विधि को अपनाया है. सब्जियों और खाद्यान्न की बिक्री से उन्हें हर साल 3 लाख से 4 लाख रुपए की आमदनी हासिल हो रही है.

औषधीय सतावर की खेती से 6 लाख की हुई आमदनी

गांव पना के कमल मीणा ने अपने फार्महाउस में तकरीबन आधा एकड़ खेत में औषधीय फसल सतावर लगाई, जिन की जड़ों की बिक्री से उन्हें आसानी से 6 लाख रुपए की आमदनी हासिल हो गई. वे अपने फार्महाउस में दूसरे औषधीय पौधे भी इस साल लगाएंगे, जिस के लिए जमीन तैयार कर ली गई है.

खुद बनाते हैं प्राकृतिक कीटनाशक व जैविक खाद

‘पद्मश्री’ अवार्ड से नवाजे गए डाक्टर सुभाष पालेकर के टे्रनिंग कैंप में कमल मीणा ने प्राकृतिक खेती की तकनीकी जानकारी हासिल की. लुपिन फाउंडेशन के कृषि वैज्ञानिकों की देखरेख में कमल मीणा ने प्राकृतिक कीटनाशक जीवामृत, नीमास्त्र, अग्नि अस्त्र, दशापणी अर्क, ब्रहा्रास्त्र वगैरह तैयार किया और खुद की फसलों, फल व फूलदार पौधों पर छिड़काव करते हैं, ताकि कीटनाशक दवाओं से उत्पाद जहरीले नहीं हो सकें. कैमिकलखादों के स्थान पर उन्होंने वर्मी कंपोस्ट का प्रयोग करने के लिए अपने फार्महाउस पर वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगा रखी है.

Farming

 

खेती में आधुनिक उपकरणों का कर रहे हैं इस्तेमाल

कमल मीणा ने अपने फार्महाउस पर सिंचाई के लिए सोलर पंप सैट लगा रखा है और बूंदबूंद व फव्वारा सिंचाई पद्धति का उपयोग करते हैं, ताकि सिंचाई में पानी की बचत हो और उत्पादन बढ़ सके. इस के अलावा वे जुताई के लिए पावर टिलर, गुड़ाई के लिए हैंड हो साइकिल, ट्रिबलर वगैरह का उपयोग कर रहे हैं.

दुधारू पशु भी आमदनी में बन रहे हैं मददगार

कमल मीणा ने अपने फार्महाउस में गिर नस्ल की गाय और मुर्रा नस्ल की भैंसें पाल रखी हैं, जिन्हें हरा चारा मुहैया कराने के लिए बरसीम व कांचनी भी अपने फार्महाउस में लगा रखी है.

पुष्पीय वृक्ष लगाएं सुंदरता बढ़ाएं

आजकल बढ़ते प्रदूषण को रोकने में वृक्षों की बहुत ही असाधारण भूमिका रहती है, इसलिए विभिन्न स्थानों पर शहरों में वृक्षों के रोपण पर अधिक बल दिया जा रहा है. शहरों में वृक्षों का रोपण मुख्य रूप से सड़कों के किनारे, पार्कों में एवं खाली स्थानों पर किया जा रहा है, जिस से प्रदूषण नियंत्रण में कुछ मदद मिल सके.

किसी भी स्थान विशेष की सुंदरता बढ़ाने के लिए उस स्थान पर सुंदर फूल एवं पत्तियों वाले वृक्षों का लगाना आवश्यक होता है.

पुष्पीय वृक्षों में मुख्य रूप से अमलताश, गुलमोहर, नीली गुलमोहर, पीली गुलमोहर, जकरांडा, गुलाबी केसिया इत्यादि पौधों का रोपण किया जाता है.

वहीं दूसरी ओर पर्णीय पौधों में मुख्यतया अशोक, मौलश्री, पुतरंजिवा, पाकड़ नीम, गद, बालखीरा आदि वृक्ष लगाए जाते हैं. कुछ ऐसे वृक्ष होते हैं, जिन के फूल तो सुंदर होते ही हैं, साथ में पत्तियां भी अच्छी दिखती हैं. इन को भी पार्क आदि में लगाना अच्छा माना जाता है. इन में मुख्य हैं सीता अशोक, प्राइड औफ इंइिया, सिल्वर ओक, बोतल ब्रुस आदि.

उपरोक्त के अलावा वृक्षों को उन के आकार एवं उम्र के आधार पर 3 भागों में बांटा जाता है. बड़े आकार के वृक्ष जैसे बरगद, पाकड़, नीम, अर्जुन इत्यादि. दूसरे प्रकार के वे वृक्ष आते हैं, जिन का आकार मध्य होता है. जैसे पुतरंजिवा, अशोक, बालखीरा, मौलश्री, चीड़, अमलतास आदि. तीसरे प्रकार के वृक्ष वह हैं, जो आकार में छोटे होते हैं. इन में मुख्यतया सीता अशोक, बोतल ब्रुस, कचनार, प्राइड औफ इंडिया आदि आते हैं.

वृक्षों के पौधे तैयार करना

ज्यादातर शोभादार वृक्षों के पौधों का वर्धन बीज द्वारा किया जाता है. सभी पौधों के बीज का आकार अलगअलग होने के साथसाथ उन की ऊपरी सतह भी पतली एवं मोटी होती है. मुख्य रूप से पतले छिलके वाले बीजों को 6-8 घंटे पानी में भिगोने के बाद सीधे ही मिट्टी से भरी थैलियों अथवा क्यारियों में बो दिया जाता है, परंतु कुछ बीजों की ऊपरी सतह अत्यधिक कठोर होती है, उन को बोने से पहले उपचारित किया जाता है.

कम कठोर परत वाले बीजों को हलके गरम पानी में 10-12 घंटे भिगोए रखने के बाद बोआई की जाती है. बोआई का सब से उत्तम समय 15 अप्रैल से 15 मई का होता है. प्लास्टिक घरों में बीजों को वर्ष भर बोया जा सकता है. बोआई से पहले जमीन में उचित नमी का होना आवश्यक है.

बोआई के लगभग 20-25 दिन बाद पौधे अंकुरित हो जाते हैं. इस के पश्चात पौधों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लगाया जाता है. यदि पौधे प्लास्टिक की थैलियों में हैं, तो उन का भी स्थान परिवर्तन करना आवश्यक होता है.

वृक्षों की रोपाई

ज्यादातर शोभाकारी वृक्ष आसानी से रोपित हो सकते हैं, परंतु अच्छी वृद्धि एवं उचित आकार के वृक्ष प्राप्त करने के लिए उन की रोपाई पर पूरा ध्यान देना आवश्यक होता है.

रोपाई के लिए एक घनमीटर के आकार का गड्ढा खोदा जाता है. खोदी गई मिट्टी में 4 से 10 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद या पत्ती की खाद भूमि की उर्वरता के अनुसार मिला कर गड्ढे में भर दिया जाता हैं. इसी के साथसाथ गड्ढे में 50-100 ग्राम कीटनाशी धूल भी मिला दी जाती है.

कीटनाशी में मुख्य रूप से डीडीटी, बीएचसी या थिमेट का प्रयोग किया जाना उचित रहता है. रोपाई करते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जितनी गहराई पर पौधा नर्सरी में लगा था, उतनी ही गहराई पर उस की रोपाई की जाए. रोपाई के समय जड़ों के साथ लगी मिट्टी छूटनी नहीं चाहिए.

रोपाई का उचित समय

रोपाई का उचित समय स्थानस्थान पर निर्भर करता है. पूर्वी भारत के मैदानी क्षेत्रों में वृक्षों की रोपाई फरवरीमार्च माह में करना उत्तम रहता है. अगर सिंचाई के साधन उचित हैं, तो रोपाई अत्यधिक गरमी को छोड़ कर कभी भी की जा सकती है.

उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में वृक्षों की रोपाई का सब से अच्छा समय जून से अगस्त माह है. जहां तक संभव हो, 2-3 वर्ष पुराने पौधों को ही रोपाई के लिए प्रयोग करना चाहिए, नए पौधों के मरने की अधिक संभावना रहती है. पुराने पौधों की रोपाई के बाद वृद्धि भी अधिक तेज होती है.

पहले गमले में लगाए गए पौधों को जमीन में नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि गमले में 2-3 वर्ष लगे रहने के कारण उन की जड़ें मुड़ जाती हैं, जिस में जमीन में रोपण के बाद उन की वृद्धि सामान्य नहीं हो पाती है.

रोपण की दूरी वृक्ष के पूर्ण आकार के आधार पर रखी जाती है. बड़े आकार के वृक्षों को 10-12 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है. मध्य आकार के वृक्ष 9-10 मीटर की दूरी पर और छोटे आकार के वृक्षों की रोपण दूरी 6-8 मीटर रखी जाती है.

Bottle Brush
Bottle Brush

बोतल ब्रुस : यह मध्यम ऊंचाई का फूलदार वृक्ष है. पेड़ 5-10 मीटर तक लंबा होता है. इस पर फरवरी से नवंबर माह में फूल आते हैं, परंतु सब से ज्यादा फूल मार्चअप्रैल और अगस्तसितंबर में होते है. यह वृक्ष सभी स्थानों पर लगाए जा सकते है. सड़कों के किनारे, तालाबों के पास और पार्कों में सभी जगह लगाए जा सकते है.

 

 

मौलश्री : पेड़ की अधिकतम ऊंचाई 15 मीटर तक होती है. पेड़ हमेशा हराभरा रहता है, परंतु पेड़ की वृद्धि काफी धीरेधीरे होती है.

फूल गुच्छों में अप्रैल से जुलाई माह तक एवं सितंबर से नवंबर माह तक आते हैं. इस का रोपण लौन या पार्कों में अथवा सड़कों के किनारे भी किया जाता है. इस की चित्तीदार पत्तियों वाली किस्में भी आ रही हैं, परंतु वह बहुत छोटी होती हैं.

अशोक : मुख्य रूप से यह हरी पत्तियों के लिए उगाया जाता है. पेड़ की अधितम ऊंचाई 20 मीटर तक जाती है. साधारण किस्म को सड़कों एवं पार्कों में और पेंडुला किस्म को पार्कों में रास्तों के साथसाथ या भवनों के सामने लगाया जाता है.

सीता अशोक : यह एक मध्य ऊंचाई का फूल एवं पत्तियों की सुंदरता के लिए लगाया जाने वाला वृक्ष है. इस पर स्कारलेट लाल रंग के फूल आते हैं.

Kachnar
Kachnar

 

कचनार : मध्यम आकार का सदा हराभरा रहने वाला वृक्ष है. इस पर नवंबर माह में बैंगनी रंग के फूल आते हैं. इस के अलावा भी कचनार की बहुत सी किस्में हैं, जो शोभाकार वृक्षों के रूप में लगाई जाती हैं.

 

Flower Amaltas
maltas

 

अमलतास : यह पीले रंग के फूलों वाला पेड़ मध्यम ऊंचाई का होता है. पेड़ की अधिकतम ऊंचाई 10 मीटर तक होती है. गहरे पीले रंग के फूल अप्रैल से जून माह तक आते हैं. उपयुक्त स्थान पर अमलतास का वृक्ष 5-10 वर्ष तक अच्छा फलता है.

पिंक अमलतास : इस पर गुलाबी रंग के फूल आते हैं. रंग हलके गुलाबी से गहरे गुलाबी तक पाए जाते हैं. मईजून के माह में पेड़ों पर केवल फूल ही दिखाई देते हैं. उस समय पत्तियां बहुत ही कम होती हैं.

पेड़ मुख्य रूप से सड़कों के किनारे, पार्कों एवं अन्य स्थानों के लिए बहुत ही उपयुक्त माना जाता है.

 

Gulmohar
Gulmohar

 

गुलमोहर : यह लाल रंग के फूल वाला बहुत ही सुंदर वृक्ष है. इस को अमलतास के साथसाथ मिला कर यदि सड़क के किनारे लगाया जाए, तो बहुत ही अच्छा दृश्य प्रकट करता है, क्योंकि अमलतास एवं गुलमोहर का पुष्पीय कार्यकाल लगभग एकसमान ही होता है.

 

नीली गुलमोहर : इसे नीले रंग के फूल वाली गुलमोहर के नाम से भी जाना जाता है. पौधा 8-10 मीटर ऊंचा होता है. फूल मार्च, अप्रैल एवं मई माह में आते हैं, परंतु बहुत ही थोड़े समय के लिए पेड़ पर ठहरते हैं. पौधों की उम्र लगभग 20 वर्ष मानी जाती है.

प्राइड औफ इंडिया : यह पेड़ सुंदर फूल एवं रंगीन पत्तियों दोनों के लिए ही लगाया जाता है. फूल बैगनी रंग के आते हैं. फूल समाप्त होने के बाद सुंदर घुंडियों के गुच्छे बन जाते हैं, जिस से सुंदर सजावट की जाती है. पतझड़ के बाद लाल रंग की नई कोमल पत्तियां आती हैं, जो पौधों की सुंदरता को और भी ज्यादा बढ़ाती हैं.

पैल्टो फोरस : इसे पीली गुलमोहर भी कहते हैं. इस के पौधे बड़े, पत्तियां गहरे हरे रंग की और फूल गहरे पीले रंग के होते हैं. फूल वर्ष में दो बार आते हैं. प्रथम, फरवरी एवं मई माह तक और दोबारा सितंबर से नवंबर माह तक खिलते हैं. इस के फूल काफी सुंदर एवं पेड़ पर काफी रुकते हैं.

अर्जुन : यह 20-25 मीटर ऊंचा बढ़ाने वाला सड़क के किनारे लगाया जाने वाला वृक्ष है. हमेशा हराभरा बना रहता है. हलका पीलापन लिए हुए सफेद रंग के फूल आते हैं, जो कि मार्च से जून माह तक खिलते हैं. उस समय इस पर मधुमक्खियां अधिक आकर्षित होती हैं.

गृह वाटिका में लगे पौधों को रखे हरा भरा

आज हमारे चारों ओर बड़ेबड़े भवनों का निर्माण होता जा रहा है, तो उन्हीं बिल्डिंगों के आसपास छोटेबड़े लौन, फुलवारी, बालकौनियों, यहां तक कि छतों पर भी कुछ न कुछ उपाय कर के कुछ फूलों, फलों, सब्जियों, सजावटी लताओं के पौधों को भी लगाया जा रहा है.

कहींकहीं जिन के पास बड़े आवास हैं, वे लोग अपने आवास के चारों ओर की चारदीवारी के अंदर बची हुई जगहों को गृह वाटिका में बदल कर दैनिक उपयोग के लिए सब्जियों, फूलों और फलों को उगा रहे हैं.

यह हकीकत है कि हम कितने भी आधुनिक क्यों न हो जाएं, हमारा पौधों के प्रति लगाव या कहें कि आकर्षण कम नहीं हो सकता है. मनुष्य की आवश्यकता और पेड़पौधों के आसपास रहने की आदत ने ही बागबानी की शुरुआत की है.

आजकल छोटे या बड़े कार्यालयों के बरामदे में रखने वाले और कम धूप में उग सकने वाले पौधे आसानी से मिल जाएंगे. मगर जितना ये पौधे हमें देखने में अच्छे लगते हैं, उतनी ही उन की देखरेख करने की भी आवश्यकता होती है. किसी भी गृह वाटिका में पौधों की वृद्धि, उत्पादन व सुंदरता पूरी तरह से वाटिका के प्रबंधन पर निर्भर करती है.

यदि दैनिक आवश्यकतानुसार फूल, फल व सब्जियां प्राप्त करने के लिए गृह वाटिका को बनाया गया है, तो हमें इस का प्रबंधन इस तरह करना चाहिए, जिस से कि कम लागत व कम से कम समय लगा कर अधिकतम उत्पादन को प्राप्त कर सकें. साथ ही, वे सुंदर व स्वच्छ भी बनी रहें. सुनियोजित रूप से गृह वाटिका का प्रबंधन कर के हम उस को हमेशा हराभरा बनाए रख सकते हैं, जिस के लिए हमें निम्नलिखित सुझावों को अपनाने की आवश्यकता है :

मृदा का शुद्धीकरण

सब से पहले जो भी मृदा हम उपयोग के लिए ले रहे हैं, उस का शुद्धीकरण करने की आवश्यकता होती है, अन्यथा मृदा में रहने वाले अनेक प्रकार के हानिकारक कीट या कवक पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. जैसा कि देखा गया है कि गमलों, क्यारियों और नर्सरी के पौधों में सब से खतरनाक कवकजनित रोग तना सड़ने लगता है, जो पौधों की बढ़वार पूरी तरह से रोक देता है और पौधे सूख कर नष्ट हो जाते हैं.

इस रोग से बचने के लिए कैप्टान या थिरम को 5 ग्राम प्रति लिटर पानी के घोल का प्रयोग कवकनाशी के रूप में किया जा सकता है. यदि दीमक आदि का प्रकोप है, तो 2 से 4 मिलीलिटर क्लोरोपायरीफास को एक लिटर पानी में घोल कर लगभग 5 सैंटीमीटर गहराई तक की मिट्टी को तरबतर कर देने से दीमक नष्ट हो जाते हैं और हमारी पौधशाला कीटों व रोगों से सुरक्षित रहती है.

ऐसे करें बीजों की बोआई

गृह वाटिका में फूलों को सीधे बीज बो कर या पौधों की रोपाई द्वारा लगाया जाता है. हमेशा सीजन के अनुसार उगाने के लिए चयनित बीजों को किसी विश्वसनीय दुकान से ही लेना चाहिए. कुछ सब्जियां जैसे मटर, गाजर, मूली, शलजम, पालक, मेथी, बाकला, आलू, अदरक, हलदी और कुछ फूल जैसे हाली हार्ट, स्वीट पी आदि को निर्धारित समय पर तय दूरी पर बीज बो कर उगाया जाता है.

टमाटर, बैगन, मिर्च, गांठ गोभी, प्याज, फूलगोभी, पत्तागोभी आदि सब्जियों और अधिकांश मौसमी फूलों के बीज को पहले पौधशाला में उगाया जाता है, जिन में से बाद में स्वस्थ पौधों को क्यारियों में रोपा जाता है. इसलिए हो सके, तो उन के बीजों का उपचार भी कर लें.

कुछ पौधे ऐसे भी होते हैं, जो बरसात में खरपतवार की तरह हमें यहांवहां देखने को मिल जाते हैं, जैसे मकोय, भूमिआंवला, दूधीघास, अश्वगंधा, शतावर, तुलसी, दवनामरुआ, नागदोन, शंखपुष्पी आदि. इन की देखभाल के लिए कोई विशेष प्रबंध भी नहीं करना पड़ता. इसी तरह फलदार पेड़ों में भी पहले बीज या कलम से पौध तैयार करते हैं. बाद में उसे रोपण विधि से क्यारियों या वांछित स्थानों पर लगा देते हैं.

पौध प्रतिरोपण एक ऐसा उद्यान कार्य है, जिस में यदि पूरी सावधानी नहीं बरती गई, तो कभीकभी रोपे गए सारे पौधे नष्ट हो जाते हैं. पौध लगाते समय हम सभी को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए :

* पौध लगाते समय यह जानकारी अवश्य रखनी चाहिए कि पौधे वांछित किस्म के ही हों.

* पौधे स्वस्थ व निरोगी होने चाहिए.

* उखाड़े गए पौधे की जड़ें ढक कर रखनी चाहिए. उखाड़ने के बाद उन की यथाशीघ्र रोपाई कर देनी चाहिए.

* पौधो को निर्धारित दूरी पर ही लगाया जाना चाहिए.

* पौध रोपाई करते समय कुछ पत्तियां तोड़ देनी चाहिए और यदि शाखाएं अधिक हों, तो कुछ शाखाएं भी तोड़ देनी चाहिए.

* रोपण सायंकाल के समय करना उत्तम रहता है. इस से पौधों को रात के ठंडे तापमान में स्थापित होने का समय मिल जाता है.

* लगाते समय पौधे की जड़ों के पास अधिक उर्वरक नहीं देना चाहिए और उर्वरकों को पानी में घोल कर मिट्टी में मिलाया जाना अधिक उपयोगी रहता है.

* रोपण के तुरंत बाद उस की जड़ों के आसपास की मिट्टी को अच्छी तरह से दबा देना चाहिए, ताकि जड़ क्षेत्र में हवा न रहे.

* रोपण के तुरंत बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए, जिस से पौधों की जड़ें मिट्टी के संपर्क में आ जाएं और वे तुरंत भोजन प्राप्त करना आरंभ कर दें.

* पेड़ों के लिए गड्ढा आवश्यकता से अधिक गहरा नहीं बनाना चाहिए.

* रोपण के समय पौधा सीधा खड़ा रहना चाहिए और उस का पर्याप्त भाग मिट्टी में दबा रहना चाहिए.

गृह वाटिका में लगाए गए पौधों को सहारा देना

लता वाली फसलों जैसे लौकी, तोरई, खीरा, करेला, अंगूर को सहारा देने की आवश्यकता होती है, क्योंकि यदि उन्हें सहारा न दिया जाए, तो वे भूमि पर फैल जाती हैं और उन पर लगने वाली सब्जियां भूमि के संपर्क में आने के कारण पूर्णाकार तक पहुंचने से पहले ही सड़ने लगती हैं, खासकर लौकी, जो लता वाली सब्जियों में काफी लंबी होती है. इस में यह देखा गया है कि यदि पौधों को सुचारु ढंग से सहारा दिया जाए और फलों को लटकने का अवसर मिल जाए, तो वे फल लंबे, चिकने व सुंदर होते हैं. यदि इन पौधों को सहारा नहीं दिया जाता है, तो इन में जो फल लगते हैं, वे आकार में टेढ़ेमेढ़े होते हैं.

इसी तरह कुछ लता वाले पुष्प भी होते हैं, जैसे मनी प्लांट, अपराजिता, रंगून क्रीपर, माधवी लता आदि, जिन को सुचारु रूप से सहारा दिया जाना आवश्यक होता है. थोड़ा सा ही सहारा मिलने पर उन की बढ़वार भी सही होती है और फूलों की गुणवत्ता भी बनी रहती है. ज्यादातर इस तरह के पौधों को बागड़ के पास उगाया जाता है, जिस से कि यह बाद में बागड़ पर चढ़ जाए और अच्छी तरह से फैल जाए. डहेलिया, ग्लेडियोलस, गुलदाउदी आदि में फूलों को सीधा रखने के लिए भी सहारा देना जरूरी होता है.

सहारा देने के लिए लकड़ी व बांस की बल्लियां, तार, डंडे, दीवार आदि प्रयोग किए जा सकते हैं. जहां जैसी सामग्री उपलब्ध हो, उसी के अनुसार प्रयोग किया जा सकता है. फूलों के लिए सुंदर दिखने वाले सहारे इस्तेमाल करने चाहिए. बांस को छील कर चिकनी बनाई हुई रंगरोगन लगी फट्टियां उपयुक्त रहती हैं.

फौर्मल पौधों के लिए सरकंडे की लकडि़यां अच्छी रहती हैं. डहेलिया व ग्लेडियोलस के लिए एक मजबूत लकड़ी पर्याप्त रहती है, जिस से पौधे के निकट जड़ों को बचाते हुए मिट्टी में गाड़ देना चाहिए. गुलदाउदी के पौधों को चारों ओर से कई लकडि़यां लगा कर एक घेरा सा बना दिया जाता है.

गृह वाटिका में लगे पौधों की कटाइछंटाई

गृह वाटिका में कुछ बहुवर्षीय पौधे भी लगाए जाते हैं, जिन्हें समयसमय पर कटाईछंटाई की आवश्यकता होती है. शोभाकारी झाड़ियों, फलदार पेड़ों, फूलों (जैसे आम, नीबू, संतरा, अनार, अमरूद, कटहल, गुड़हल, गुलाब, मोंगरा आदि) और कुछ बहुवर्षीय सब्जियों (जैसे परवल, कुंदरू आदि) में कटाईछंटाई की आवश्यकता पड़ती है.

ज्यादातर पर्णपाती पौधों में कटाईछंटाई दिसंबर से मार्च माह तक की जाती है और सदाबहार पौधों में जूनजुलाई व फरवरीमार्च, दोनों मौसमों में की जाती है. गुलाब में कटाईछंटाई अक्तूबर माह के पहले सप्ताह में की जाती है. रोगग्रस्त, सूखी और अनावश्यक शाखाओं को देखते ही निकाल देना चाहिए. ऐसी शाखाओं को काटने के लिए तेज चाकू या सिकेटियर का प्रयोग किया जाना चाहिए.

गृह वाटिका के पौधों की सुरक्षा

गृह वाटिका की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है, जितनी कि उसे बनाना. अवांछित पशुपक्षियों के अलावा राहगीरों और छोटे बच्चों से भी गृह वाटिका के पौधों का बचाव करना पड़ता है.

यदि घर के चारों ओर पक्की चारदीवारी नहीं है, तो कांटेदार तार या उपयुक्त पौधों की बाढ़ की रोक लगा देनी चाहिए. बाढ़ कंटीले तारों के अलावा कुछ पेड़पौधों से भी की जाती है, जो कि देखने में सुंदर और फूल वाली भी होती हैं.

छोटी बाड़ के लिए नागदोन, कनेर, करौंदा आदि का प्रयोग किया जा सकता है. नागदोन के पौधे गहरे हरे, हलके हरे रंगों में आते हैं. कुछ पौधे थोड़ा हरापन लिए सफेद पत्ती के होते हैं, जो देखने में भी बहुत आकर्षक लगते हैं. इस का प्रयोग बवासीर, पेट की कृमि (कीड़े) को दूर करने के लिए भी किया जाता है.

इस बाड़ के बाहर की तरफ और बड़े कंटीले पौधे लगाए जा सकते हैं जैसे कि बौगैन्वेलिया. यह विभिन्न रंगों में तो आता ही है, कंटीला भी होता है. इसे लगाने से 3 काम होते हैं, एक तो बगीचा सुंदर लगता है, रोजाना फूल भी मिल जाते हैं और कंटीली बाड़ भी बनी रहती है.

बौगैन्वेलिया कई रंगों वाली पाई जाती है और काफी जगह को घेरती है और घनी भी होती है. यह यदि बेल की तरह चढ़ा दी जाए, तो 2-3 मंजिल तक भी फैल जाती है यदि यह काटछांट कर के रखी जाए, तो बाड़ की तरह भी काम करती है.

इसी तरह फल के मौसम में तोते आदि पक्षियों को भगाने के लिए किसी पेड़ से टिन आदि बांध कर घर के भीतर से ही उसे बीचबीच में हिला कर, ध्वनि उत्पन्न करने की व्यवस्था करनी चाहिए, जिस से इस प्रकार के नुकसान पहुंचाने वाले पक्षियों से बचा जा सके. यदि आवश्यक हो, तो जालीदार नैट का भी उपयोग किया जा सकता है, जिस से पक्षियों के आने की संभावना न के बराबर हो जाती है.

अपने प्रतिदिन के कार्यों में से यदि थोड़ा सा समय निकाल कर हम सभी अपनी गृह वाटिका में दे सकें, उस की उचित देखभाल करें, तो आप को खुशी के साथसाथ एक स्वस्थ वातावरण, रंगबिरंगे फूल, ताजा सब्जियां और मौसमी फल भी प्राप्त किए जा सकते हैं. सुनियोजित रूप से गृह वाटिका का प्रबंधन कर के हम उस को हमेशा हराभरा बनाए रख सकते हैं.