बड़े काम की खेती की मशीनें

पशु ताकत का इस्तेमाल खेती के कामों में दिनोंदिन कम हो रहा है, जिस के चलते इंजन, ट्रैक्टर, पावर टिलर व मोटरों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन ऐसा कहना ठीक होगा कि देश में सभी पावर साधनों का इस्तेमाल होता रहेगा.

खेती की मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक लंबी योजना तैयार कर के उसे लागू करना होगा. मौजूदा संसाधनों व सामाजिक और माली हालात को ध्यान में रखते हुए छोटे किसानों को सही फार्म मशीनरी के चुनाव पर ज्यादा बल देना होगा. देश के ज्यादातर किसान छोटे किसानों की कैटीगरी में आते हैं, जो ज्यादा पावर वाले व कीमती ट्रैक्टरों को नहीं खरीद सकते.

अगर बीज की बोआई और रोपाई वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो पैदावार में औसतन 15 फीसदी की बढ़वार होती है. अगर खरपतवार की रोकथाम, कटाईमड़ाई, सिंचाई और धान या गेहूं व दलहनी फसलों की मड़ाई में वैज्ञानिक तकरीकों को अपनाया जाए तो पैदावार में काफी बढ़ोतरी हो सकती है.

मशीनीकरण व पावर के इस्तेमाल से पैदावार का सीधा संबंध है. भारतीय खेती में पशु पावर और खेतिहर मजदूर शामिल हैं. फिर भी छोटे व मध्यम दर्जे के किसानों के लिए यह पावर पूरी नहीं है. अगर प्रति हेक्टेयर मुहैया पावर को देखा जाए तो विकसित देशों के मुकाबले अभी भी हम काफी पिछड़े हुए हैं.

आधुनिक फार्म मशीनरी के इस्तेमाल से ज्यादातर खेतों से साल में कम से कम 2 फसलें लेना मुमकिन हो गया है. इस के साथसाथ बढि़या मशीनों, बीज व खाद को सही गहराई और दूरी पर डाल कर किसान पैदावार बढ़ाने में काबिल हो सकते हैं. प्रसार व ट्रेनिंग की कमी से किसानों में खेती की मशीनों के प्रति जानकारी की कमी, समय पर बैंकों से लोन हासिल न होना और अच्छी फार्म मशीनरी का समय पर मुहैया न होना वगैरह कुछ ऐसी वजहें हैं, जिन से फार्म मशीनरी का फायदा किसानों को नहीं मिल पा रहा है.

खेती में मशीनों की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए ज्यादातर मशीनरी बनाने वाले किसानों को अच्छे ट्रैक्टर व फार्म मशीनरी मुहैया कराने में मददगार हो रहे हैं. किसानों के लिए आधुनिक फार्म मशीनरी मुहैया कराने व मशीनों की मरम्मत व देखभाल की सुविधा देने के लिए पूरे देश में ग्रामीण कारीगर हैं. इन ग्रामीण कारीगरों को मरम्मत की आधुनिकतम सुविधा मुहैया कराने की जरूरत है.

खेती की पैदावार बढि़या मशीनों से कई गुना बढ़ाई जा सकती है जो ताकत का जरीया, अच्छे काम, काम करने वाले की थकान में कमी को ध्यान में रख कर मुमकिन हो सकता है. बहुत सी सरकारी व प्राइवेट कंपनियां और विश्वविद्यालय लगातार फार्म मशीनरी में सुधार का काम कर रहे हैं जो कि इनसानी थकान को कम व भविष्य में खेती के काम को पूरी तरह मशीनी तरीके से करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

बढि़या मशीनों द्वारा कम समय, पैसा, मेहनत और ऊर्जा का इस्तेमाल कर असरदार तरीके से कम थकान व बिना किसी नुकसान के खेती के काम को अंजाम दिया जा सकता है.

Machineहालांकि किसान बढि़या बीज, खाद, फसल हिफाजत के तरीके, सिंचाई व ताकत का इस्तेमाल कर के पैदावार को बढ़ा रहे हैं, लेकिन अभी भी खेती की मशीनों का इस्तेमाल जानकारी की कमी में कम ही कर रहे हैं. नई व बढि़या मशीनों का इस्तेमाल कर के फसलों की पैदावार को काफी तक बढ़ाया जा सकता है.

हमारे देश में खेत छोटेछोटे हैं. खेतों का आकार छोेटा होने की वजह से किसान बड़ीबड़ी व ज्यादा कीमती मशीनें खरीदने और उन का इस्तेमाल करने में नाकाम हैं.

फार्म मशीनरी का इस्तेमाल खेत और दूसरी बातों पर निर्भर करता है. बीज, खाद व कैमिकल बहुत ही खर्चीले तरीके हैं, जिन का इस्तेमाल कर के पैदावार ज्यादा की जाती है.

इस बात को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी हो गया है कि सुधरे व विकसित फार्म मशीनरी का इस्तेमाल किया जाए जो कि बीजों की बोआई की दर पर जरूरत के मुताबिक कंट्रोल व खेत में बोआई समय से करें.

इनसान व पशु पावर स्रोत पर निर्भरता को कम करने के लिए यह जरूरी है कि खेती के कामों को पूरा करने के लिए आधुनिक फार्म मशीनरी का इस्तेमाल किया जाए.

साल 2000-01 में पशु पावर 16.38 फीसदी तक कम हुई व मशीनी पावर में 83.62 की बढ़ोतरी साल 1971-72 के मुकाबले में हुई है. प्रति हेक्टेयर खेती के मजदूरों की संख्या में 0.82-1.44 फीसदी की बढ़वार हुई है, लेकिन फिर भी प्रति हेक्टेयर खेती के मजदूरों की प्रति घंटे पिछले सालों में कई फसलों के लिए कमी पाई गई है.

यह अनुमानित किया गया है कि कुल ऊर्जा का 66-80 फीसदी हिस्सा ग्रामीण इलाकोें में घरों की देखभाल और 16-25 फीसदी खेती उत्पादन में इस्तेमाल होता है.

बिजली विभाग ने कुल बिजली का तकरीबन 85 फीसदी गांवों को मुहैया किया है. खेती में मशीनीकरण का हिस्सा तकरीबन 9-10 फीसदी तक है. खेती हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है जो कि कुल पैदावार का तकरीबन 25 फीसदी है.

पिछले 10 दशकों में फार्म मशीनरी का इस्तेमाल बहुत ही ज्यादा हुआ है. आज के समय में तकरीबन 126 लाख से अधिक ट्रैक्टर, लगभग 9650 कंबाइन, 38.8 लाख से अधिक थ्रेशर व 168 लाख से अधिक सिंचाई के पंप हैं. फार्म मशीनरी कई खेती के कामों जैसे जुताई, बोआई, फसल हिफाजत व गहाई, जोकि तकरीबन 41 फीसदी, 30 फीसदी, 35 फीसदी तक हर किसी के लिए है.

इन बातों को ध्यान में रखते हुए यह बहुत जरूरी है कि बढि़या फार्म मशीनरी को गंवई इलाके में खेती के कामों के लिए इस्तेमाल किया जाए, जिस से उत्पादकता को ज्यादा व फसलों की पैदावार में लगने वाले माली बजट को कम किया जाए.

सरकार द्वारा छोटे और मध्यम कैटीगरी के फार्म मशीनरी बनाने वाले को काफी सुविधाएं दी जा रही हैं. कईर् निर्माता किसानों के लिए ट्रेनिंग का भी प्रावधान रखते हैं, जिस से किसानों को फार्म मशीनरी के इस्तेमाल, देखभाल और मरम्मत की जानकारी हो सके.

सेहत के लिए फायदेमंद है मोटा अनाज

चंडीगढ़: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ‘मोटे अनाज का उपयोग स्वस्थ मानव जीवन व सुरक्षित पर्यावरण’ विषय पर तीनदिवसीय राष्ट्रीय सैमिनार आयोजित किया गया, जिस में हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने शिरकत की.

उन्होंने भोजन में मोटे अनाज के उपयोग पर बल देते हुए कहा कि मोटा अनाज सेहत के लिए अत्यंत फायदेमंद है, इसलिए इसे अपने दैनिक भोजन में जरूर शामिल करें.

राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने कहा कि हरियाणा सरकार मोटा अनाज विशेषकर बाजरा की पैदावार बढ़ाने पर जोर दे रही है और इस दिशा में किसान को समृद्ध करने के लिए बाजरे को भावांतर भरपाई योजना में शामिल किया गया है. प्रदेश में बाजरे की खेती को बढ़ावा देने के लिए पहले कदम के रूप में, इस वर्ष भिवानी जिला में एक पोषक-अनाज अनुसंधान केंद्र बनाया जा रहा है.

Milletsउन्होंने बताया कि मोटे अनाज का प्रयोग कई तरह की बीमारियों, जिन में शुगर, ब्लडप्रेशर, हार्ट, किडनी, कैंसर आदि शामिल हैं, से बचाव हो सकता है. राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने कहा कि जब तक भोजन में अनाज नहीं बदलेंगे, तो देश का स्वास्थ्य नहीं बदल सकता है, इसलिए मोटे अनाज का प्रयोग हमें बड़े पैमाने पर करना होगा.

राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने आगे कहा कि मोटे अनाज को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है और संयुक्त राष्ट्र ने भी भारत के आग्रह पर मोटे अनाज को ‘अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष‘ के रूप में घोषित किया है. मोटे अनाज को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के इस अभियान में केंद्र सरकार की ओर से इसी वर्ष इसे प्रोत्साहित करने का फैसला किया गया है और केंद्र ने एक नई योजना ‘श्रीधान्य‘ की शुरुआत की है.

पोषक तत्त्वों से भरपूर करेला

अकसर घरों में दादी, नानी या मां करेले के गुणों का बखान करती मिलती हैं. कई बुजुर्गों को आप ने करेले का जूस मजे से पीते देखा होगा, मगर करेले का नाम सुनते ही नौजवानों के मुंह का जायका बिगड़ जाता है. बच्चे तो उस के नाम से ही नाकभौं चढ़ा लेते हैं. करेले की कड़वाहट झेलना सब के बस की बात नहीं है.

करेला भले ही एक कड़वी सब्जी हो, लेकिन इस में कई गुण होते हैं. करेला खून तो साफ करता ही है, साथ ही डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद है.

करेला डायबिटीज में अमृत की तरह काम करता है. इस से खून में शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है. दमा और पेट के मरीजों के लिए भी यह लाभदायक है. इस में फास्फोरस पर्याप्त मात्रा में होता है जो कफ की शिकायत को दूर करता है.

करेले का इस्तेमाल एक नैचुरल स्टेरायड के रूप में किया जाता है, क्योंकि इस में कैरेटिन नामक रसायन होता है जो खून में शुगर का लैवल नियंत्रित रखता है. करेले में मौजूद ओलिओनिक एसिड ग्लूकोसाइड शुगर को खून में घुलने नहीं देता है.

करेला जितना शुगर लैवल को संतुलत करता है, शरीर को उतने ही पोषक तत्त्व मिलते हैं. इस के अलावा करेले में तांबा, विटामिन बी, अनसैचुरेटैड फैटी एसिड जैसे तत्त्व मौजूद होते हैं. इन से खून साफ रहता है और किडनी व लिवर भी सेहतमंद रहता है.

करेला खाने के फायदे

* कफ के मरीजों के लिए करेला बहुत फायदेमंद होता है.

* दमा होने पर बिना मसाले की सब्जी लाभदायक होती है.

* पेट में गैस की समस्या या अपच होने पर करेला राहत देता है.

* लकवे के मरीजों को कच्चा करेला खाने से फायदा होता है.

* उलटी, दस्त या हैजा होने पर करेले के रस में पानी और काला नमक डाल कर सेवन करने पर तुरंत फायदा होता है.

* पीलिया के रोग में भी करेला लाभकारी है. मरीजों को इस का रस पीना चाहिए.

* करेले के रस का लेप लगाने से सिरदर्द दूर होता है.

* गठिया रोगियों के लिए करेला फायदेमंद होता है.

* मुंह में छाले पड़ने पर करेले के रस का कुल्ला करने से राहत मिलती है.

अनार: मैदानी इलाकों में भी लें अच्छी पैदावार

भारत में अनार का कुल रकबा 2018-19 में 2,46,000 हेक्टेयर है और उत्पादन 28,65,000 मीट्रिक टन है, वहीं अगर एक हेक्टेयर की बात करें तो अनार का कुल उत्पादन तकरीबन 11.69 टन प्रति हेक्टेयर है. अनार गरम और गरम व ठंडी जलवायु वाले देशों का काफी लोकप्रिय फल है.

भारत में इस की खेती खासतौर से महाराष्ट्र में की जाती है. राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, गुजरात में छोटे लैवल पर इस के बगीचे देखे जा सकते हैं. इस का रस जायकेदार और औषधीय गुणों की वजह से फायदेमंद होता है.

अनार की खेती के लिए कम लागत, लगातार उच्च तापमान, लंबी भंडारण अवधि जैसी खूबियों के चलते इस का क्षेत्रफल लगातार बढ़ रहा है.

आबोहवा : यह हलकी सूखी जलवायु में बढि़या तरह से उगाया जा सकता है. फलों के बढ़ने व पकने के समय गरम और शुष्क जलवायु की जरूरत होती है. लंबे समय तक ज्यादा तापमान बने रहने से फलों में मिठास बढ़ती है, वहीं नम जलवायु रहने से फलों की क्वालिटी पर बुरा असर होता है.

जमीन  : अनार अनेक तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है, पर बढि़या जल निकास के इंतजाम वाली रेतीली दोमट मिट्टी सब से बढि़या होती है. फलों की गुणवत्ता व रंग भारी

मिट्टी के मुकाबले हलकी मिट्टियों में अच्छा होता है. अनार के लिए मिट्टी लवणीयता 9.00 ईसी प्रति मिलीलिटर और क्षारीयता 6.78 ईएसपी तक सहन कर सकता है.

खास प्रजाति

भारतीय प्रजाति : अर्कता, भगवा, ढोकला, जी 137, गणेश, जलोर सीडलैस, ज्योति, कंधारी, मृदुला, फूले फगवा, रूबी के 1 वगैरह.

प्रजाति इगजोटिक : अगेती वंडरफुल, ग्रांड वंडरफुल वगैरह.

खास किस्म और खूबियां 

गणेश : इस किस्म के फल मध्यम आकार के, बीज मुलायम और गुलाबी रंग के होते हैं. यह महाराष्ट्र की खास किस्म है.

ज्योति : फल मध्यम से बड़े आकार के, चिकनी सतह व पीलापन लिए हुए लाल रंग के होते हैं. एरिल गुलाबी रंग के बीज काफी मुलायम, बहुत मीठे होते हैं. प्रति पौधा 8-10 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

मृदुला : फल मध्यम आकार के, चिकनी सतह वाले लाल रंग के होते हैं. एरिल गहरे लाल रंग का बीज मुलायम, रसदार और मीठे होते हैं. प्रति पौधा 8-10 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

भगवा : इस किस्म के फल बड़े आकार के भगवा रंग के, चिकने चमकदार होते हैं. एरिल मनमोहक लाल रंग की और बीज मुलायम होते हैं. बढि़या देखरेख करने पर प्रति पौधा 30-38 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

अर्कता : यह एक अधिक उपज देने वाली किस्म है. फल बड़े आकार के, मीठे और मुलायम बीजों वाले होते हैं. एरिल लाल रंग की व छिलका मनमोहक लाल रंग का होता है. बढि़या देखरेख करने पर प्रति पौधा 25-30 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

प्रवर्धन

कलम द्वारा : एक साल पुरानी शाखाओं से 20-30 सैंटीमीटर लंबी कलमें काट कर पौधशाला में लगा दी जाती हैं और इंडोल ब्यूटारिक अम्ल (आईबीए) 3,000 पीपीएम से कलमों को उपचारित करने से जड़ें जल्दी व ज्यादा तादाद में निकलती हैं.

गूटी द्वारा : अनार का व्यावसायिक प्रवर्धन गूटी द्वारा किया जाता है. इस विधि में जुलाईअगस्त माह में एक साल पुरानी पैंसिल समान मोटाई वाली स्वस्थ पकी 45-60 सैंटीमीटर लंबाई की शाखाओं को छांटें.

छांटी गई शाखाओं से कलिका के नीचे 3 सैंटीमीटर चौड़ी गोलाई में छाल पूरी तरह से निकाल दें. छाल निकाली गई शाखा के ऊपरी भाग में आईबीए 10,000 पीपीएम का लेप लगा कर नमी वाला स्फेगनम मास चारों ओर लगा कर पौलीथिन की शीट से ढक कर सुतली से बांध दें. जब पौलीथिन से जड़ें दिखाई देने लगें, उस समय शाखा को स्केटियर काट कर क्यारी या गमलों में लगा दें.

पौध की रोपाई : आमतौर पर पौध रोपण की आपसी दूरी मिट्टी की क्वालिटी व जलवायु पर निर्भर करती है. आमतौर पर 4-5 मीटर की दूरी पर अनार को रोप दिया जाता है.

सघन रोपण विधि में 5×2 मीटर (1,000 पौधे प्रति हेक्टेयर), 5×3 मीटर (666 पौधे प्रति हेक्टेयर) 4.5×3 (740 पौधे प्रति हेक्टेयर) की आपसी दूरी पर रोपण किया जा सकता है.

पौध रोपने के तकरीबन एक महीने पहले 60×60×60 सैंटीमीटर (लंबाई × चौड़ाई × गहराई) आकार के गड्ढे खोद कर 15 दिनों के लिए खुला छोड़ दें. इस के बाद गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में 20 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद, 1 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 50 ग्राम क्लोरोपाइरीफास चूर्ण मिट्टी में मिला कर गड्ढों को सतह से 15 सैंटीमीटर की ऊंचाई तक भर दें.

खाद व उर्वरक : पौधों की उम्र के मुताबिक कार्बनिक खाद व नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का इस्तेमाल करें. नाइट्रोजन व पोटाशयुक्त उर्वरकों को 3 हिस्सों में बांट कर पहली खुराक सिंचाई के समय बहार प्रबंधन के बाद और दूसरी खुराक 3-4 हफ्ते बाद दें, फास्फोरस की पूरी खाद को पहली सिंचाई के समय दें. जिंक, आयरन, मैगनीज और बोरोन की 25 ग्राम की मात्रा प्रति पौधे डालें.

जब पौधों पर फूल आना शुरू हो जाएं, तो उस में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश 12:61:00 को 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से एक दिन के फासले पर एक महीने तक दें.

जब पौधों में फल लगने शुरू हो जाएं तो नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश 19:19:19 को ड्रिप की मदद से 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से एक दिन के अंतराल पर एक महीने तक दें.

जब पौधों पर पूरी तरह से फल आ जाएं तो नाइट्रोजन और फास्फोरस 00:52:34 या मोनोपोटैशियम फास्फेट 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा को एक दिन के अंतराल पर एक महीने तक दें.

फल की तुड़ाई के एक महीने पहले कैल्शियम नाइट्रेट की 12.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा को ड्रिप की सहायता से 15 दिनों पर 2 बार दें.

ऐसे करें सिंचाई 

अनार के पौधे सूखा सह लेते हैं, पर अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई का खास फायदा है. मृग बहार की फसल लेने के लिए सिंचाई मई माह के मध्य से शुरू कर के मानसून आने तक नियमित रूप से करनी चाहिए.

बारिश आने के बाद फलों के अच्छे विकास के लिए लगातार सिंचाई 10-12 दिन के फासले पर करनी चाहिए. ड्रिप सिंचाई अनार के लिए उपयोगी साबित हुई है. इस में 43 फीसदी पानी की बचत और 30-35 फीसदी उपज में इजाफा हुआ है.

संधाई व काटछांट : अनार की 2 तरह से संधाई की जा सकती है. एक, तना विधि द्वारा. इस विधि में एक तने को छोड़ कर बाकी सभी बाहरी टहनियों को काट दिया जाता है. दूसरी, बहु तना विधि द्वारा. इस विधि में 3 से 4 तने छूटे हों, बाकी टहनियों को काट दिया जाता है.

इस तरह साधे हुए तने में रोशनी बढि़या मिलती है. रोगग्रस्त हिस्से के 2 इंच नीचे तक छंटाई करें और तनों पर बने सभी कैंकर को गहराई से छील कर निकाल देना चाहिए. छंटाई के बाद 10 फीसदी बोर्डो पेस्ट को कटे हुए हिस्से पर लगाएं. बारिश के समय में छंटाई के बाद तेल वाला कौपर औक्सीक्लोराइड और 1 लिटर अलसी का तेल का इस्तेमाल करें.

बहार नियंत्रण : अनार में साल में 3 बार जूनजुलाई (मृग बहार), सितंबरअक्तूबर (हस्त बहार) व जनवरीफरवरी (अंबे बहार) में फूल आते हैं. व्यावसायिक तौर पर केवल एक बार ही फसल ली जाती है और इस का निर्धारण पानी की मौजूदगी व बाजार की मांग के मुताबिक किया जाता है.

जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा नहीं होती है, वहां मृग बहार से फल लिए जाते हैं. जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा है, वहां अंबे बहार से फल लिए जाते हैं. बहार नियंत्रण के लिए जिस बहार से फल लेने हों, उस के फूल आने से 2 माह पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए. रासायनिक बहार नियमन के लिए इथ्रेल की उच्च सांध्रता (1 से 2 मिलीलिटर प्रति लिटर) का इस्तेमाल किया जाता है.

तुड़ाई : अनार बेमौसम वाला फल है. जब फल पूरी तरह से पक जाएं, तभी पौधों से तोड़ना चाहिए. पौधों में फल सेट होने के बाद 120-130 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. पके फल पीलापन लिए लाल हो जाते हैं.

उपज : पौध रोपण के 2-3 साल बाद फलना शुरू कर देते हैं, लेकिन व्यावसायिक रूप से उत्पादन रोपण के तकरीबन 4-5 साल बाद ही लेना चाहिए. अच्छी तरह से विकसित पौधा 60-80 फल हर साल 25-30 साल तक देता है.

भारत का एक प्राचीन देशी गेहूं पैगांबरी किस्म है शुगर फ्री

आज से २० साल पहले मटर की फसल के बीच में हमें एक गेहूं का ऐसा पौधा मिला, जो देखने में सामान्य गेहूं के पौधों से काफी अलग था. उसी एक पौधे से हम ने इस के बीज संवर्धन की शुरुआत की थी, पर इस एक पौधे ने हमें इस गेहूं पर शोध करने के लिए प्रेरित किया.

पैगांबरी गेहूं लोकप्रिय रूप से अपने आकर्षक चमकीले छोटे गोल मोती जैसे दाने के कारण शुगर फ्री गेहूं के रूप में जाना जाता है. यह एक प्रकार का ट्रिटिकम स्फेरोकोकम  गेहूं है. इस का दाना गोल आकार का और पौधा बौनी प्रजाति का होता है. इस के पौधे की ऊंचाई 70 से 80 सैंटीमीटर तक होती है.

सही माने में देखा जाए तो यह गेहूं पहला भारतीय गेहूं कहा जाता है, क्योंकि इस की उत्पत्ति सिंधु घाटी सभ्यता से हुई थी और यह उस सभ्यता में मुख्य भोजन में से एक था. इस के उलट यह माना जाता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में तकरीबन 4000 साल पहले बौना गेहूं विकसित किया गया था, जो शायद वह यही गेहूं है.

मधुमेह की बढ़ती घातक बीमारी को देखते हुए मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के भगवंतराव मंडलोई कृषि कालेज ने इसी देशी प्रजाति पैगांबरी गेहूं से एक नई किस्म तैयार की है. इस गेहूं के सेवन से मधुमेह की बीमारी काबू की जा सकती है.

दुनियाभर में तेजी से शुगर के मरीजों की बढ़ती तादाद को देखते हुए खंडवा के भगवंतराव मंडलोई कृषि कालेज के वैज्ञानिकों ने गेहूं की एक पुरानी प्रजाति का पता लगाया है. गेहूं की इस प्रजाति का प्राचीन नाम पैगांबरी है, किंतु कृषि वैज्ञानिकों के इस प्रजाति पर किए गए अपने शोध में कई स्वास्थ्य लाभ देने वाले गुण पाए गए हैं. इस वजह से वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति से एक नई किस्म तैयार की है, जो शुगर फ्री है. यह डायबिटीज के मरीजों के लिए वरदान साबित होगा. वैज्ञानिकों का यह प्रयोग स्थानीय स्तर पर सफल हुआ है.

कृषि वैज्ञानिक सुभाष रावत ने बताया कि शुगर कंट्रोल करने के लिए कृषि कालेज में गेहूं की प्राचीन देशी प्रजाति से गेहूं की एक नई किस्म ए-12 तैयार की गई है. इसे शुगर फ्री गेहूं का नाम दिया है. इस में शुगर व प्रोटीन की मात्रा कम है.

अब कालेज इस तरह की खेती बड़े पैमाने पर कराने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि शुगर से पीडि़त मरीजों को ठीक किया जा सके.

उन्होंने यह भी बताया कि कालेज में पिछली बार भी यह गेहूं लगाया गया था. इस के अच्छे नतीजे सामने आए थे. साथ ही, किसानों को जागरूक किया जा रहा है, ताकि वे गेहूं की किस्म ए-12 की ज्यादा से ज्यादा बोआई करें.

Wheatपैगांबरी गेहूं की प्रजाति का दाना देखने में मैथी के दाने की तरह है, जबकि सामान्य गेहूं का दाना लंबा व अंडे के आकार का होता है. इस में छिलका व फाइबर अधिक और प्रोटीन की मात्रा कम होती है.

पैगांबरी गेहूं की खासीयत : इस गेहूं के बारे में समृद्धि देशी बीज बैंक, रुठियाई द्वारा किए कृषि शोधात्मक विश्लेषण में यह पाया गया कि यह किसी भी तरह की मिट्टी में बोया जा सकता है. वैसे तो इस की सिंचाई के लिए 4 से 5 बार सिंचाई की जरूरत होती है, किंतु काली दोमट उपजाऊ मिट्टी में केवल 2 सिंचाई में भी पक कर तैयार हो जाता है.

अगर इस के उत्पादन की बात करें, तो पर्याप्त सिंचित, कार्बनिक तत्त्वों से भरपूर उपजाऊ जमीन पर 60 से 65 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज ली जा सकती है.

इस की बोआई नवंबर माह के पहले हफ्ते से ले कर जनवरी माह के पहले हफ्ते तक की जा सकती है. इस की फसल 120 से 125 दिन में पक कर तैयार हो जाती है.

इस का भूसा बहुत बारीक निकलता है, जिसे पशु बहुत पसंद करते हैं.

अब इस के उपयोग पर अगर हम नजर डालें तो इस का उपयोग मुख्य रूप से रोटियां बनाने, ब्रेड टोस्ट बनाने, दलिया बनाने और इस के दानों से चावल की तरह खीर बनाने में किया जाता है.

इस गेहूं की रोटियां बहुत ही मुलायम, सफेद और स्वादिष्ठ होती हैं.

इसे खाने के फायदे

एनर्जी के लिए : पैगांबरी गेहूं खाने से एनर्जी मिलती है. ये ऊर्जा का एक बहुत अच्छा स्रोत है. यह वजन घटाने में भी सहायक है. दरअसल, इसे खाने के बाद काफी देर तक भूख नहीं लगती. इस से वजन कंट्रोल भी होता है.

स्वस्थ दिल के लिए : पैगांबरी गेहूं कौलेस्ट्रौल लेवल को कंट्रोल करने में मदद करता है. इस से दिल से जुड़ी बीमारियां होने का खतरा कम हो जाता है. इस में मैग्नीशियम और पोटैशियम भी है, जो ब्लड प्रैशर को नियंत्रित रखने में मददगार है.

पाचन को रखे दुरुस्त : पैगांबरी गेहूं में भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो पाचन को दुरुस्त रखने में सहायक है. इस गेहूं को खाने से कब्ज की समस्या भी नहीं होती है.

कैंसर से बचाव : गेहूं की खेती जैविक तरीके से की जा रही है, इसलिए यह कैंसर के बचाव में भी सहायक है. डायबिटीज के मरीज इस का नियमित सेवन कर शुगर कंट्रोल कर सकते हैं.

पैगांबरी गेहूं की खूबियां

* आकार मैथी की तरह है.

* बाजरे की तरह गुण हैं.

* अन्य गेहूं की अपेक्षा प्रोटीन कम है.

* छिलका ज्यादा है.

* जल्दी पचने वाली वैरायटी है.

* फायबर अधिक है.

अधिक जानकारी के लिए लेखक से उन के मोबाइल नंबर 7898915683 पर संपर्क कर सकते हैं.

ऐसे बनाएं भरपूर कंपोस्ट

आज के सघन खेती के युग में जमीन की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने के लिए समन्वित तत्त्व प्रबंधन पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है. इस के तहत प्राकृतिक खादों का प्रयोग बढ़ रहा है. इन प्राकृतिक खादों में गोबर की खाद, कंपोस्ट और हरी खाद मुख्य है.

ये खाद मुख्य तत्त्वों के साथसाथ गौण तत्त्वों से भी भरपूर होती हैं. गोबर का प्रयोग ईंधन के रूप में (70 फीसदी) होने के कारण इस से बनी खाद कम मात्रा में उपलब्ध होती है. हरी खाद और अन्य खाद भी कम मात्रा में प्रयोग होती है, इसलिए जैविक पदार्थ का प्रयोग बढ़ाने के लिए खाद बनाने के लिए कंपोस्ट का तरीका अपनाना चाहिए.

कंपोस्ट बनाने के लिए फसलों के अवशेष, पशुशाला का कूड़ाकरकट के अलावा गांव व शहरी कूड़ाकरकरट वगैरह को एक बड़े से गड्ढे में गलाया और सड़ाया जाता है.

जरूरी सामग्री : फसल के अवशेष व कूड़ाकरकर 80 फीसदी, गोबर (10-15 दिन पुराना) 10 फीसदी, खेत की मिट्टी 10 फीसदी, ढकने के लिए पुरानी बोरी या पौलीथिन और पानी. इस के अलावा छायादार जगह पर या पेड़ के नीचे गड्ढा बनाएं.

Compostकंपोस्ट बनाने की विधि : कंपोस्ट बनाने के लिए गड्ढे की लंबाई 1 मीटर, चौड़ाई 1 मीटर और गहराई 1 मीटर होनी चाहिए. गड्ढे की लंबाई, चौड़ाई व गहराई फसल अवशेष पर भी निर्भर है.

* सब से नीचे 12-15 सैंटीमीटर मोटी भूसे की परत लगाते हैं.

* भूसे की परत के ऊपर 10-12 सैंटीमीटर मोटी गोबर की परत लगाई जाती है.

* गोबर की परत के ऊपर 30-45 सैंटीमीटर मोटी फसल अवशेष या कूड़ाकरकट की परत लगाते हैं.

* इस के ऊपर 3-4 सैंटीमीटर की मोटी मिट्टी की परत लगाई जाती है.

* सब से ऊपर 5-6 सैंटीमीटर की मोटी गोबर की परत लगाई जाती है.

* एक महीने के बाद इस को उलटपलट कर देते हैं.

* नमी की मात्रा सामग्री में 60-70 फीसदी होना जरूरी है.

* इस तरह कंपोस्ट 3 महीने में तैयार हो जाती है.

* इस कंपोस्ट में नाइट्रोजन 0.8 से 1.0 फीसदी, फास्फोरस

0.6-0.8 फीसदी और पोटाश 0.8-1.0 फीसदी होती है.

कंपोस्ट के इस्तेमाल से लाभ

* इस के इस्तेमाल से मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा में बढ़ोतरी होती है.

* जरूरी तत्त्वों की संतुलित मात्रा में उपलब्धि होती है.

* मिट्टी व पानी का संरक्षण अधिक होता है.

* पौधों की जड़ों के लिए उचित वातावरण बनता है और इन की बढ़ोतरी अच्छी होती है.

* फसल अवशेष का सदुपयोग होता है.

* पशुशाला के कूड़ेकरकट का उपयोग कंपोस्ट बनाने में इस्तेमाल होता है.

* यह एक प्रदूषणरहित प्रक्रिया है.

* कंपोस्ट खाद की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए रौक फास्फेट डाल कर फास्फोरसयुक्त कंपोस्ट भी बना सकते हैं.

फास्फोरसयुक्त खाद बनाने की विधि

घासफूस, खरपतवार, फसल अवशेष 400 किलोग्राम. पशुओं का गोबर 300 किलोग्राम. रौक फास्फेट 100-150 किलोग्राम.

* बताई गई सामग्री को फावड़े या कस्सी से अच्छी तरह मिलाएं और पानी से नमी की मात्रा 60-70 फीसदी तक रखें.

* इस मिश्रण को 4 फुट चौड़े, 10 फुट लंबे व 3 फुट गहरे गड्ढे में डालें.

* 20 दिन बाद मिश्रण को उलटपलट कर व जरूरत के मुताबिक पानी डालें. इस प्रक्रिया को 50 दिन बाद फिर दोहराएं.

* 90 दिन बाद जैविक खाद बन कर तैयार हो जाएगी. इस में 0.8 से 1.0 फीसदी नाइट्रोजन, 3-4 फीसदी फास्फोरस व 0.5 फीसदी पोटाश.

* इस तरह से तैयार 2 टन जैविक खाद 60 किलोग्राम फास्फोरस के बराबर होती है.

धान की पराली से जैविक खाद बनाएं 

हरियाणा में ज्यादातर किसान धान की पराली को आग लगा कर खत्म कर देते हैं. इस से कि हवा खराब हो जाती है और जमीन के लाभदायक जीवजंतु भी खत्म हो जाते हैं.

अगर किसान धान की पराली को इकट्ठा कर उस से खाद बनाएं और खेतों में 10 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डालें तो इस से जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी और नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की खाद भी कम मात्रा में डालनी पड़ेगी और किसान भाइयों को रासायनिक खाद की बचत भी होगी.

बनाने की विधि

* सब से पहले अपने खेत में धान की पराली को इकट्ठा करें, फिर 1,000 लिटर पानी में एक किलोग्राम यूरिया डाल कर घोल बनाएं और इस घोल में 10 ग्राम एसपरजीलस अवामोरी नामक फफूंद डालें जो कि सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार से मिल जाएगी.

* अब धान की पराली का एकएक गट्ठर उठाएं और घोल में 3 मिनट के लिए डुबो दें और फिर निकाल कर एक ढेर बनाते जाएं जो कि 1.5 मीटर चौड़ा, 1.5 मीटर ऊंचा हो और जिस की लंबाई पराली की मात्रा के मुताबिक रखी जा सकती है. इस तरह पराली का ढेर बनाने के बाद इसे मोटी पौलीथिन की शीट से ढक दें.

* ऊपर बनी धान की पराली के ढेर में पानी की मात्रा 60-70 फीसदी 3 महीने तक बनाए रखें, एक महीने के बाद धान की पराली को उलटपलट कर दें और फिर से पौलीथिन की शीट को ढक दें. तकरीबन 3 महीने में खाद बन कर तैयार हो जाएगी.

* इस विधि से तैयार 1 टन खाद में 12-14 किलोग्राम नाइट्रोजन, 6-7 किलोग्राम फास्फोरस और 19-22 किलोग्राम पोटाश होती है.

चमेली की खेती महकती जिंदगी

भारत में चमेली की खेती कई इलाकों में की जाती है, लेकिन तमिलनाडु पहले स्थान पर है. उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद, जौनपुर और गाजीपुर जिलों में भी इसे उगाया जाता है. इस के फूल आमतौर पर सफेद रंग के होते हैं, लेकिन कहींकहीं पीले रंग के फूलों वाली चमेली भी पाई जाती है.

चमेली के फूल, पेड़ व जड़ तीनों ही औषधीय चीजें बनाने में इस्तेमाल होते हैं. इस के फूलों से सजावट के अलावा तेल और इत्र भी तैयार किए जाते हैं. भारत से चमेली के फूलों को श्रीलंका, सिंगापुर और मलयेशिया भेजा जाता है.

आबोहवा और मिट्टी : इस की खेती गरम व नम जलवायु में अच्छी तरह से होती है. गरम जलवायु में पानी की अच्छी सहूलियत और लंबे समय तक उजाला चमेली के लिए अच्छा माना जाता है.

चमेली की खेती कई तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी, जिस में पानी न रुकता हो और जिस का पीएच मान 6.5-7.5 हो, ज्यादा अच्छी रहती है.

किस्में : भारत में चमेली की तकरीबन 80 किस्में पाई जाती हैं, किंतु कारोबारी खेती के लिए 3 किस्मों को उगाया जाता है :

जैस्मिनम

औरिकुलेटम : यह झाडि़यों वाली किस्म है, जो पूरे साल फूल देती है. इस में सब से ज्यादा फूल मानसून के समय आते हैं. इस के फूलों में महक बहुत होती है और इन से 0.24 से 0.42 फीसदी तक तेल हासिल होता है.

जैस्मिनम सैमबैक : यह किस्म फूल की पैदावार के लिए बेहद अच्छी है.

जैस्मिनम ग्रांडीफ्लोरम : इस के पौधे आधे बेल वाले होते हैं और इन में फूल जून से सितंबर महीने में आते हैं. इस के फूलों से 0.24 से 0.42 फीसदी तेल हासिल किया जाता है.

पौध तैयार करना : चमेली की कलम कटिंग द्वारा तैयार की जाती है. इस की कटिंग जनवरीफरवरी महीने में लगानी चाहिए, क्योंकि इस समय इस में सब से ज्यादा जड़ें निकलती हैं.

खेत की तैयारी : चमेली की खेती के लिए सब से पहले खेत की 2-3 बार गहरी जुताई करते हैं. इस के बाद 1.5×1.5 मीटर की दूरी पर 30×30 सैंटीमीटर आकार के गड्ढे खोद लेते हैं. इन गड्ढों में 10-15 किलोग्राम कंपोस्ट खाद और मिट्टी भर देते हैं.

जड़ निकली हुई कटिंग को इन गड्ढों के बीच में लगा कर सिंचाई कर देते हैं. कटिंग की रोपाई का सब से अच्छा समय जून से ले कर अक्तूबर माह तक होता है. एक एकड़ खेत के लिए तकरीबन 1,800 कटिंग की जरूरत होती है.

खरपतवार खत्म करने के लिए पहली निराई रोपाई के 3-4 हफ्ते बाद करनी चाहिए. पौधों की कटाईछंटाई करने के बाद थालों व पानी की नालियों को अच्छी तरफ साफ कर के 10-15 सैंटीमीटर की गहराई तक खुदाई करनी चाहिए और उस में खाद व उर्वरक मिलाना चाहिए. यह काम हर 2-3 महीने बाद दोहराते रहना चाहिए.

कटाईछंटाई : चमेली की फसल में साल में एक बार कटाईछंटाई की जाती है.

सिंचाई : चमेली को ज्यादा पानी की जरूरत होती है. रोपाई के तुरंत बाद एक सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद जरूरत के मुताबिक हफ्ते में 1-2 बार सिंचाई करते रहें. जब फूल आने शुरू हो जाएं, तो नमी बनाए रखने के लिए सिंचाई करते रहें.

फसल सुरक्षा : चमेली पर मिली बग, जैस्मिन बग, बड वर्म, रैड स्पाइडर माइट, पत्ती काटने वाली सूंड़ी और सफेद मक्खी का हमला होता है.

इन कीटों की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास व सल्फर का इस्तेमाल करें. सरकोस्पोरा व जड़ विगलन बीमारी के लिए कौपर औक्सीक्लोराइड का इस्तेमाल करें.

फूलों की तुड़ाई व उपज : फूलों की तुड़ाई उस समय करनी चाहिए, जब कलियां पकी हों, लेकिन खिली न हों. फूलों की तुड़ाई हमेशा सुबह सूरज निकलने से पहले ही करें.

वैज्ञानिक तकनीक से चमेली की एक  एकड़ फसल से पहले साल 600 से 800 किलोग्राम, दूसरे साल 1,400 से 1,500 किलोग्राम और तीसरे साल 2,200 से 2,500 किलोग्राम फूल हासिल होते हैं. चौथे साल में यह उपज बढ़ कर तकरीबन 3,500 किलोग्राम तक पहुंच जाती है, जो 7-8 साल तक बनी रहती है.

बड़े काम का पत्थरचूर

यह औषधीय पौधा हाई ब्ल्डप्रैशर व दिल से जुड़ी बीमारियों को ठीक करने के लिए मशहूर है. यह पौधा एकवर्षीय शाकीय, शाखान्वित, सुगंधित तकरीबन 1-2 फुट तक लंबा होता है.

इस का वानस्पतिक नाम कोलियस फोर्सकोली है. यह लेमिएसी कुल का सदस्य है. इस के पत्तों व जड़ों से अलगअलग तरह की गंध आती है, पर जड़ों में से आने वाली गंध बहुधा अदरक की गंध से मिलतीजुलती होती है. पत्थर जैसी चट्टानों पर पैदा होने के चलते इस को ‘पाषाण भेदी’ नाम से भी जाना जाता है.

यह पौधा भारत में खासतौर पर उत्तराखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड, गुजरात, कर्नाटक व तमिलनाडु वगैरह राज्यों में पाया जाता है. उत्तराखंड में पत्थरचूर की खेती तकरीबन 1,000 मीटर ऊंचाई तक की गरम जगहों पर की जा सकती है.

औषधीय उपयोग : पत्थरचूर की कंदील जड़ें शीतल, कड़वी, कसैली होती हैं. इन का उपयोग हाई ब्लडप्रैशर, बवासीर, गुल्म यानी नस में सूजन, मूत्रकृच्छ यानी पेशाब में जलन, पथरी, योनि रोग, प्रमेह यानी गोनोरिया, प्लीहा यानी तिल्ली रोग बढ़ना, शूल यानी ऐंठन, अस्थमा, दिल की बीमारी, कैंसर, आंखों की बीमारी वगैरह में किया जाता है. इस के अलावा इस का उपयोग बालों के असमय पकने से रोकने व पेट की बीमारियों के लिए भी किया जाता है.

जमीन व आबोहवा : पत्थरचूर की खेती के लिए नरम, मुलायम मिट्टी, जिस का पीएच मान 5.5-7.0 तक हो, सही रहती है. इस फसल को कम उपजाऊ मिट्टी में भी आसानी से उगाया जा सकता है. लाल रेतीली व रेतीली दोमट मिट्टी इस की खेती के लिए आदर्श मानी जाती है. इस के लिए गरम, आर्द्र आबोहवा काफी सही होती है. अकसर 86-95 फीसदी तक आर्द्रता व 100-160 सैंटीमीटर तक सालाना बारिश वाले इलाकों में इस की खेती सही होती है.

उन्नत किस्में : पत्थरचूर की 2 प्रमुख उन्नत किस्में हैं गारमल मैमुल और के-8.

कृषि तकनीक

खेत की तैयारी : पत्थरचूर की खेती के लिए खेत में 2-3 बार हल से जुताई कर के 10 टन गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देनी चाहिए, पर अगर जैविक खाद का इस्तेमाल किया जाना मुमकिन न हो तो प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम नाइट्रोजन (15 किलोग्राम प्रतिरोपण के समय व बाकी प्रतिरोपण के एक माह बाद) 50 किलोग्राम फास्फोरस व 40 किलोग्राम पोटाश की मात्रा डालने से पौधों की सही बढ़वार होती है.

प्रवर्धन : पत्थरचूर का प्रवर्धन बीजों व कलमों द्वारा किया जा सकता है.

बोआई : पत्थरचूर की खेती बीजों व कलमों दोनों से की जा सकती है, पर कलमों से खेती करना ज्यादा सुविधाजनक होता है. यह विधि प्रचलित भी है.

पत्थरचूर की खेती के लिए नर्सरी की जरूरत होती है. इस के लिए 2-2 मीटर की क्यारियां तैयार कर के पाषाण भेदी की कलमों को लगा देना चाहिए जो 10-12 सैंटीमीटर लंबी हो व जिन में 5-6 पत्ते लगे हों. जल्दी ही कलमों से जड़ें फूटने लगती हैं.

नर्सरी से एक माह पुरानी कलमों को निकाल कर खेत में रोप देना चाहिए. पौध से पौध के बीच की दूरी 30 सैंटीमीटर और कतार से कतार की दूरी 30 सैंटीमीटर तक होनी चाहिए. इस तरह एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए तकरीबन 1 लाख कलमों की जरूरत होती है. प्रतिरोपण के 2 महीने बाद कोलियस के पौधों पर हलके नीले जामुनी रंग के फूल आने लगते हैं. इन फूलों को नाखुनों की मदद से तोड़ या काट दिया जाना चाहिए वरना जड़ों का विकास प्रभावित हो सकता है.

उर्वरक : पौधा रोपते समय प्रति हेक्टेयर 9-10 टन गोबर की सड़ी खाद डालनी चाहिए.

सिंचाई : पौध रोपने के बाद अगर बारिश न हो तो तत्काल सिंचाई करना बहुत जरूरी होता है. रोपने के पहले 2 हफ्तों में हर 3 दिन में एक बार पानी देना जरूरी होता है, जबकि बाद में हफ्ते में एक बार सिंचाई करना सही रहेगा.

Medicinal Plantनिराईगुड़ाई : पत्थरचूर मानसून की फसल होने के चलते समयसमय पर निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकालते रहना चाहिए.

कीट, रोग व उन की रोकथाम : पत्थरचूर की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीटों में बैक्टरियल विल्ट, कैटरपिलर, मिली बग, नोमोटिड्स वगैरह होते हैं. इन की रोकथाम के लिए 10 मिलीलिटर मिथाइल पैराथियान 10 लिटर पानी में घोल कर पौधों व उन की जड़ों पर छिड़काव करना चाहिए.

वहीं बैक्टीरियल विल्ट के लिए 0.2 फीसदी कैप्टान घोल का स्प्रे करना चाहिए. नोमोटिड्स की रोकथाम के लिए 8-10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से कार्बोफ्यूरान के ग्रेनुअल्स का इस्तेमाल करना चाहिए.

दोहन व संग्रहण : पत्थरचूर की फसल रोपण के 4.5-5 माह बाद खुदाई के लिए तैयार हो जाती है. वैसे, तब तक इस के पत्ते हरे ही रहते हैं, पर यह देखते रहना चाहिए कि जब जड़ें अच्छी तरह विकसित हो जाएं (यह स्थिति रोपण के तकरीबन 4-5 माह के बाद आती है) तो पौधों को उखाड़ लिया जाना चाहिए.

उखाड़ने से पहले खेत की हलकी सिंचाई कर दी जानी चाहिए, ताकि जमीन गीली हो जाए और जड़ें आसानी से उखाड़ी जा सकें. फिर जड़ों को धो कर साफ कर लेना चाहिए. उस के बाद छोटेछोटे टुकड़ों में काट कर छायादार जगह पर सुखा लेना चाहिए. फिर सूखी जड़ों को बोरियों में भर कर इकट्ठा कर देना चाहिए.

पत्थरचूर का विवरण

उत्पादन व उपज : पत्थरचूर की फसल से तकरीबन 15-18 क्विंटल तक सूखी जड़ें प्रति हेक्टेयर की दर से हासिल होती हैं.

बाजार की कीमत : पत्थरचूर का वर्तमान बाजार मूल्य 40-45 रुपए प्रति किलोग्राम तक होता है.

खर्च का ब्योरा : पत्थरचूर की खेती पर होने वाली अनुमानित लागत व प्राप्ति का प्रति व्यक्ति आर्थिक विवरण निम्न प्रकार है:

शुद्ध लाभ : 60,000.00

कुल प्राप्ति : 15,800.00

कुल लागत : 44,200

पौलीहाउस में टमाटर  की  खेती

टमाटर अपने लाभदायक गुणों व तमाम उपयोगों के कारण सब से महत्त्वपूर्ण सब्जी वाली फसल है. यह एक बहुत अहम सुरक्षित खाद्य पदार्थ है. इस की खेती सभी जगहों पर की जा सकती है. संसार में आलू व शकरकंद के बाद टमाटर ही सब से अधिक पैदा की जाने वाली सब्जी है.

टमाटर का इस्तेमाल टमाटर सूप, सलाद, अचार, टोमेटो कैचप, प्यूरी व चटनी वगैरह बनाने में किया जाता है. इस के अलावा लगभग हर सब्जी के साथ टमाटर का भी इस्तेमाल किया जाता है.

टमाटर गरम मौसम की फसल है. इस की फसल उन इलाकों में ज्यादा अच्छी होती है, जहां पाला नहीं पड़ता है. लेकिन ज्यादा गरमी और सूखे मौसम में अधिक वाष्पीकरण होने के कारण टमाटर के कच्चे व छोटे फल तेजी से गिरने लगते हैं.

टमाटर की फसल में 38 डिगरी सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान होने पर फल नहीं बनते और पहले से मौजूद फलों का आकार भी बिगड़ जाता है. इसी तरह बहुत कम तापमान (0 से 12 डिगरी सेंटीगे्रड) पर भी फल नहीं बनते. टमाटर में लाइकोपिन नामक वर्णक की मात्रा 20-25 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान पर अधिक बनती है और 27 डिगरी सेंटीग्रेड पर इस वर्णक का उत्पादन तेजी से गिरने लगता है. तापमान 32 डिगरी सेंटीग्रेड  के ऊपर पहुंचने पर लाइकोपिन बनना बंद हो जाता है.

तापमान व फसल में लगने वाले कीड़ों व बीमारियों को ध्यान में रखते हुए अगर टमाटर की खेती पौलीहाउस में की जाए तो कम और ज्यादा तापमान से भी फसल को बचाया जा सकता है. साथ ही फसल को कीड़ों व बीमारियों से भी बचा कर अधिक उत्पादन लिया जा सकता है.

आजकल नेचुरल वैंटीलेटेड पौलीहाउस बनाए जाते हैं, जिन में अलग से पंखे लगाने की जरूरत नहीं होती.

मिट्टी व उस की तैयारी

पौलीहाउस के अंदर टमाटर की खेती के लिए चिकनी दोमट, दोमट या बलुई दोमट जीवांश युक्त मिट्टी जिस का पीएच मान 6.5-7.0 हो, अच्छी रहती है. जमीन की 4-5 बार जुताई कर के उस में 1 मीटर चौड़ा 8-9 इंच उठा हुआ बैड बना देना चाहिए.

बीज की मात्रा : 1 हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए देशी किस्मों का 400 ग्राम बीज या संकर किस्मों का 200 ग्राम बीज जरूरी होता है.

डिटरमिनेट प्रजाति: पूसा अर्ली ड्वार्फ, आजाद टी 6, पूसा गौरव, डीवी आरती 1 व डीवी आरती 2. आमतौर पर अगेती प्रजातियां डिटरमिनेट किस्म की होती हैं. इन की बढ़वार सीमित होती है.

इनडिटरमिनेट प्रजाति : अर्का सौरभ, अर्का विकास, पूसा रूबी, पंत बहार, पंत टमाटर 3 व केएस 17. इन प्रजातियों की लंबाई लगातार बढ़ती रहती है.

संकर किस्में : पूसा हाइब्रिड 2, रूपाली, अविनाश 2, एमटीएच 15, नवीन, राजा, अपूर्वा, अजंता व रश्मि.

खाद व उर्वरक

टमाटर की फसल में उन्नतशील प्रजाति के लिए प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल गोबर की खाद, 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60-80 किलोग्राम फास्फोरस और 80-100 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है. गोबर की खाद 1 माह पहले खेत की तैयारी के समय खेत में मिला देनी चाहिए. नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पहले खेत में डाल कर 1 मीटर चौड़ा व 8-9 इंच ऊंचा बैड बना देना चाहिए.

Tomatoनर्सरी और रोपाई

1 हेक्टेयर खेत में रोपाई के लिए टमाटर की नर्सरी तैयार करने के लिए 8-9 इंच ऊंची, 1 मीटर चौड़ी व 3 मीटर लंबी क्यारियां लगभग 200 वर्ग मीटर में तैयार की जाती हैं. क्यारियां  (बैड) तैयार करते समय 10-15 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद व 15-20 ग्राम डीएपी प्रति वर्ग मीटर की दर से मिलाएं और 3-4 बार खुदाई कर के बैड को समतल कर लें. फिर उठी हुई क्यारियों में लगभग 1 सेंटीमीटर की गहराई पर 2 सेंटीमीटर की दूरी पर बीजों की बोआई करें. लाइन से लाइन की दूरी 10 सेंटीमीटर रखें. बोआई के बाद हजारे द्वारा हलकी सिंचाई करें.

1 हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए सामान्य किस्म का 400 ग्राम व संकर किस्मों का 200 ग्राम बीज लगता है. बीज हमेशा कार्बंडाजिम या थायरम से उपचारित कर के ही बोआई करें. जब पौधे 5-6 पत्ती वाले या 25-30 दिनों के हो जाएं तो तैयार खेत में 3 इंच गहरे गड्ढे खोद कर पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी 60 सेंटीमीटर रखते हुए रोपाई कर देनी चाहिए.

मैदानों व पौलीहाउसों में टमाटर की फसल साल में 2 बार ली जा सकती है. पहली फसल के लिए जुलाईअगस्त में बोआई की जाती है और रोपाई का काम अगस्त के आखिर तक किया जाता है. दूसरी फसल नवंबरदिसंबर में बोई जाती है और पौधों की रोपाई दिसंबरजनवरी में की जाती है.

टमाटर जल्दीजल्दी व उथली निराईगुड़ाई चाहने वाली फसल है, लिहाजा हर सिंचाई के बाद ‘हैंड हो’ या खुरपी द्वारा खेत की ऊपरी सतह को भुरभुरी बनाना चाहिए. गहरी निराईगुड़ाई नहीं करनी चाहिए, इस से जड़ों को नुकसान हो सकता है.

कटाईछंटाई व स्टैकिंग

बाजार में टमाटर शीघ्र उपलब्ध कराने के लिए पौधों की कटाई कर के एक तने के रूप में कर के तार द्वारा ऊपर चढ़ा देते हैं. इस से पौधे अधिक बढ़ते हैं. टमाटर बड़े आकार के होते हैं और ज्यादा पैदावार होती है.

सिंचाई : पौलीहाउस में टमाटर की फसल में सिंचाई ड्रिप (बूंदबूंद) या स्प्रिंकलर विधि द्वारा की जाती है. इस से लगभग 40-50 फीसदी पानी की बचत होती है. गरमियों में 4-5 दिनों के अंतर पर और सर्दियों में 8-10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते हैं.

पौधों को सहारा देना

इनडिटरमिनेट और संकर प्रजातियों में पौधों को सहारा देने की जरूरत होती है. इस के लिए लोहे के तारों को पौलीहाउस के पोलों में बांध देते हैं. जरूरत के मुताबिक तार बांधने के लिए बांसों को जमीन में गाड़ देते हैं. लोहे के तारों से सुतली या प्लास्टिक की रस्सी नीचे लटका कर पौधों की जड़ों के पास बांध देते हैं. इस प्रकार पौधों को सहारा मिल जाता है और वे ठीक ढंग से बढ़ते हैं.

कटाई : टमाटर के फल पकने की अवस्था उसे उगाने के मकसद व एक जगह से भेजे जाने वाली दूसरी जगह की दूरी पर निर्भर करती है. इस के फलों की तोड़ाई इन अवस्थाओं में की जाती है :

हरी अवस्था : अधिक दूर के बाजारों में भेजने के लिए हरे परंतु पूरी तरह विकसित फलों की तोड़ाई करते हैं.

गुलाबी अवस्था : स्थानीय बाजारों के लिए गुलाबी टमाटरों की तोड़ाई करते हैं.

पकी हुई अवस्था : घर के पास लगे पौधों से तुरंत इस्तेमाल के लिए पके लाल टमाटर तोड़े जाते हैं.

पूरी तरह पकी अवस्था : अचार व प्यूरी बनाने व डब्बों में बंद करने के लिए पूरी तरह पके टमाटर तोड़े जाते हैं.

उपज : पौलीहाउस में टमाटर की उपज 800-1000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हासिल हो जाती है.

बीमारियां

आर्द्रगलन : बीज से पौधा बनते ही नर्सरी में पौधा मुरझा जाता है. ये लक्षण कुछ दिनों बाद दिखाई देते हैं. इस के उपचार के लिए क्यारियों को 1 भाग फार्मलीन में 7 भाग पानी मिला कर बोआई से 15-20 दिनों पहले से शोधित करें और पौलीथीन से ढक दें.

क्यारियों को मैंकोजेब (25 ग्राम दवा को 10 लीटर पानी में मिला कर) और कार्बंडाजिम (20 ग्राम दवा को 10 लीटर पानी में मिला कर) के घोल से लक्षण दिखाई देते ही सींचें.

मरोडिया (लीफ कर्ल) रोग : यह विषाणु से होने वाली बीमारी है, जो सफेद मक्खी द्वारा फैलती है. इस में टमाटर की पत्तियां मुड़ जाती हैं, उन का आकार छोटा हो जाता है, उन की सतह खुरदरी हो जाती है और बढ़वार रुक जाती है. इस की रोकथाम के लिए रोग प्रतिरोधी किस्में जैसे एस 12 लगाएं. इस के अलावा इमिडाक्लोरोपिड 0.5 मिली लीटर  को 1 लीटर पानी में घोल कर स्प्रे करें. पौधशाला में मच्छरदारी का प्रयोग करें.

जड़ों की गांठ वाले सूत्रकृमि : ये सूक्ष्मदर्शी जीव मिट्टी में रहते हैं. इन के प्रकोप से जड़ों में गांठें बन जाती हैं और पौधे पीले पड़ कर मुरझा जाते हैं. इस से बचाव के लिए सूत्रकृमि रहित पौधशाला से ही पौधे लें. रोगग्रस्त इलाकों में 2-3 सालों के लिए प्रतिरोधी किस्म एस 12 लगाएं. हर साल पौधशाला की जगह बदलें और 5-10 ग्राम फ्यूराडान 3जी की मात्रा प्रति वर्ग मीटर की दर से क्यारियों में मिलाएं.

कीट

फलछेदक कीट : यह टमाटर का खास दुश्मन है. इस कीड़े की इल्लियां हरे फलों में घुस जाती हैं और फलों को सड़ा देती हैं.

जैसिड : ये हरे रंग के छोटे कीड़े होते हैं, जो पौधों की कोशिकाओं से रस चूस लेते हैं, जिस के कारण पौधों की पत्तियां सूख जाती हैं.

सफेद मक्खी : ये सफेद छोटे मच्छर जैसे कीड़े होते?हैं, जो पौधों से रस चूस लेते हैं. ये पत्तियां मुड़ने वाली बीमारी फैलाते हैं.

उपचार : फसल की शुरुआती अवस्था में सफेद मक्खी और जैसिड की रोकथाम के लिए 0.05 फीसदी मेटासिस्टाक्स या रोगार का छिड़काव करना चाहिए.

फल छेदक कीट से प्रभावित फलों और कीड़ों के अंडों को जमा कर के नष्ट कर दें और 0.05 फीसदी मेलाथियान या 0.1 फीसदी कार्बारिल का छिड़काव करें. 10 दिनों बाद दूसरा छिड़काव करें.

प्याज व लहसुन में पौध संरक्षण

हमारे यहां प्याज व लहसुन कंद समूह की मुख्य रूप से 2 ऐसी फसलें हैं, जिन का सब्जियों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान है. देश में इन की खपत काफी है और विदेशी पैसा हासिल करने में इन का बहुत बड़ा योगदान है.

वैसे तो दुनिया में भारत प्याज और लहसुन की खेती में अग्रणी है, लेकिन इन की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता दूसरे कई देशों से कम है. इस के लिए दूसरे तमाम उपायों के साथ जरूरी है कि इन फसलों की रोगों व कीड़ों से सुरक्षा. फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले रोगों व कीड़ों की पहचान और उन की रोकथाम करने से काफी हद तक इन फसलों को बचाया जा सकता है.

मुख्य रोग झुलसा

लक्षण : यह रोग पत्तियों और डंठलों पर छोटेछोटे सफेद और हलके पीले धब्बों के रूप में पाया जाता है, जो बाद में एकदूसरे से मिल कर भूरे रंग के धब्बे में बदल जाते हैं व आखिर में ये धब्बे गहरे भूरे या काले रंग के हो जाते हैं.

धब्बे की जगह पर बीज का डंठल टूट कर गिर जाता है. पत्तियां धीरेधीरे सिरे की तरफ से सूखना शुरू करती हैं और आधार की तरफ बढ़ कर पूरी तरह सूख जाती हैं. अनुकूल मौसम मिलते ही यह रोग बड़ी तेजी से फैलता है और कभीकभी फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है.

रोकथाम : साफसुथरी खेती फसल को निरोग रखती है. वहीं गरमी के महीने में गहरी जुताई और सौर उपचार काफी फायदेमंद रहता है.

दीर्घकालीन असंबंधित फसलों का फसलचक्र अपनाना चाहिए.

रोग के लक्षण दिखाई देते ही इंडोफिल एम-45 की 400 ग्राम या कौपर औक्सीक्लोराइड-50 की 500 ग्राम या प्रोपीकोनाजोल 20 फीसदी ईसी की 200 मिलीलिटर प्रति एकड़ के हिसाब से 200 लिटर पानी में घोल बना कर और किसी चिपकने वाले पदार्थ के साथ मिला कर 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़कें.

बैगनी धब्बा

लक्षण : यह रोग पत्तियों, तनों, बीज स्तंभों व शल्क कंदों पर लगता है. रोगग्रस्त भागों पर छोटेछोटे सफेद धंसे हुए धब्बे बनते हैं, जिन का मध्य भाग बैगनी रंग का होता है.

ये धब्बे जल्दी ही बढ़ते हैं. इन धब्बों की सीमाएं लाल या बैगनी रंग की होती हैं, जिन के चारों ओर ऊपर व नीचे कुछ दूर तक एक पीला क्षेत्र पाया जाता है.

रोग की उग्र अवस्था में शल्क कंदों का विगलन कंद की गरदन से शुरू हो जाता है. रोगग्रस्त पौधों में बीज आमतौर पर नहीं बनते और अगर बीज बन भी गए तो वह सिकुड़े हुए होते हैं.

रोकथाम : इस रोग की रोकथाम भी झुलसा रोग की तरह ही की जाती है.

आधारीय विगलन

लक्षण : इस रोग के प्रकोप से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. बाद में पत्तियां ऊपर से नीचे की तरफ सूखना शुरू होती हैं. कभीकभी पौधे की शुरू की अवस्था में इस रोग के कारण जड़ें गुलाबी या पीले रंग की हो जाती हैं और आकार में सिकुड़ कर आखिर में मर जाती हैं.

रोग की उग्र अवस्था में शल्क कंद छोटे रहते हैं और इस रोग का प्रभाव कंदों के ऊपर गोदामों में सड़न के रूप में देखा जाता है.

रोकथाम : आखिरी जुताई के समय रोगग्रस्त खेतों में फोरेट दानेदार कीटनाशी 4.0 किलोग्राम प्रति एकड़ मिट्टी में अच्छी तरह से मिलाएं.

दीर्घकालीन असंबंधित फसलों से 2-3 साल का फसलचक्र अपनाएं. कंद को खुले व हवादार गोदामों में रखना चाहिए.

विषाणु

लक्षण : इस रोग के कारण पत्तियों पर हलके पीले रंग की धारियां बनती हैं और पत्तियां मोटी व अंदर का भाग लहरदार हो जाता है. ऐसे हालात में धारियां आपस में मिल कर पूरी पत्ती को पीला कर देती हैं और बढ़वार रुक जाती है.

रोकथाम : चूंकि यह रोग कीड़ों से फैलता है, इसलिए फसलवर्धन काल में जब भी इस रोग के लक्षण दिखें, उसी समय मैटासिस्टौक्स या रोगोर नामक किसी एक दवा का एक मिलीलिटर दवा का प्रति लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करें. जरूरत पड़ने पर दोबारा छिड़काव करें.

मुख्य कीड़े

इन फसलों को सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले 2 मुख्य कीड़े हैं, थ्रिप्स (चुरड़ा) व लहसुन मक्खी. इन कीड़ों का प्रकोप फरवरी महीने तक होता है.

थ्रिप्स : इस कीड़े के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. प्रौढ़ काले रंग के बहुत ही छोटे, पतले व लंबे होते हैं, जबकि शिशु यानी बच्चे हलके भूरे व पीले रंग के होते हैं. जहां से पत्तियां निकलती हैं, उसी जगह ये कीड़े रहते हैं और नईनई कोमल पत्तियों का रस चूसते हैं.

इन के प्रकोप से पत्ते के सिरे ऊपर से सफेद व भूरे हो कर सूखने व मुड़ने लगते हैं. इस वजह से पौधों की बढ़वार रुक जाती है. ज्यादा प्रकोप होने पर पत्ते चोटी से चांदीनुमा हो कर सूख जाते हैं. बाद की अवस्था में इस कीड़े का प्रकोप होने पर शल्क कंद छोटे रहते हैं और आकृति में भी टूटेफूटे होते हैं. बीज की फसल पर इस कीड़े का बहुत ज्यादा असर पड़ता है.

रोकथाम : इस कीड़े की रोकथाम के लिए बारीबारी से किसी एक कीटनाशक को 200-250 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें.

(क) 1. 75 मिलीलिटर फैनवैलरेट 20 ईसी

      1. 175 मिलीलिटर डैल्टामेथ्रिन 2.8 ईसी
      2. 60 मिलीलिटर साइपरमेथ्रिन 25 ईसी या 150 मिलीलिटर साइपरमेथ्रिन 10 ईसी

(ख) 1.300 मिलीलिटर मेलाथियान 50 ईसी

प्याज व लहसुन में चुरड़ा कीट की रोकथाम के लिए लहसुन का तेल 150 मिलीलिटर और इतनी ही मात्रा में टीपोल को 150 लिटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ में 3 से 4 छिड़काव करें.

थ्रिप्स की रोकथाम के समय बरतें सावधानी

* एक ही कीटनाशी का बारबार इस्तेमाल न करें.

* छिड़काव की जरूरत मार्चअप्रैल महीने में पड़ती है, क्योंकि कीड़ा फरवरी से मई महीने तक नुकसान करता है, इसलिए कोई चिपकने वाला पदार्थ घोल में जरूर मिलाएं.

* छिड़काव के कम से कम 15 दिन बाद ही प्याज इस्तेमाल में लाएं.

Lahsunप्याज व लहसुन मक्खी

कभीकभी इस कीड़े का प्रकोप भी इन फसलों पर देखने में आता है. लहसुन की मक्खी घरों में पाई जाने वाली मक्खी से छोटी होती है. इस के शिशु (मैगट) व प्रौढ़ दोनों ही फसल को नुकसान पहुंचाते हैं.

मादा सफेद मक्खी मटमैले रंग की होती है, जो मिट्टी आमतौर पर बीज स्तंभों के पास मिट्टी में अंडे देती है. अंडों से नवजात मैगट स्तंभों के आधार पर खाते हुए फसल के भूमिगत तने वाले हिस्सों में आक्रमण करते हैं और बाद में कंदों को खाना शुरू कर देते हैं, जिस से पौधे सूख जाते हैं. बाद में इन्हीं कंदों पर आधारीय विगलन रोग का आक्रमण होता है, जिस से बल्ब सड़ने लगते हैं.

रोकथाम : आखिरी जुताई के समय खेत में फोरेट कीटनाशी 4.0 किलोग्राम प्रति एकड़ मिट्टी में अच्छी तरह से मिलाएं और बाद में थ्रिप्स में बताई गई कीटनाशियों का इस्तेमाल करें.