Online Training : अब सोशल मीडिया पर ऐसे उदाहरणों की बाढ़ आ गई है जिन में बताया जाता है कि अमुक ने 50 लाख सालाना पैकेज की नौकरी छोड़ कर माइक्रोग्रीन्स या हाइड्रोपोनिक्स से एक वर्ष में करोड़ों का कारोबार खड़ा कर लिया. ये कथाएं प्रेरणा से अधिक भ्रम पैदा कर रही हैं. दुखद यह है कि इन्हें वही मंच बढ़ा रहे हैं जो स्वयं को कृषि का विश्वसनीय स्रोत बताते हैं. किसान और खेती में अपना आगामी भविष्य देखने वाला युवा इन्हें सच मान कर दिशा तय करते हैं और यहीं से उन का भटकाव शुरू हो जाता है. यह हमारे आने वाली युवा पीढ़ी के भविष्य लिए, इस देश की खेती के भविष्य के लिए और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी खतरनाक है.

ऑनलाइन प्रशिक्षण का बढ़ता कारोबार

इस के साथ ही इन के द्वारा इस तरह की रातोंरात करोड़ों कमा कर देने वाली नईनई खेती का औनलाइन प्रशिक्षण (Online Training) का एक नया कारोबार शुरू कर दिया गया है. केवल कुछ हजार रुपए ले कर मोबाइल पर खेती सिखाने के दावे किए जा रहे हैं.

माइक्रोग्रीन्स, हाइड्रोपोनिक्स, लाखों रुपए किलो वाली कीड़ाजड़ी, लाखों रुपए किलो वाली औषधि मशरूम, लाखों रुपए वाली केसर की खेती से ले कर स्पिरुलिना उगाने तक और बकरीपालन से लेकर मोती की खेती तक सबकुछ केवल कुछेक घंटों में सिखाने का वादा किया रहा है.

बिना खेतखलिहान के खेती सिखाने की यह प्रवृत्ति एक नई विडंबना है. इस से वास्तविक किसानों को कितना लाभ हो रहा है यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना निश्चित है कि यह एक अलग तरह का व्यवसाय बन चुका है और यह रातोंरात बिना मेहनत के पैसे कमाने के तरीकों में जुड़ गया है.

लागत का खुलासा

जब हम लागत पर आते हैं तो वास्तविकता और प्रचार के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है. एक एकड़ हाइड्रोपोनिक्स स्थापित करने में जहां भारी पूंजी की आवश्यकता होती है, वहीं पारंपरिक खेती बहुत कम लागत में संभव है.

यह अंतर केवल तकनीक का नहीं है बल्कि खेती की आत्मा का है. किसान धीरेधीरे उत्पादक से निवेशक में बदलता दिखाई देता है. खुले खेत में उगाया गया पालक जहां सामान्य लागत में तैयार हो जाता है वहीं मंहगी नियंत्रित प्रणाली में इस की लागत कई गुना बढ़ जाती है. यह अलग बात है कि इस तरह से उगाए गए माइक्रोग्रीन्स को, इस में उगाई गई सब्जियों को ‘सुपरफूड’ जैसे आकर्षक नामों से प्रचारित और प्रसारित कट आक्रामक विपणन प्रणाली के जरीए एलीट क्लास को महंगी दामों पर बेचने में सफल भी हो जाते हैं.

प्राकृतिक ग्रीन हाउस : एक उदहारण

जैसे कि मां दंतेश्वरी हर्बल समूह द्वारा बस्तर के कोंडागांव में विकसित नैचुरल ग्रीनहाउस इस का एक व्यावहारिक उदाहरण है. यह पेड़ों और प्राकृतिक संरचना पर आधारित है. इस की लागत 40 लाख के पौलीहाउस की तुलना में केवल एक लाख रुपए यानी कि अत्यंत कम है. यह प्राकृतिक छाया देता है, पत्तियों से स्वतः हरी खाद बनती है, नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है और जल संचयन की प्रक्रिया भी साथ चलती है.

यह तकनीक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लड़ने में भी सक्षम है और बाहरी ऊर्जा पर निर्भरता कम करती है. सब से महत्त्वपूर्ण यह कि यह किसान को प्रकृति के साथ जोड़ती है, उस से दूर नहीं करती और इसके साथ ही प्रति एकड़ लाखों रुपए की सालाना आमदनी भी देती है.

इस के साथ ही हाइड्रोपोनिक्स और नवीन कृषि तकनीकों को पूरी तरह नकारना भी उचित नहीं है. ये तकनीकें कुछ विशेष परिस्थितियों में निश्चित रूप से उपयोगी हो सकती हैं, विशेषकर जहां भूमि और मिट्टी का अभाव हो या उच्च मूल्य की विशिष्ट फसलों की आवश्यकता हो.

एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि यह बहस दरअसल मिट्टी और हाइड्रोपोनिक्स के बीच नहीं है. यह नियंत्रण और सह अस्तित्व के बीच की बहस है. यदि हम कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम मानेंगे तो हम शायद उत्पादन की मात्रा भी कुछ और बढ़ा लें, लेकिन यदि हम इसे प्रकृति के साथ संबंध के रूप में देखेंगे तभी हम स्थायित्व और गुणवत्ता दोनों को बचा पाएंगे.

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