Agri Exhibition : पटना में आयोजित होगा ‘एग्रो बिहार-2026’ मेला

Agri Exhibition : बिहार कृषि विभाग 12 से 15 मार्च तक पटना के गांधी मैदान में ‘एग्रो बिहार-2026’ मेला आयोजित करेगा. 4 दिन तक चलने वाला यह किसान मेला (Agri Exhibition) किसानों को अनेक आधुनिक कृषि यंत्रों की जानकारी देने का बड़ा मंच बनेगा, जो किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी होगा.

कई राज्यों के कृषि यंत्र निर्माता आएंगे एक मंच पर

कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने बताया कि मेले में देश के प्रमुख कृषि यंत्र निर्माता अपनी अत्याधुनिक मशीनों और तकनीकों का प्रदर्शन करेंगे. बिहार के अलावा पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के कृषि यंत्र निर्माता भी इसमें भाग लेंगे. इससे किसानों को विभिन्न कंपनियों के आधुनिक उपकरणों को एक ही स्थान पर देखने और समझने का अवसर मिलेगा.

लगेंगे 100 से अधिक स्टॉल

यह मेला करीब 3.25 लाख वर्गफीट क्षेत्र में आयोजित किया जाएगा, जिसमें 100 से अधिक स्टॉल लगाए जाएंगे. इसके अलावा खाद्य प्रसंस्करण, पशु एवं मत्स्य संसाधन, गन्ना उद्योग, उद्योग विभाग, सहकारिता विभाग और कॉम्फेड भी अपनी योजनाओं और गतिविधियों की जानकारी देंगे. आगंतुकों के लिए बिहारी व्यंजनों से सुसज्जित विशेष फूड कोर्ट की भी व्यवस्था की गई है.

91 प्रकार के कृषि यंत्रों पर अनुदान की मिलेगी जानकारी

कृषि मंत्री ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में कृषि यांत्रिकरण योजना के तहत 91 प्रकार के कृषि यंत्रों पर अनुदान दिया जा रहा है, जिसके विस्तार से जानकारी भी मेले (Agri Exhibition) में मिलेगी. इसके अलावा किसान बिहार कृषि मोबाइल ऐप या जिला व प्रखंड कृषि कार्यालय से यंत्रवार अनुदान की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.

किसानों को मिलेगा अधिक लाभ

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के किसानों के लिए कृषि यंत्रों पर अधिक अनुदान का विशेष प्रावधान किया गया है. इसके अलावा 20 हजार रुपए या उससे कम अनुदान वाले कृषि यंत्रों पर निबंधित गैर-रैयत कृषक भी योजना का लाभ ले सकते हैं. किसान अपनी पसंद के अनुसार विभाग द्वारा तय कृषि यंत्र खरीद सकते हैं और अनुदान प्राप्त कर सकते हैं.

Mango Processing : आम के उत्पाद बनाएं, बागों से और ज्यादा कमाएं

Mango Processing: आम की ज्यादा पैदावार के मामले में हमारा देश दुनियाभर में पहले नंबर पर है. देश के 160 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा रकबे में फैले बागों में करीब 1,08,000 टन से भी ज्यादा आम पैदा होते हैं, लेकिन आम की प्रति हेक्टेयर पैदावार को बढ़ाना जरूरी है, क्योंकि इस में हमारा देश आज भी काफी पीछे है.

प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ने से आम की लागत में कमी आएगी. साथ ही आम की प्रोसेसिंग से उसे उगाने वाले बागबानों का मुनाफा बढ़ेगा.

यदि सूझभूझ से काम लिया जाए तो आम बागबानों को अमीर बना सकता है. आमों के बागों के मालिक अपनी जमीन पर आम के उत्पाद बनाने की इकाई लगा कर ज्यादा कमा सकते हैं.

कई गुना कमाएं: उगाओ, प्रोसेस करो व ज्यादा कमाओ. खेतीबागबानी से खुशहाली का यही गुर है. मसलन आंधीतूफान की मार से काफी सारे आम पकने से पहले ही गिर जाते हैं. उन्हें सीघे ही बाजार में बेच दिया जाता है.

बाग वालों के मुकाबले कच्चे आम फुटकर बेचने वाले कहीं ज्यादा कमाते हैं, क्योंकि अचारचटनी बनाने वाले ग्राहक उन्हीं आमों को महंगी कीमत पर खरीद कर ले जाते हैं. लिहाजा कच्चे आमों को मिट्टी के मोल बेचने से बेहतर है कि उन को सुखा कर उन का अमचूर बना कर बेचा जाए.सुखाने के बाद 1 क्विंटल आम से करीब 25 किलोग्राम अमचूर बनता है. Mango Processing

मुश्किल नहीं है शुरुआत: कच्चे आमों से अमचूर बनाने में किसी खास तकनीक, मशीन या कैमिकल की जरूरत नहीं पड़ती. आमों को धोएं, पोछें, छीलें, काटें व नमक के पानी में 1 रात भिगोने के बाद 3-4 दिनों तक तेज घूप में सुखाएं.

जब फांकें सूख कर करारी हो जाएं व आलू चिप्स की तरह टूटने लगें तो समझ लें कि अमचूर तैयार है.

सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ पोस्ट हार्वेस्ट टैक्नेलाजी, सीफैट, लुधियाना, पंजाब में आम पर एक खास परियोजना चल रही है. वहां के माहिरों ने कम वक्त में बेहतर ढंग से फल सुखाने के उम्दा ड्रायर भी बनाए हैं. बड़े पैमाने पर अमचूर सुखाने के लिए उन का इस्तेमाल किया जा सकता है.

यह तो सिर्फ एक उदाहरण है.अमचूर के अलावा आम का अचार, चटनी, मुरब्बा, शरबत, आमपापड़, जूस, आइसक्रीम, जैम, जैली, मैंगोशेक व आमपना वगैरह बहुत सी चीजें बनाई व बेची जा सकती हैं.

यहां लें मदद: सरकार राष्ट्रीय बागबानी मिशन व राष्ट्रीय बागबानी बोर्ड की स्कीमों के तहत माली इमदाद
देती है. आम पर खास खोजबीन के लिए लखनऊ में मलीहाबाद के पास रहमानखेड़ा काकोरी में केंद्र सरकार का एक आम अनुसंधान संस्थान था. अब इस का नाम बदल कर केंद्रीय उपोष्ण बागबानी संस्थान हो गया है. केंद्र व राज्यों के खेती, बागबानी व फल प्रसंस्करण के महकमे आम जैसे फलों से तरहतरह के उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग देते हैं. Mango Processing

लिहाजा उन्हें बनाने की तकनीक सीख कर बागबान खुद अपनी इकाई लगा सकते हैं और पुरानी लीक छोड़ कर बागों से कहीं ज्यादा कमा सकते हैं. Mango Processing

Nutri Smart Food : मोटे अनाज से बढ़ेगा रोजगार

Nutri Smart Food: ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का जैसी मोटे अनाज की फसलें आज किसानों को दे रही हैं मोटा मुनाफा, क्योंकि अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इनकी पहचान न्यूट्री-स्मार्ट फूड के तौर पर हो रही है. Nutri Smart Food

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना बना रही आत्मनिर्भर

आज दुनिया-भर के लोग अच्छी सेहत के लिए मिलेट्स यानी मोटे अनाज को अपने भोजन में शामिल कर रहे हैं. जिसके तहत आज मोटे अनाज की प्रोसेसिंग कर अनेक पौष्टिक उत्पाद बनाए जा रहे हैं.

हाल ही में राजस्थान के उदयपुर जिले के डबोक गांव में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत मेवाड़ क्षेत्र की परंपरागत फसलों के प्रसंस्करणों का उत्कृष्टता केंद्र के तहत पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘मेवाड़ क्षेत्र की परंपरागत फसलों का प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन’ का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया. Nutri Smart Food

इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों, ग्रामीण युवाओं और नवोद्यमियों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध परंपरागत फसलों के वैज्ञानिक प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं विपणन से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना रहा.

‘न्यूट्री-स्मार्ट फूड’ के रूप अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिल रही पहचान

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का जैसी मोटे अनाज की फसलें परंपरागत रूप से उगाई जाती रही हैं, किंतु लंबे समय तक इनके सीमित उपयोग के कारण किसानों को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा था, लेकिन अब वर्तमान समय में मोटे अनाज को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘न्यूट्री-स्मार्ट फूड’ के रूप में पहचान मिलने से इनके प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की अपार संभावनाएं उभरकर सामने आ रही हैं. यह बात परियोजना प्रभारी डॉ. कमला महाजनी ने कही.

मोटे अनाज कैसे हैं लाभकारी

मोटे अनाज, हल्दी और अदरक के पोषणात्मक, औषधीय व स्वास्थ्य संबंधी लाभों पर विस्तार से व्याख्यान योगिता पालीवाल द्वारा दिया गया. उन्होंने बताया कि मोटे अनाज फाइबर, आयरन, कैल्शियम और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से भरपूर होते हैं, जो मधुमेह, हृदय रोग और कुपोषण जैसी समस्याओं के समाधान में सहायक हैं. साथ ही, हल्दी और अदरक के प्राकृतिक औषधीय गुणों, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में उनकी भूमिका और घरेलू व औद्योगिक उपयोग की संभावनाओं पर जानकारी दी.

मोटे अनाज के उत्पादों का है बड़ा बाजार

अंकिता पालीवाल ने मोटे अनाज की बढ़ती राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार मांग, उपभोक्ता रुझानों और मूल्य संवर्धन से मिलने वाले अतिरिक्त आर्थिक लाभों की जानकारी दी. प्रतिभागियों को मोटे अनाज आधारित विभिन्न नवाचारात्मक उत्पादों जैसे मल्टीग्रेन आटा मिश्रण, चकली, लड्डू, कुकीज, चॉकलेट, रेडी-टू-कुक मिक्स और रेडी-टू-ईट उत्पादों की विस्तृत जानकारी प्रदान की गई और बताया कि आज मोटे अनाज की प्रोसेसिंग कर इसके अनेक पौष्टिक उत्पाद तैयार हो रहे हैं, जिनकी बड़े पैमाने पर बाजार में मांग है.

इसके साथ-साथ नेहा शेखावत ने उत्पादों की गुणवत्ता, मानकीकरण, लेबलिंग और पैकेजिंग के महत्त्व पर भी चर्चा की गई जो मार्केटिंग बढ़ाने का बड़ा पहलू है.

प्रोसेसिंग तकनीक की मिली जानकारी

5 दिन के प्रशिक्षण आयोजन में प्रतिभागियों को मोटे अनाज, हल्दी और अदरक के प्रसंस्करण की आधुनिक व पारंपरिक तकनीकों से रूबरू कराया गया और हल्दी व अदरक की सफाई, उबालना, ब्लांचिंग, सुखाना, पिसाई, छानना, पैकेजिंग और भंडारण की वैज्ञानिक विधियों के बारे में बताया गया.

इसके अतिरिक्त, मोटे अनाज से बेकरी उत्पाद और पारंपरिक उत्पाद तैयार करने की प्रक्रियाओं का भी चरणबद्ध अभ्यास कराया गया, जिससे प्रतिभागियों को लघु उद्योग स्तर पर उत्पादन कैसे किया जाए, इसकी जानकारी भी मिली.

सरकारी योजनाओं का कैसे लें लाभ

कार्यक्रम के अंतर्गत सरकारी योजनाओं, उद्यमिता विकास और वित्तीय सहायता पर केंद्रित विशेष सत्रों का आयोजन किया गया. इन सत्रों में प्रतिभागियों को खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ी केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं, अनुदान, सब्सिडी, बैंक ऋण,  Nutri Smart Food स्वयं सहायता समूह आधारित उद्यम, स्टार्ट-अप योजनाओं और विपणन सहायता के बारे में नेहा शेखावत द्वारा विस्तार से जानकारी दी गई.

विशेषज्ञों ने यह भी समझाया कि किस प्रकार सीमित पूंजी में छोटे स्तर की प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित कर किसान और महिलाएं स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती हैं.

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों के साथ संवादात्मक सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें उन्होंने अपनी जिज्ञासाएं और व्यावहारिक समस्याएं साझा कीं.

अंकिता पालीवाल द्वारा उनके प्रश्नों का समाधान कर उन्हें व्यावसायिक योजना निर्माण, लागत-लाभ विश्लेषण और बाजार से जुड़ने के व्यावहारिक सुझाव दिए गए. Nutri Smart Food

27 से 31 जनवरी, 2026 तक चलने वाले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम ने प्रतिभागियों को न केवल तकनीकी ज्ञान और कौशल प्रदान किया, बल्कि स्थानीय परंपरागत फसलों के माध्यम से सतत आजीविका सृजन, ग्रामीण रोजगार व उद्यमिता विकास के प्रति जागरूक भी किया. ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण साबित होते हैं.

MPUAT Convocation : रासायनिक उर्वरक व कीटनाशकों पर अंकुश जरूरी

MPUAT Convocation : फसलों में रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग का खामियाजा मौजूदा पीढ़ी तो भुगत रही है लेकिन यही क्रम जारी रहा तो आने वाले समय में प्रदेश का हर आठवां व्यक्ति कैंसर रोगी होगा. यह बात राजस्थान के माननीय राज्यपाल हरिभाऊ बागडे महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के 19वें दीक्षांत समारोह (MPUAT Convocation) के दौरान कहीं. कार्यक्रम में क्या रहा ख़ास, जाने –

अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर भारत

राज्यपाल ने कहा कि- “1980 तक हम अन्य देशों से अनाज आयात करते थे, लेकिन आज भारत की 140 करोड़ की आबादी के बावजूद अनाज के मामले में हम न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अतिरिक्त भंडार भी हमारे पास है. युवा वैज्ञानिक ऐसी किस्में तैयार करें जिनमें प्रोटीन प्रचूर मात्रा में हो. दूध उत्पादन में राजस्थान दूसरे स्थान पर है. हमारे यहां की मिठाइयां विदेशों में जा रही हैं. देसी गाय का दूध ज्यादा गुणकारी है, इसलिए हमें ऐसी देसी नस्लों के पशुओं के संरक्षण पर ध्यान देना होगा.”

उन्होंने कहा कि, दीक्षांत समारोह (MPUAT Convocation) शिक्षा का समापन नहीं बल्कि विद्यार्थी जीवन का नवआरंभ है. छात्राओं को अवसर मिले तो वे हर कार्य को करने में सक्षम है. कुल 44 स्वर्ण पदकों में से 27 पदक छात्राओं ने प्राप्त किए है.

विश्वविद्यालय ने विकसित की हैं किस्में

राज्यपाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि, विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों से 8 पेटेंट हासिल किए हैं और इसी तरह 57 उन्नत कृषि-तकनीक और 5 उन्नत फसल किस्में विकसित की हैं. सरकार का राष्ट्रीय खाद्य तेल तिलहन मिशन 2030-31 तक चलेगा, जिसका मुख्य उद्देश्य तिलहन के उत्पादन को बढ़ाना और भारत को तेल बीजों के मामले में आत्मनिर्भर बनाना है. जैविक एवं प्राकृतिक खेती वर्तमान समय की सब से बड़ी मांग है, इसलिए कृषि विश्वविद्यालयों को इस दिशा में कार्य करना होगा.
आज का भारत स्टार्टअप का भारत है और कृषि स्टार्टअप इसमें तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. छात्र-छात्राओं के लिए एग्री-बिजनेस इन्क्यूबेशन प्रोग्राम. मूल्य संवर्द्धन और फूड प्रोसेसिंग में निवेश के नए अवसर है. सरकार का उद्देश्य है कि आप नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले बनें.

MPUAT Convocation

5 उन्नत फसल किस्मों का लोकार्पण

इस खास मौके पर राज्यपाल ने विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित 5 उन्नत किस्मों- प्रताप मूंगफली-4, प्रताप संकर मक्का-6, प्रताप ज्वार-2510, प्रताप ईसबगोल-1 एवं प्रताप असालिया-1 का लोकार्पण किया गया.

छात्राओं का उत्कृष्ट प्रदर्शन, स्वर्ण पदकों में बढ़त

समारोह (MPUAT Convocation) के दौरान कृषि, इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी, सामुदायिक विज्ञान, डेयरी व खाद्य प्रौद्योगिकी एवं मत्स्य पालन सहित विभिन्न संकायों में कुल 1181 उपाधियां और 44 स्वर्ण पदक प्रदान किए. स्वर्ण पदक लेने में छात्राओं का पलड़ा भारी रहा. स्नातक, निष्णात एवं विद्या वाचस्पति में कुल 17 छात्रों को जबकि 27 छात्राओं को स्वर्ण पदक से नवाजा गया. समारोह (MPUAT Convocation) में कुलाधिपति स्वर्ण पदक विज्ञान निष्णात (सामुदायिक विज्ञान) खाद्य एवं पोषण मुस्कान को दिया गया जबकि इसी वर्ष से आरंभ हुआ कुलगुरु स्वर्ण पदक विज्ञान स्नातक (ऑनर्स) कृषि वत्सला वशिष्ठ को दिया गया. जैन इरिगेशन स्वर्ण पदक प्रौद्योगिकी स्नातक (कृषि अभियांत्रिकी) आदित्य ओझा को, श्री फूल सिंह राठौड़़ मेमोरियल स्वर्ण पदक प्रौद्योगिकी स्नातक (कृषि अभियांत्रिकी) माही गुप्ता, ब्रिगेडियर अनिल अदल खां स्वर्ण पदक दीपांशा कुमावत, किरण कुमावत व लांजेकर प्रणय राजेंद्र को दिया गया.

1181 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान

स्नातक स्तर पर कृषि संकाय में राजस्थान कृषि महाविद्यालय उदयपुर, कृषि महाविद्यालय भीलवाड़ा, आर.एन.टी. कृषि महाविद्यालय कपासन, श्री गोविंद गुरु राजकीय महाविद्यालय बांसवाड़ा एवं कृषि महाविद्यालय डूंगरपुर के 266 छात्र एवं 114 छात्राओं सहित कुल 380 विद्यार्थियों को उपाधियां दी गईं. इसी प्रकार अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संकाय में 384, सामुदायिक विज्ञान संकाय में 67, डेयरी व खाद्य विज्ञान संकाय में 69 व मात्स्यकी विज्ञान संकाय में 34 छात्र-छात्राओं को उपाधियां दी गईं.
इसी प्रकार निष्णात (स्नातकोत्तर) में कृषि संकाय में 108, अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संकाय में 35, सामुदायिक विज्ञान संकाय में 1़9 व डेयरी एवं खाद्य प्रौद्योगिकी संकाय में 9 छात्र-छात्राओं को उपाधियां दी गईं. विद्या वाचस्पति में कृषि संकाय में 49 अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संकाय में 15, गृह विज्ञान संकाय में 7 एवं सामुदायिक विज्ञान संकाय में 5 छात्र-छात्राओं को उपाधियां प्रदान की गईं.

PMFME Scheme : PM सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना से बनें आत्मनिर्भर

PMFME Scheme : अगर आप खेती-किसानी और ग्रामीण परिवेश से जुड़े हैं और आपको है रोजगार की तलाश, तो आपके लिए ‘प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना’ (PMFME Scheme) अनेक रोजगार के अवसर प्रदान करती है. यह योजना छोटे उद्यमियों, किसानों, महिलाओं और युवाओं को तकनीकी, आर्थिक मदद देकर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर प्रदान करती है. किसानों को अब मार्च 2026 तक मिलेगा तकनीकी प्रशिक्षण और 10 लाख अनुदान, जानें आवेदन प्रक्रिया

योजना का क्या है मकसद

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME Scheme) केंद्र सरकार की योजना है. इसका मकसद देश भर की छोटी और मंझली इकाइयों, उद्योगों को तकनीकी और वित्तीय और विपणन सहायता प्रदान करना है. आज अपने उत्पाद को बनाना और फिर उसे बाजार में बेचना एक चुनौती भरा काम है, ऐसे में यह योजना मददगार है. इस योजना का लाभ लेकर अपने उत्पादों की गुणवत्ता को सुधारा जा सकता है, जिससे उसे बाजार में पहचान भी मिलेगी और उसके दाम भी अच्छे मिलेंगे, इसलिए जो लोग पारंपरिक रूप से खाद्य निर्माण में जुड़े हैं लेकिन संसाधनों और सुविधाओं की कमी के कारण वे आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, उन लोगों के लिए यह योजना लाभकारी है.

किसको मिलेगा फायदा

योजना का लाभ व्यक्ति विशेष की इकाइयों के अलावा एफपीओ (FPO), स्वयंसहायता समूह, को-ऑपरेटिव सोसाइटी और एनजीओ को भी परियोजनाओं के लिए 3 करोड़ रुपए तक का अनुदान दिया जाता है. इसके अलावा ब्रांडिंग और मार्केटिंग गतिविधियों पर भी 50 प्रतिशत तक की सहायता प्रदान की जाती है.

तकनीकी प्रशिक्षण से लाभ

केंद्र सरकार ने देश के छोटे और मध्यम स्तर के खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) की शुरुआत वर्ष 2020-21 में की थी, जिसकी अवधि बढ़ाकर 31 मार्च 2026 तक कर दी गई है. यह योजना छोटे कारोबारियों, किसानों, महिला उद्यमियों और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का सुनहरा अवसर बन रही है.

कितना मिलता है अनुदान

खाद्य प्रसंस्करण इकाई लगाने या उसके विस्तार के लिए 35 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाती है, जिसके तहत अधिकतम 10 लाख रुपए तक का अनुदान दिया जा सकता है.

किसे मिलेगा लाभ

-आवेदनकर्ता की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए.

-आवेदक को खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) क्षेत्र में अनुभव होना चाहिए.

कैसे करें आवेदन

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना के तहत आवेदन की प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन है. इसके लिए आवेदक योजना की आधिकारिक वेबसाइट https://pmfme.mofpi.gov.in पर आवेदन कर सकते हैं.

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME Scheme) के तहत महिलाएं और बेरोजगार युवा फूड प्रोसेसिंग में छोटे स्तर पर पापड़, अचार, मसाले, स्नैक्स, मुरब्बे आदि बनाकर अपना खुद का रोजगार शुरू कर सकते हैं. इसके अलावा वे अन्य लोगों को भी रोजगार दे सकते हैं.

Women Farmers : जागरूकता की मिसाल, महिला किसान पुष्पा और मनीषा

Women Farmers : दिल्ली के पूसा संस्थान में किसान मेला लगा था. उस में देशभर के किसान, कृषि वैज्ञानिक, मशीन बनाने वाले और दर्शक आए थे. वहां के एक पांडाल में एक बैनर टंगा था, जिसमें महात्मा गांधी की किसानों को लेकर कही एक बात कुछ यों लिखी थी, ‘हमारे कार्यक्षेत्र में पधारने वालों में कृषक एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है.

वह हम पर निर्भर नहीं, वरन हम उस पर निर्भर हैं. वह हमारे कार्य में बाधक नहीं, अपितु वह हमारे कार्य का उद्देश्य है. वह हमारे कार्यकलापों से असंबंधित नहीं, वरन उसका एक भाग है. उसकी सेवा कर हम अनुग्रह नहीं करते, वरन वह सेवा का अवसर प्रदान कर हम को उपकृत करता है.’

किसानों की तरक्की, समाज की तरक्की

महात्मा गांधी ने यह बात कई साल पहले कही थी और यह उनकी दूर की सोच ही थी कि, भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों की अनदेखी करना समाज की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा है. यह अनदेखी किसानों को भी समझ लेनी चाहिए, क्योंकि आज के दौर में खेती के माने बदल गए हैं.

फसल उगाकर मंडी में बेच देना ही खेती-किसानी नहीं रह गया है, बल्कि अपनी उपज की सही कीमत मिलना भी किसानों के लिए बेहद जरूरी है. अब पूसा संस्थान के उस किसान मेले के एक और पांडाल की बात करते हैं. वहां कुछ औरतें अचार, आर्गेनिक दालें, शहद, कचरी, पापड़ वगैरह बेच रही थीं.

तरक्की करती महिलाएं

पुष्पा कौशिक और मनीषा सिंह जैसी जागरूक और कामयाब महिला किसानों (Women Farmers) ने साबित कर दिया है कि खेती-किसानी महज मर्दों की जागीर नहीं है. अब किसान महिलाएं भी किसी से कम नहीं हैं. जिज्ञासा बढ़ी तो वहां बैठी एक महिला किसान पुष्पा कौशिक से बातचीत की. वे उत्तर प्रदेश के हापुड़ इलाके के लालपुर गांव से आई थीं. उन्होंने अपना एक स्वयं सहायता समूह महिला किसान विकास संस्थान बना रखा है.

दरअसल, एग्री बिजनेस सिस्टम के हिमांशु मंगल पांडे ने उन्हें ऐसे समूह बनाने के लिए सलाह दी थी और इस बात से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने गांव के आसपास के 7 गांवों में 7-7 समूह बनाए,जिनसे 1500 महिला किसान (Women Farmers) जुड़ी हुई हैं.

कैसे कार्य करता है स्वयं सहायता समूह

ऐसे समूहों में औरतों को सिलाई-कढ़ाई की ट्रेनिंग दी जाती है. अचार बनाना, आर्गेनिक दालें उगाना और दलिया वगैरह की प्रोससिंग का काम भी वहां होता है. पुष्पा कौशिक अपने समूह की सचिव हैं. उन्होंने आगे बताया कि, उनके इलाके में सब्जियां खूब उगाई जाती हैं, इसलिए उन्होंने सब्जियों के अचार बनाने की ट्रेनिंग पूसा से ली थी.

इससे उन्हें अपनी मेहनत के दाम काफी अच्छे मिलने लगे थे. उन्हें आज भी पूसा की वरिष्ठ वैज्ञानिक रश्मि सिंह की कही बात याद है कि, थोड़ा सा दिमाग लगाने और सही दिशा में मेहनत करने से किसान अपने सामान की उचित कीमत पा सकते हैं.

कैसे की सब्जियों की प्रोसेसिंग

पुष्पा कौशिक को पहले मंडी में अपनी सब्जियों के दाम कम मिलते थे, लेकिन सब्जियों की ग्रेडिंग करने से अच्छे दाम मिलने लगे. उन्होंने यह भी बताया कि, वे अपनी उपज में रासायनिक खाद नहीं डालती हैं. दालों व दलिया वगैरह की प्रोसेसिंग हाथ की चक्की से की जाती है. मसाले भी इमामदस्ते में कूटे जाते हैं. बिल्कुल घरेलू तरीके से कार्य किया जाता है.

समूह के जरिए अच्छी कमाई

क्या अपने बनाए सामान की मार्केटिंग करने की समस्या नहीं आती है? इस सवाल पर पुष्पा कौशिक ने कहा कि, बिल्कुल आती है. ज्यादातर समूह सामान तो बना लेते हैं, लेकिन उस सामान को उचित कीमत पर बेचने की समस्या तो बनी रहती है. हमें पूसा के बिक्री केंद्र में दुकान मिली हुई है, जहां हमारे समूहों का बनाया सामान अच्छी कीमत पर बिकता है.

मनीषा सिंह ने भी बनाया समूह

जब कचरी व पापड़ बनाने के बारे में जानकारी लेनी चाही, तो पुष्पा कौशिक ने एक और महिला किसान मनीषा सिंह से हमें मिलवाया. वे हापुड़ के नजदीक कुचेसर रोड चोपला गांव से आई थीं. उन्होंने भी एक स्वयं सहायता समूह ‘सोसाइटी फॉर रूरल एंड एग्रीकल्चर डेवलपमेंट’ बनाया हुआ है, जो 3 साल पुरानी संस्था है.

उनके समूह में मूंग दाल, उड़द दाल, चावल, आलू वगैरह से पापड़ व कचरी बनाई जाती है. ऐसा करके महिला किसानों (Women Farmers) को अच्छा मुनाफा होता है और उनकी साथी औरतें इतनी मेहनत व लगन से ये सब चीजें बनाती हैं कि आज तक किसी ग्राहक ने कोई शिकायत नहीं की है.

अपनी संस्था की अध्यक्ष मनीषा सिंह ने आगे बताया कि, वे ज्यादातर चीजें खुद ही उगाती हैं. कुछ सामान बाजार से भी खरीदती हैं. यह सब करने के लिए ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं होती है. बस, अपने काम के प्रति ईमानदार होना चाहिए.

इन दोनों महिला किसानों (Women Farmers) से बातचीत करके यह अनुभव हुआ कि, जागरूकता व तकनीक का सही इस्तेमाल ही तरक्की का रास्ता है. दोनों महिला किसान (Women Farmers) किसी मंझे हुए मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव की तरह बात कर रही थीं. उनका पहनावा भी सलीके वाला था.

मनीषा सिंह के तो पति भी उन के काम में मदद करते हैं, जो एक प्राइवेट कंपनी में सिविल इंजीनियर हैं. इस तरह की महिला किसानों (Women Farmers) के बारे में जानकर यह लगता है कि, अगर किसान सही दिशा में अपना दिमाग लगाएं तो खेती-किसानी से अच्छी कमाई कर सकते हैं.

Bakery Training : निशुल्क प्रवेश, आवेदनपत्र आमंत्रित

Bakery Training : राजकीय सामुदायिक फल संरक्षण एवं प्रशिक्षण केंद्र, बस्ती में रोजगार सृजन योजना के तहत संचालित होने वाले एक मासीय कुकरी (पाककला)/बेकरी प्रशिक्षण (Bakery Training) में प्रवेश हेतु आवेदनपत्र आमंत्रित हैं. यह बेरोजगार लोगों के लिए एक सुनहर मौका है. इस की जानकारी देते हुए खाद्य प्रसंस्करण अधिकारी बस्ती मंडल, बस्ती अमित कुमार ने बताया है कि यह प्रशिक्षण निशुल्क है. प्रशिक्षण हेतु कुल प्रस्तावित 2 कार्यक्रम, प्रशिक्षण अवधि एक मासीय/3 घंटे प्रतिदिन व प्रशिक्षार्थियों की संख्या प्रति कार्यक्रम 30 तथा शैक्षिक योग्यता साक्षर है.

उन्होंने आगे बताया है कि आवेदनपत्र प्राप्त व जमा करने की अंतिम तिथि 10 अक्तूबर, 2025 निर्धारित है. अभ्यर्थी की आयु 1 जुलाई, 2025 को न्यूनतम 18 वर्ष होनी चाहिए. इस में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निर्गत आरक्षण के नियमों का पालन किया जाएगा. आरक्षण लेने वाले अभ्यर्थी को सक्ष्म स्तर से निर्गत प्रमाणपत्र की छायाप्रति प्रस्तुत करनी होगी, प्रशिक्षार्थियो का चयन मैरिट के आधार पर ‘प्रथम आवक प्रथम पावक’ द्वारा किया जाएगा. विलंब से प्राप्त अथवा अपूर्ण भरे आवेदनपत्रों पर विचार नहीं किया जाएगा. आवेदनपत्र कार्यालय से किसी भी कार्य दिवस में प्राप्त किए जा सकते हैं. चयनित अभ्यर्थियों की सूचना 13 अक्तूबर, 2025 को कार्यालय के नोटिस बोर्ड से प्राप्त की जा सकती है. प्रशिक्षण के संबंध मे पूर्ण जानकारी विजय कुमार मोबाइल नंबर-8858058590 व कार्यालय, राजकीय सामुदायिक फलं संरक्षण एवं प्रशिक्षण केंद्र, जेल रोड कंपनी बाग से किसी भी कार्य दिवस में प्राप्त की जा सकती है.

Agricultural Fair : कृषि मेले में पहले दिन ही पहुंचे 72,000 किसान

Agricultural Fair : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में 2 दिन का कृषि आयोजित किया गया. इस कृषि मेले (Agricultural Fair) में पहले दिन तकरीबन 72,000 से अधिक किसानों ने प्रदर्शनी का लाभ लिया.

किसानों ने मेले में उन्नत किस्म के बीजों, कृषि विधियों, सिंचाई यंत्रों, कृषि मशीनरी आदि की जानकारी भी हासिल की और मेले में आगामी रबी फसलों के बीजों के लिए किसानों में भारी उत्साह देखा गया, जहां किसानों ने गेहूं, जौ, सरसों, चना, मेथी, मसूर, बरसीम तथा जई व उन्नत किस्मों के तकरीबन 1 करोड़, 14 लाख रुपए के बीज खरीदे.

मेले में 44,750 रुपए के कृषि साहित्य की बिक्री हुई. सब्जी व बागबानी फसलों के बीजों की 1 लाख, 60 हजार रुपए की बिक्री हुई. किसानों ने मेले (Agricultural Fair) में मिट्टी व पानी जांच सेवा का लाभ उठाते हुए मिट्टी तथा पानी के 246 नमूनों की जांच करवाई. टिश्यू कल्चर तकनीक द्वारा विकसित पौध की बिक्री 22,000 व जैव उर्वरक के टीके की बिक्री 93,000 रुपए की हुई.

Agricultural Fair

किसानों ने विश्वविद्यालय के अनुसंधान फार्म पर वैज्ञानिकों द्वारा उगाई गई फसलें भी देखीं और उन में प्रयोग की गई प्रौद्योगिकी के साथसाथ जैविक खेती के बारे जानकारी हासिल की.

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार में आयोजित इस मेले (Agricultural Fair) में किसानों का जमावड़ा सुबह से ही शुरू हो गया था और देश के अनेक हिस्सों से किसानों ने भाग लिया.

‘फार्म एन फूड’ के प्रतिनिधि ने वहां पहुंच कर अनेक किसानों से बात की. बस्ती, उत्तर प्रदेश से आए प्रगतिशील किसानों की टीम भी वहां मिली जिन में राममूर्ति मिश्रा, अरविंद सिंह, आज्ञाराम वर्मा आदि मौजूद थे. उन्होंने बताया कि में इस मेले में उन्हें बहुत नईनई जानकारियां मिलीं.

मेले (Agricultural Fair) में लगभग 2 दर्जन से अधिक कृषि यंत्र निर्माता अपने अनेक आधुनिक कृषि यंत्रों के साथ पहुंचे हुए थे. इस के अलावा खादबीज, कीटनाशक, फूड प्रोसैसिंग के अलावा पौधशाला वाले भी मौजूद थे.

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने हकृवि में विभिन्न परियोजनाओं का किया उद्घाटन :

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के परिसर में छात्राओं को बेहतर आवासीय सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए नवनिर्मित कल्पना चावला और देवी अहिल्याबाई होल्कर गर्ल्स होस्टल का उद्घाटन किया. इन होस्टलों में 327 छात्राओं के रहने के लिए आधुनिक स्तर की मूलभूत सुविधाएं सुलभ करवाई गई हैं. महिला छात्रावासों के निर्माण पर 14.56 लाख रुपए की धनराशि खर्च की गई है. इन छात्रावासों में डाइनिंग हाल, किचन, स्टोर, रीडिंग रूम, जिम और कौमन हाल आदि का निर्माण किया गया है.

Agricultural Fair

इस के अतिरिक्त मुख्यमंत्री ने दत्तोपंत ठेंगड़ी कृषि उद्यमिता स्थल (मेला ग्राउंड) का भी उद्घाटन किया. ग्रीन ग्रास कारपेट एवं सभी प्रकार की सुविधाओं से सुसज्जित इस मेला ग्राउंड के निर्माण कार्य पर एक करोड़, 10 लाख रुपए की धनराशि खर्च की गई है.

इस अवसर पर जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी एवं लोक निर्माण मंत्री रणबीर गंगवा, नलवा से विधायक रणधीर सिंह पनिहार, हिसार से विधायक सावित्री जिंदल, हांसी से विधायक विनोद भ्याना, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के प्रधान सचिव पंकज अग्रवाल, पूर्व कैबिनेट मंत्री कमल गुप्ता सहित हिसार के मेयर प्रवीण पोपली, भाजपा जिला अध्यक्ष आशा खेदड़ और अशोक सैनी भी उपस्थित रहे.

Mushroom : ढींगरी मशरूम की प्रोसैसिंग कर करें कमाई

Mushroom : मशरूम को अधिकतर ताजा खाना ही लोगों द्वारा पसंद किया जाता है क्योंकि ताजे मशरूम में विशिष्ट खुशबू और गुण अधिक होते हैं, परंतु मशरूम बहुत समय तक रखा नहीं जा सकता है. इसलिए इस को संसाधित भी किया जाता है. इस मशरूम में भी ताजा मशरूम की तरह ही गुण उपलब्ध होते हैं.

मशरूम (Mushroom) को मार्केट में दोनों ही रूपों में बेचा जा सकता है. ताजा मशरूम के बाजार में 100 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम तक मूल्य प्राप्त हो जाता है. यदि उत्पादन अधिक हो और तुरंत भेजना संभव न हो तो मशरूम को धूप में सुखा कर 3 से 4 महीने तक रखा जा सकता है अथवा इस की अन्य खाद्य सामग्री जैसे अचार, चटनी, सूप पाउडर इत्यादि भी बनाए जा सकते हैं और सुविधानुसार मार्केट में बेचा जा सकता है.

ढींगरी मशरूम (Mushroom) को धूप में अथवा बिजली के चलने वाले, सुखाने वाले यंत्रों में सुखाया जा सकता है. धूप में उसे कागज अथवा कपड़े अथवा चादर या किसी एलुमिनियम ट्रे में फैला कर रखा जा सकता है और इस को फर्श पर भी फैला कर रखा जा सकता है किंतु यह साफसुथरा होना चाहिए. साथ ही एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि जब मशरूम को धूप में सुखाएं तो इसे किसी हल्के कपड़े से ढक दें, ताकि इस का रंग धूप के सीधे संपर्क में आने के कारण भद्दा न हो. पूरी तरह से सूखने के बाद ढींगरी मशरूम को पौलीथिन में भर कर अच्छी तरह से सील बंद कर टिन के डब्बों में बंद कर के रख देना चाहिए.

इन सूखी हुई मशरूम (Mushroom) का उपयोग सब्जी के रूप में अथवा अन्य पदार्थों के रूप में किया जा सकता है किंतु प्रयोग करने से पहले इस मशरूम को 30 से 40 मिनट तक ताजा पानी अथवा 10 से 15 मिनट तक कुनकुने पानी में भिगो कर रखा जाता है.

Millets : मिलेट्स की खेती 

Millets : भारत में सांवा कोदो, कुटकी, रागी, मक्का, बाजरा, ज्वार आदि फसलें पुराने समय से ही उगाई जाती रही हैं. आजकल इसे मोटे अनाज, श्री अन्न या मिलेटस् भी कहते है. मोटा अनाज बहुत पोषक और गुणवत्ता के साथ जलवायु के लिए अनुकूल है और कम पानी में पैदा होने वाली प्रमुख फसलें हैं. 20वीं सदी तक अधिकतर क्षेत्रों में इस की खेती अरहर के साथ मिश्रित रुप से की जाती रही है.

हरित क्रांति के दौर में धीरेधीरे मोटे अनाज की खेती के तरफ से लोगों का रूझान कम होने लगा. ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत प्रसिद्ध है पूस का रिन्हा, माघ में खाए. अर्थात लाई पूस माह (15 जनवरी) में बनती थी, जो माघ माह (फरवरी )तक खाई जाती थी. ग्रामीण क्षेत्रों में कहावतें प्रसिद्ध हैं – कहावत है जैसा खाओ अन्न, वैसे रहेगा मन. मडुवा मीन, चीना संग दही. कोदो भात दुध संग लही. सब अंनन में मडुवा राजा, जब जब सेको तब तब ताजा. सब अनन में सांवा जेठ, से बसे धाने के हेठ.

मोटे अनाज में सभी तरह के पोषक तत्व मिलते है, इस के खाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है, क्योंकि इस में ज्यादा उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती, कीटनाशकों का प्रयोग भी नाममात्र का होता था. जब से धान गेहूं का दौर चला, उर्वरक, पेस्टीसाइड का अंधाधुंध प्रयोग होने लगा. जिस कारण तरह तरह की बीमारियां भी मानव और पशुओं में होने लगी. जमीन से केंचुआ और मेंढकों की संख्या कम हो गई, पंक्षियों में चिल ,कौवै, गौरैयां और गिद्धों की संख्या में कमी आई है. अब हमें श्री अन्न की खेती पर ध्यान देना होगा. इस की खेती विशेष कर खरीफ मौसम में की जाती है.

जमीन की तैयारी और बोआई : मोटे अनाज की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट भूमि सही रहती है. भूमि को अच्छी तरह से जोत कर समतल बनाना चाहिए. स्वस्थ और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना चाहिए. बीजों को बोआई से पहले उपचारित करना चाहिए ताकि, रोगों और कीटों से बचाव हो सके.

फसल प्रबंधन : उचित मात्रा में खाद और उर्वरकों का उपयोग, समयसमय पर निराईगुड़ाई, और सिंचाई महत्वपूर्ण हैं. श्री अन्न की फसलें ज्यादातर कम पानी में भी अच्छी होती हैं, लेकिन सूखे के समय सिंचाई की आवश्यकता होती है. यह पर्यावरण के अनुकूल फसलें हैं जिन्हें कम पानी और कम उर्वरकों में भी उगाया जा सकता है. मोटे अनाज की खेती में उत्पादन लागत कम लगती है और यह किसानों के लिए आर्थिक दृष्टि से लाभकारी फसलें हैं.

हालांकि, आजकल मोटे अनाज की काफी मांग है फिर भी किसानों को उन की उपज के लिए उचित बाजार उपलब्ध नहीं हैं और उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता. जिस से अनेक किसान चाह कर भी इस की खेती बड़े पैमाने पर नहीं कर रहे हैं.

प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी : इन अनाजों के प्रसंस्करण के लिए आधुनिक सुविधाओं की कमी है. इस के लिए प्रसंस्करण यंत्रों की जरूरत है. जो किसानों की पहुंच में नहीं हैं. भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं और सब्सिडी प्रदान कर रही हैं. किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों के बारे में प्रशिक्षण दिया जा रहा है और विपणन सुविधाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है. फिर भी अभी अनेकों किसानों तक इन सब की पहुंच नहीं है.

पशुओं के लिए लाभकारी : मोटे अनाज का सेवन इंसानों के अलावा पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी है क्योंकि इस में उच्च मात्रा में फाइबर, प्रोटीन और विटामिन होते हैं. आमतौर पर किसानों का रुझान मुख्य रूप से अपनी दैनिक जरूरतों और पशु चारे के लिए ही मोटे अनाज को उगाने की ओर होता है. इस के विपरीत, अगर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर श्री अन्न की खरीद सुनिश्चित करें तो इस का रकबा बढ़ सकता है.

बनाए जा रहे हैं विभिन्न व्यंजन : मोटे अनाज से रोटी, चावल, खीर, पूड़ी, बिस्किट, मिठाई, कौर्न फलेक्स, दलिया, नमकीन, टिक्की, मटरी, केक आदि विभिन्न व्यंजन बनाएं जा रहे हैं जो स्वादिष्ट होने के साथसाथ सेहत के लिए भी लाभदायक है. जो लोग मोटे अनाज की प्रोसैसिंग कर रहे हैं, वह अतिरिक्त कमाई भी कर रहे हैं.