Sunflower: सूरजमुखी एक प्रमुख तिलहनी फसल है, जो किसानों को कम अवधि में अधिक लाभ प्रदान करने की क्षमता रखती है. इस का तेल पौष्टिक, हलका और उच्च बाजार मांग वाला होता है। सूरजमुखी तेल अपने हलके रंग, ब्लैंड फ्लेवर, उच्च स्मोक पौइंट और अधिक मात्रा में उपस्थित लिनोलेइक एसिड के कारण लोकप्रिय है, जो हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है.
सूरजमुखी के बीज में औसतन 48–53 फीसदी खाद्य तेल पाया जाता है. भारत में 1969–70 के दौरान खाद्य तेल की कमी के बाद इस फसल का विस्तार तेजी से हुआ. तिलहनी फसलों के अंतर्गत सूरजमुखी (Sunflower) का विशेष स्थान है. देश में मूंगफली, सरसों, तोरिया और सोयाबीन के बाद यह एक महत्त्वपूर्ण तिलहनी फसल के रूप में स्थापित है. सूरजमुखी की खेती खरीफ, रबी और जायद, तीनों मौसमों में की जा सकती है, पर जायद मौसम इस की खेती के लिए सर्वाधिक अनुकूल माना जाता है. खरीफ मौसम में कीट एवं रोगों का प्रकोप अधिक होने के कारण पुष्प आकार छोटा रह जाता है और दानों का भराव कम होता है. इस के विपरीत जायद मौसम शुष्क एवं अनुकूल होता है, जिस से पौधे स्वस्थ रहते हैं और उपज अधिक प्राप्त होती है.
सूरजमुखी की किस्में
सूरजमुखी (Sunflower) को मुख्यत: 2 प्रजातियों में बांटा गया है :
संकुल प्रजाति जैसे सूर्या, ज्वालामुखी, मौडर्न, एमएसएफ एच 4.
संकर प्रजाति जैसे केवीएसएच 1, एसएच-3322,एफएसएच-17, कावेरी 618.
इन प्रजातियों में एफएसएच-17 और केवीएसएच 1, विशेष रूप से जायद के लिए उत्तम हैं क्योंकि ये गरमी सहन करने में सक्षम हैं और तेल की मात्रा अधिक देते हैं. सूरजमुखी ए(Sunflower) क ऐसी फसल है जो सामान्य सिंचित भूमि में अच्छे परिणाम देती है. यह खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसमों में बोआई की जा सकती है. फसल पकने के समय शुष्क और गरम जलवायु आवश्यक होती है. औसतन 90 से 110 दिन में फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है.

खेत की तैयारी
सूरजमुखी (Sunflower) की फसल के लिए खेत की तैयारी बहुत जरूरी है. यदि खेत में नमी कम है तो पहले पलेवा करें (हलकी सिंचाई). इस के बाद एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें, फिर 2–3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करें. मिट्टी को भुरभुरी बना लें ताकि नमी सुरक्षित रह सके. दोमट मिट्टी सूरजमुखी (Sunflower) की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है. बहुत अधिक अम्लीय या क्षारीय मिट्टी से बचना चाहिए. यदि खेत में पानी का उचित निकास हो और मिट्टी भुरभुरी हो, तो सूरजमुखी के पौधे तेजी से विकसित होते हैं.
बोआई का समय
खरीफ के मौसम में इस फसल की बोआई 15-25 जुलाई तक, रबी के मौसम में 20 अक्तूबर से 10 नवंबर तक तथा जायद की फसल की बोआई 20 फरवरी से 10 मार्च तक की जाती है. ग्रीष्मकालीन सूरजमुखी (Sunflower) की वैज्ञानिक खेती के लिए सही समय (अप्रैल से मध्य जुलाई), दोमट मिट्टी, पर्याप्त धूप और सिंचाई (फूल आने के समय विशेष ध्यान) जरूरी है. जायद मौसम में फरवरी का दूसरा पखवारा बोआई के लिए सब से अच्छा समय है. इस समय बोई गई फसल मई के अंत या जून के पहले सप्ताह तक पक जाती है. देरी से बोआई करने पर बरसात शुरू हो जाती है और दाने खराब हो जाते हैं. बोआई 4–5 सैंटीमीटर गहराई पर करें. लाइन से लाइन दूरी 45 सेंटीमीटर, पौधे से पौधे की दूरी 15–20 सैंटीमीटर रखें.
बीज की मात्रा
सूरजमुखी की बोआई के लिए 2-3 किलोग्राम प्रति एकड़ की बीज दर का प्रयोग करें. हाईब्रिड उपयोग के लिए बीज दर 2-2.5 किलोग्राम प्रति एकड़.
बीजोपचार
शीघ्र अंकुरण के लिए बोआई से पहले, 24 घंटे के लिए पानी में बीज भिगोएं और छाया में सुखाएं. फिर बीज को थीरम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें. यह मृदाजनित कीट और बीमारी से बीजों की रक्षा करेगा. फसल को दलदली फफूंदी से बचाने के लिए बीजों को धातुक्षय 6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित करें. बीज को इमिडाक्लोप्रिड 5-6 मिलीलिटर प्रति किलो बीज से उपचारित करें.
उर्वरकों का प्रयोग और मात्रा
मृदा परीक्षण के आधार पर खाद डालना सब से उचित रहता है, फिर भी सामान्य रूप से नाइट्रोजन 80 किलो प्रति हेक्टेयर, फास्फोरस 60 किलो प्रति हेक्टेयर, पोटाश 40 किलो प्रति हेक्टेयर दिया जा सकता है.
पंक्ति से पंक्ति की दूरी
2 पंक्तियों में 60 सैंटीमीटर और 2 पौधों के बीच में 30 सैंटीमीटर की दूरी रखें.
बीज की गहराई
सूरजमुखी की फसल में बीजों को 4-5 सैंटीमीटर की गहराई पर बोएं.
बोआई की विधि
बोआई गड्ढा खोद कर की जाती है. इस के इलावा बीजों को बोआई वाली मशीन से बैड बना कर या मेंड़ बना कर की जाती है.
खाद देने की विधि
नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय डालें. शेष नाइट्रोजन 25–30 दिन बाद टौपड्रैसिंग करें. यदि फसल आलू के बाद ली जा रही है तो 20–25 फीसदी उर्वरक कम करें. साथ ही, 250–300 क्विंटल सड़ी गोबर खाद डालना लाभदायक रहता है.
सिंचाई प्रबंधन
सूरजमुखी की फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई एवं निराईगुड़ाई करें और पौधों पर मिट्टी चढ़ाएं. जायद में बोई गई सूरजमुखी की फसल में 3 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है. पहली सिंचाई बोआई के 30-35 दिनों बाद करें. इस के बाद हर 10–15 दिन पर हलकी सिंचाई करें. इसी अवस्था में नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा का उपयोग करें. द्वितीय सिंचाई 20-25 दिनों बाद फूल आने की अवस्था में करें एवं अंतिम सिंचाई बीज बनने की अवस्था में करें. ध्यान रखें कि गहरी सिंचाई से पौधे गिर सकते हैं.
निराई व गुड़ाई
पहली निराई पहली सिंचाई के बाद (20–25 दिन पर) करें. हम निराई व गुड़ाई रोटरी वीडर से कर सकते हैं, अगर फसल मशीन से बोआई की गई है या मैन्युअल खुरपी या कुदाल से कर सकते हैं. इस से पौधों को हवा मिलती है और खरपतवार नियंत्रित रहते हैं.
फूल आने का समय
फूल आने के समय मधुमक्खियां प्राकृतिक रूप से बहुत सक्रिय होती हैं व परागण में बहुत सहायक होती हैं. इस से पूरे फल में दाना भरता है व पैदावार में वृद्धि और बीजों से अधिक तेल प्राप्त होता है.
परिषेचन की क्रिया
सूरजमुखी में परागण बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि बीज बनने के लिए यह आवश्यक है. प्राकृतिक परागण भंवरों, मधुमक्खियों और हवा से होता है. यदि खेत में परागण कम हो तो किसान खुद भी कर सकते हैं. सुबह 7–8 बजे के बीच हाथ में दस्ताने या रोएंदार कपड़ा ले कर फूलों पर धीरेधीरे फेरें. इस से परागण अच्छी तरह होगा और पैदावार बढ़ेगी.
फसल सुरक्षा कीट एवं रोग नियंत्रण
सूरजमुखी में प्रमुख कीट हैं दीमक, हरे फुदके और डस्की बग. इन के नियंत्रण के उपाय में मिथाइल ओडिमेंटान (1 लिटर 25 ईसी) या फेन्बलारेट (750 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर) को 800–1000 लिटर पानी में घोल कर छिड़कें. साथ ही, फसल की निगरानी नियमित करें और रोगग्रस्त पौधों को हटा दें.
कटाई और मड़ाई का सही समय
जब सूरजमुखी के बीज कठोर और भूरे रंग के हो जाएं तो फसल कटाई के लिए तैयार है. फूलों को काट कर छाया में सुखाएं, ढेर में न रखें. सूखने के बाद डंडे से पिटाई या थ्रैशर मशीन से बीज निकालें.
फसलचक्र
किसानों को हम हर बार जानकारी देते हैं कि फसलचक्र अपनाना बहुत जरूरी होता है. एक बार कम जड़ वाली फसल दूसरी बार ज्यादा गहरी जड़ वाली फसलो की बोआई करनी चाहिए. साथ ही सूरजमुखी की फसल के बाद गेहूं, चना या सब्जियां ली जा सकती हैं.
भंडारण की विधि
बीज को अच्छी तरह सुखा कर 8–10 फीसदी नमी तक रखें. अधिक नमी से बीज खराब हो सकते हैं. तेल निकालने का कार्य 3 महीने के भीतर कर लेना चाहिए ताकि तेल में कड़वाहट न आए. बीज को सूखी, हवादार और सुरक्षित स्थान पर रखें.
सूरजमुखी की औसत पैदावार
सामान्य प्रजातियां 12–15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर. संकर प्रजातियां 20–25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज देती है.
सूरजमुखी की खेती में खर्च प्रति हेक्टेयर लगभग 20,000 रुपए से 25,000 रुपए तक खर्च आता है, जबकि पैदावार से 60,000 रुपए से 80,000 रुपए तक की आय संभव है.





