Green Manure: इस बात में शक की जरा सी भी गुंजाइश नहीं है कि हरी खाद (Green Manure) खेती के लिए अमृत का काम करती है. अगर किसान इसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें तो फसलें बेहतरीन नतीजा देंगी और खाने वाले की सेहत शानदार हो जाएगी. लिहाजा यह जरूरी है कि हम कुदरती चीजों की हिफाजत करते हुए खेती करें तथा भूमि की जैविक कूवत बनाए रखें. इसके लिए हमारे खेतों में पर्याप्त मात्रा में कार्बनिक जैवांश का होना बहुत जरूरी है. इसके लिए हरी खाद (Green Manure) का इस्तेमाल बेहद कारगर है.
हरी खाद के प्रमुख फायदे
• हरी खाद के इस्तेमाल से खरपतवार कम होते हैं तथा मिट्टी का कटाव रुकता है.
• हरी खाद से मिट्टी की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशाओं में माकूल असर पड़ने के साथ-साथ मिट्टी की भौतिक संरचना में भी सुधार होता है.
• हरी खाद के इस्तेमाल से पोषक तत्त्वों की मात्रा व उपलब्धता में इजाफा होता है.
• नीचे की मिट्टी के तत्त्व हरी खाद की गहरी जड़ों द्वारा ऊपर पत्तियों में आ जाते हैं तथा अगली फसल को मिल जाते हैं.
• यह कम समय में तैयार होने वाली सस्ती खाद है.
• इससे ऊसर सुधार में भी मदद मिलती है.
हरी खाद की प्रमुख फसलें
• खरीफ की दलहनी फसलें जैसे- ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग, उड़द, ग्वार वगैरह.
• खरीफ की अदलहनी फसलें जैसे- मक्का, ज्वार, बाजरा, घास वगैरह.
• रबी की दलहनी फसलें जैसे- मेथी, मटर, बरसीम, सैंजी, मसूर वगैरह.
• रबी की अदलहनी फसलें जैसे- सरसों, राई, शलजम, मूली, सूरजमुखी, जई वगैरह.
खरीफ और रबी में हरी खाद बोने का सही समय
खरीफ मौसम में हरी खादें बोने का समय मई-जून है. इसकी पलटाई फसल के 50-60 दिनों की होने पर मुख्य फसल की बोआई से करीब 15-20 दिन पहले की जाती है. रबी मौसम में हरी खाद की बोआई के लिए अक्तूबर महीने का पहला पखवाड़ा सही रहता है. हरी खाद को खेतों में दबाने और अगली फसल बोने के बीच में इतना अंतर होना चाहिए कि, हरी खाद से प्राप्त पोषक तत्त्व प्रति हेक्टेयर अधिक से अधिक मिट्टी में मिल जाएं.
हरी खाद के लिए उपयुक्त जलवायु
खरीफ में हरी खाद वाली फसलों के लिए गरम व नम जलवायु ठीक होती है. ऐसी जलवायु में हरी खाद की फसलें सफलता पूर्वक उगाई जा सकती हैं. ज्यादा बारिश वाले क्षेत्रों में हरी खाद की फसलों की बढ़वार अधिकतम होती है.
हरी खाद में खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
हरी खाद वाली दलहनी फसलें खुद ही जड़ों द्वारा वातावरण से वायु मंडलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करती हैं, परंतु पौधों की वृद्धि की प्रारंभिक दशाओं में जब तक कि पौधों की जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु सक्रिय नहीं होता तब तक पौधों को अतिरिक्त नाइट्रोजन की जरूरत होती है. इसके लिए 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन बोआई के समय देना चाहिए.
हरी खाद को खेत में पलटने की सही अवस्था
हरी खाद को खेत में पलटना उस समय ज्यादा लाभदायक होता है, जिस समय फसल से अधिकतम हरा पदार्थ प्राप्त हो सके. यह पुष्पन से ठीक पहले की अवस्था होती है, जब पुष्पन शुरू होने वाला होता है और पत्तियां व टहनियां कोमल, लचीली, बिना रेशेवाली और ज्यादा पत्तियों वाली होती हैं.
फसल पलटने के लिए हरी खाद की खड़ी फसल को पाटा या हरी खाद टेंपलर चलाकर खेत में गिरा देते हैं. उसके बाद 20 किलोग्राम यूरिया या 400-500 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़क देते हैं और खेत में पानी भर देते हैं.
हरी खाद का अपघटन कैसे होता है?
हरी खाद से प्राप्त हरे पदार्थ का अपघटन छोटे जीवाणुओं द्वारा होता है. ये जीवाणु पहले हरे पदार्थों को सड़ाकर अमोनीकरण करते हैं और अंत में उपलब्ध अवस्था (नाइट्रोजन) में बदल देते हैं. अगर पलटाई के समय कम नमी हो तो पूरा अपघटन नहीं होता और अधिक पानी होने पर पोषक तत्त्व नीचे चले जाते हैं. इसके अलावा अपघटन के लिए जीवाणुओं को अतिरिक्त ऊर्जा देने के लिए यूरिया (20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) देना चाहिए, इससे अपघटन तेजी से होता है.
हरी खाद को पलटने व मुख्य फसल लगाने के बीच कम से कम 15-20 दिनों का अंतर होना चाहिए, ताकि सूक्ष्म जीवाणुओं को हरी फसल के अपघटन, अमोनीकरण और नाइट्रीकरण का समय मिल सके.





