Natural Farming: प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा जैविक खेती पर 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन 3 जनवरी से 23 जनवरी, 2026 तक किया जा रहा है.
प्राकृतिक खेती के लिए यह कदम हैं जरूरी
#उर्वरकों के प्रयोग को 25 प्रतिशत तथा पानी के उपयोग को 20 प्रतिशत तक कम करना होगा.
#नवीनीकरण ऊर्जा के उपयोग में 50 प्रतिशत वृद्धि तथा ग्रीन हाऊस उत्सर्जन को 45 प्रतिशत कम करना.
#करीब 26 मिलियन हैक्टेयर भूमि सुधार करना हमारे देश की आवश्यकता है.
#नई तकनीकों को किसानों तक पहुंचाना जरूरी.
इसके लिए प्राकृतिक खेती (Natural Farming) विषय को देश के कृषि पाठ्यक्रम में चलाने के साथ-साथ नई तकनीकों को आमजन और किसान तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है. वर्तमान काल में देश के कृषि वैज्ञानिकों के सामने यह एक मुख्य चुनौती है.
प्राकृतिक खेती आज की आवश्यकता
प्राकृतिक खेती (Natural Farming) आज की अंतर्राष्ट्रीय/विश्व स्तरीय जरूरत है और आज आज के किसानों की और समय की प्राथमिकता है. प्राकृतिक खेती पर अनुसंधान पिछले 5 वर्षों से किया जा रहा है. जापान में प्राकृतिक खेती प्राचीन समय से चल रही है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली पूरे भारत में स्नातक स्तर पर पाठ्यक्रम शुरू कर चुकी है.
डॉ. एस. के. शर्मा ने कहा कि 21वीं सदीं में सभी को सुरक्षित एवं पोषण मुक्त खाद्य की आवश्यकता है अतः प्रकृति तथा पारिस्थितिक कारकों के कृषि में समावेश करके ही पूरे कृषि तंत्र का ‘शुद्ध कृषि’ की तरफ बढ़ाया जा सकता है.
कम लागत में खाद्य-पोषण सुरक्षा को बढ़ावा
भारतीय परंपरागत कृषि पद्धति योजना के तहत देश में प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को बढ़ावा दिया जा रहा है. इससे कम लागत के साथ-साथ खाद्य-पोषण सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा. जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों के तहत खेती को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्राकृतिक खेती के घटकों को आधुनिक खेती में समावेश करना आवश्यक है.
डॉ. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान ने कहा कि :
#प्राकृतिक खेती से मृदा स्वास्थ्य को सुधारा जा सकता है.
#प्राकृतिक खेती के द्वारा लाभदायक कीटों को बढ़ावा मिलता है.
#जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक खेती द्वारा प्राकृतिक संसाधन का संरक्षण एवं पारिस्थितिक संतुलन को बढ़ावा मिलता है.
डॉ. अरविन्द वर्मा ने बताया इन कारणों से बढ़ रहा खतरा :
#पूरेे विश्व में ‘संसाधन खतरे’ (रिसोर्ज डेंजर) खासतौर पर मिट्टी की गुणवत्ता में कमी, पानी का घटता स्तर, जैव विविधता का घटता स्तर, हवा की बिगड़ती गुणवत्ता तथा पर्यावरण में बिगड़ता गुणवत्ता संतुलन के कारण हरित कृषि तकनीकों के प्रभाव टिकाऊ नहीं रहे हैं.
#बदलते जलवायु परिवर्तन के परिवेश एवं पारिस्थितिकी संतुलन के बिगड़ने से मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य तथा बढ़ती लागत को प्रभावित कर रहे हैं और अब वैज्ञानिक तथ्यों से यह स्पष्ट है कि भूमि की जैव क्षमता से अधिक शोषण करने से एवं केवल आधुनिक तकनीकों से खाद्य सुरक्षा एवं पोषण सुरक्षा नहीं प्राप्त की जा सकती है
लिहाजा, किसानों का मार्केट आधारित आदानों पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ स्थानीय संसाधनों का सामूहिक संसाधनों के प्रबंधन के साथ प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना चाहिए.
इस के अलावा आज खेती में बढ़ते रसायन के प्रयोग से खेती की मिट्टी में सुधर और स्वस्थ वातावरण के लिए प्राकर्तिक खेती अपनाना जरूरी है.





