Soil: भारत की अधिकांश कृषि भूमि में आज ‘मृदा कार्बन’ की कमी है. यह आपकी फसल की पैदावार, आपकी लागत और आने वाली पीढ़ियों की रोटी का सवाल है. अगर आप एक किसान हैं या कृषि से जुड़े हैं, तो यह लेख आपके लिए है. पूरा पढ़िए, क्योंकि इसमें छिपा है आपके खेत की सेहत और मोटी कमाई का राज.
हमारी मिट्टी : वह चुपचाप मर रही है
हमारे बुजुर्ग कहते थे, ‘मिट्टी सोना उगलती है.’ लेकिन आज? आज हमने उस सोने को ही लूट लिया है. लगातार रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग और फसल अवशेष जलाने ने हमारी मिट्टी (Soil) को ‘जैविक रेगिस्तान’ में तब्दील कर दिया है. मिट्टी में कार्बन वह ताकत है जो उसे भुरभुरा बनाती है, पानी सोखकर रखती है और पोषक तत्वों का भंडार होती है. राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो यह ताकत घटकर औसतन 0.54 फीसदी रह गई है, जबकि स्वस्थ मिट्टी के लिए यह कम से कम 1.5 फीसदी होना चाहिए.
मिट्टी में जीवन ही नहीं बचा तो फसल कैसे पनपेगी- रामगोपाल पटेल, प्राकृतिक खेती मास्टर प्रशिक्षक.
समस्या की जड़ यह है कि हम मिट्टी (Soil) को एक ‘निर्जीव माध्यम’ समझ बैठे हैं. हम उसे केवल यूरिया और डीएपी की खुराक देते हैं, उसका पोषण नहीं करते. प्राकृतिक खेती के सिद्धांत सीधे हैं कि जो लो, वह लौटाओ. घनामृत और जीवामृत जैसी जीवाणु खाद मिट्टी में वे सूक्ष्मजीव पैदा करती हैं जो कार्बन को बांधते हैं. मल्चिंग और बहु-फसली खेती इस काम को और आसान बना देती हैं.
पंजाब की कहानी : एक चेतावनी
पंजाब, जिसने देश को अन्न से भरा, आज खुद सबसे बड़े संकट में है. हरित क्रांति के बाद के दशकों में धान की लगातार खेती ने मिट्टी (Soil) को खराब कर दिया।.राज्य की 82 फीसदी से अधिक भूमि में कार्बन की कमी दर्ज की गई है. मिट्टी इतनी सख्त हो गई है कि किसानों को खुदाई के लिए जेसीबी तक मंगवानी पड़ती है. पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता, जड़ें नहीं फैल पातीं. नतीजा? पैदावार ठहर गई है, चाहे जितना भी यूरिया डाल लो.
उत्तर प्रदेश : आईना दिखाते आंकड़े
उत्तर प्रदेश की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है. डॉ. संदीप उपाध्याय, मृदा वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, गोरखपुर बताते हैं, ‘हमारे प्रयोगों से पता चला है कि शून्य जुताई (जीरो टिलेज) और फसल अवशेषों को ढक कर रखने (मल्चिंग) से 3-5 साल में कार्बन स्तर में 0.3 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है. यह छोटा आंकड़ा नहीं है. इससे मिट्टी (Soil) की जल धारण क्षमता 20-25 फीसदी बढ़ जाती है यानी सिंचाई की लागत कम. किसान भाई पहले अपना मृदा स्वास्थ्य कार्ड जरूर देखें, फिर उसके अनुसार हरी खाद के लिए दलहनी फसलों का चुनाव करें.’
पराली जलाना बंद करें. यह सबसे पहला कदम है.
हैप्पी सीडर से बोआई करें. गेहूं की बोआई धान की पराली के बीच कर दें.
मल्च बनाएं. पराली को बिछा दें, यह खरपतवार रोकेगी और नमी बनाए रखेगी.
-देशी जुगाड़. यदि हैप्पी सीडर नहीं है, तो एक साधारण सी रस्सी से भी पराली को इकट्ठा करके कतार में डाला जा सकता है.
-हरी खाद को अपनाएं. दो मुख्य फसलों के बीच 45-60 दिनों के लिए ढैंचा, सनई या मूंग उगाएं, फिर इसे हल चलाकर मिट्टी में मिला दें. यह नाइट्रोजन देगा और भरपूर हरा कार्बन भी.
-जुताई का जुनून छोड़ें. शून्य या कम जुताई तकनीक को अपनाएं. शुरुआत में थोड़ी मुश्किल लगेगी, लेकिन लाभ दीर्घकालिक होगा.
-जैविक खाद बनाना सीखें. गोबर को सीधे न डालें. उससे वर्मीकंपोस्ट या गोबर की सड़ी खाद बनाएं. एक एकड़ के लिए सालाना कम से कम 4-5 टन जैविक खाद डालने का लक्ष्य रखें.
कैसे करें नई कृषि क्रांति की शुरुआत
पहला साल : प्रतिबद्धता का साल
-लक्ष्य. या तो पराली न जलाएं या एक एकड़ में हरी खाद के लिए ढैंचा बो दें. सबसे छोटे से शुरू करके देखें. इस साल आपका उद्देश्य उपज बढ़ाना नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत को ठीक करना है.
दूसरा और तीसरा साल : परिवर्तन का साल.
-लक्ष्य. आप देखेंगे कि जहां मल्च बिछा है, वहां नमी ज्यादा दिन टिकी रहती है. जहां हरी खाद दबाई है, वहां की मिट्टी थोड़ी भुरभुरी हुई है. अब जैविक खाद का प्रयोग बढ़ाएं और रासायनिक उर्वरकों की मात्रा धीरे-धीरे 10-20 फीसदी कम करने का प्रयास करें.
चौथा और पांचवां साल : फलने का साल
-लक्ष्य. अब लाभ दिखाई देने लगेगा. सिंचाई के चक्र में फर्क नजर आएगा, कीट-रोग का प्रकोप कम होगा और उपज का स्तर पहले जैसा या बेहतर होने लगेगा. सबसे बड़ी बात, लागत कम होने से शुद्ध आय बढ़नी शुरू हो जाएगी.
आज से 3 काम करें
-संकल्प लें. अगली फसल की कटाई के बाद ‘एक भी पराली नहीं जलाऊंगा’.
-जानकारी जुटाएं. अपने नजदीकी मृदा जांच केंद्र (KVK) जाएं और अपने खेत का मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनवाएं. जानें कि आपकी मिट्टी को किस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है.
-संगठित हों. अपने गांव के 4-5 प्रगतिशील किसानों के साथ मिलकर एक ‘प्राकृतिक खेती समूह’ बनाएं. अनुभव बांटें, समस्याओं पर चर्चा करें और साथ मिलकर जैविक खाद बनाएं.





