Livestock Farming: भेड़-बकरी पालन की उन्नत तकनीकों से पशुपालकों सीख

Livestock Farming : किसान-वैज्ञानिक संगोष्ठी का उद्देश्य पशुपालकों को नवीन वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़ना हैं. इस कार्यक्रम में पशुपालकों (Livestock Farming) को भेड़, बकरी और खरगोश पालन से जुड़ी कम लागत में अधिक उत्पादन, नस्ल चयन, स्वास्थ्य प्रबंधन और विपणन से जुड़ी उपयोगी जानकारियां दी गईं. भाकृअनुप-केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (CSWRI), अविकानगर ने विगत दिनों अपना 65वां स्थापना दिवस मनाया.

बकरी पालन से आय बढ़ाने पर विशेषज्ञों का जोर

मुख्य अतिथि डॉ. एम. के. चेटली ने बकरी पालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताया और पशुपालकों (Livestock Farming) को मथुरा में आयोजित बकरी मेले में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया. उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तरीके अपनाकर पशुपालक अपनी आय कई गुना बढ़ा सकते हैं.

छोटे पशु पालन: चलता-फिरता एटीएम

डॉ. एम. के. चेटली ने वर्तमान समय मे संस्थानों एवं किसानों के जुड़ाव को मजबूत करने के लिए इस तरह के कार्यक्रम को जरूरी बताया. इसके अलावा विशिष्ट अतिथि डॉ. अनिल पुनिया एवं डॉ. विजयवीर सिंह ने किसानों द्वारा अधिकतम उत्पादन के लिए दोनों संस्थानों की आवश्यक वैज्ञानिक पद्धति अपनाने के लिए पशुपालकों (Livestock Farming) को कहा.

डॉ. अरुण कुमार तोमर ने बताया कि संस्थान राजस्थान के विभिन्न जिलों (टोंक, प्रतापगढ़, सिरोही, दौसा, बीकानेर, उदयपुर, बाड़मेर एवं अन्य जिले) एवं हिमाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों के किसानो के लिए वैज्ञानिक पशुपालन प्रशिक्षण देता रहा है. उन्होंने कहा कि लोगो में अब छोटे पशु भेड़-बकरी एवं खरगोश पालन के प्रति रुझान बढ़ रहा है. छोटा पशु एक चलता फिरता एटीएम तथा किसी भी परिस्थिति मे पालन किया जाने वाले पशु है. उन्होंने संस्थान की अविशान को देश में मांस की मांग को पुरे करने मे अच्छा नस्ल बताया .

उन्नत नस्लों और तकनीकों की प्रदर्शनी
कार्यक्रम में सिरोही बकरी, भेड़ की उन्नत नस्लों और खरगोश पालन की प्रदर्शनी लगाई गई. इससे पशुपालकों को नस्ल सुधार, उत्पादन क्षमता और बाजार मांग की प्रत्यक्ष जानकारी मिली.

पशुपालकों का सम्मान और प्रश्न-उत्तर सत्र
स्थापना दिवस पर चयनित पशुपालकों (Livestock Farming) को सम्मानित किया गया. साथ ही प्रश्न-उत्तर सत्र में पशुपालकों की समस्याओं का समाधान कर उन्हें व्यावहारिक सुझाव दिए गए. अतिथियों द्वारा पशु स्वास्थ्य कैलेंडर, भेड़-बकरी पालन पुस्तिकाएं और संस्थान की तकनीकी उपलब्धियों से जुड़े फोल्डर का विमोचन किया गया, जिससे पशुपालकों को घर बैठे मार्गदर्शन मिलेगा.

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ एम. के. चेटली, निदेशक, केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मथुरा तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. अनिल पुनिया, निदेशक, राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र, बीकानेर एवं डॉ. विजय वीर सिंह, निदेशक, भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान, भरतपुर, उपस्थित रहे.

Goat Farming: बकरी पालन योजना में लागत कम, कमाई हरदम

Goat Farming: बकरी पालन एक ऐसा रोजगार है, जिसमें लागत लगती है कम और मुनाफा मिलता है ज्यादा. इस काम में अगर सरकारी योजना का लाभ मिले, तो सोने पे सुहागा वाली कहावत सार्थक होती है. आइए जानते हैं इस योजना की खासियत और कौन-कौन उठा सकता है इस बकरी पालन योजना का लाभ-

क्या है बकरी पालन योजना

गांव-देहात में मंझले और छोटे किसानों के लिए बकरी पालन (Goat Farming) हमेशा से कमाई का मजबूत जरिया रहा है. बकरी पालन कम खर्चीला, कम देखभाल और जल्दी लाभ देने वाला काम है.

अनेक किसान परिवार खेती के साथ-साथ बकरी पालन करके अतिरिक्त मुनाफा कमाते हैं, क्योंकि बकरी पालन में कोई खास देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती. कम जगह में भी बकरियां अच्छी आमदनी देती हैं और अब सरकार की बकरी पालन योजना का लाभ लेकर किसान वर्ग इसे अपना रोजगार या कमाई का जरिया बना सकता है.

बकरी पालन से मनमाफिक कमाई

बकरी पालन (Goat Farming) का कारोबार उसके दूध, मांस के लिए किया जाता है. अगर पशु मादा है तो वह लगातार आप के पशुधन में बढ़ोत्तरी करेगा और नर पशु होने पर उसके मांस मंडी में अच्छे दाम मिलना तय है.

इसके अलावा बकरी के दूध की मांग दिनों-दिन बढ़ रही है खासकर बरसात के दिनों में जब देश के अनेक हिस्सों में मलेरिया, डेंगू , चिकनगुनिया जैसे बुखार का प्रकोप अधिक होता है. उस समय बकरी का दूध ढूंढ़े नहीं मिलता है और अनेक बकरी पालक मनमाफिक दाम पर बकरी का दूध बेचते हैं.

क्या है योजना का मकसद

मध्य प्रदेश सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग की इस योजना का खास मकसद छोटे और सीमांत किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है. इसके अलावा बकरी पालन (Goat Farming) को बढ़ावा देने के साथ-साथ बकरी नस्ल में सुधार करना भी है. इसके तहत जमुनापारी, बरबरी और सिरोही जैसी उन्नत नस्लों को बढ़ाना है. बकरी पालन की इस योजना में 10 मादा बकरियों के साथ 1 नर बकरा शामिल है.

60 फीसदी तक सब्सिडी, कमाई धमाकेदार

मध्य प्रदेश एवं पशुपालन विभाग की इस योजना में बकरी पालन इकाई की शुरुआत करने के लिए 40 फीसदी तक सब्सिडी सामान्य वर्ग के लोगों को दी जाती है, जबकि एससीएसटी वर्ग के लिए यह सब्सिडी 60 फीसदी मिलती है.

आवेदन कैसे करें

बकरी पालन की इकाई की शुरुआत करने के लिए इसकी कुल लागत 77,000 रुपए आंकी गई है. यह योजना मध्य प्रदेश के किसानों के लिए है और योजना का लाभ लेने के लिए योग्य उम्मीदवार अपने नजदीकी पशुपालन एवं डेयरी विभाग या पशु चिकित्सा संस्था से संपर्क कर के आवेदन कर सकते हैं.
यह योजना मध्य प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में भी लागू है. इसके लिए लाभार्थी अपने नजदीकी पशुपालन विभाग में संपर्क कर जानकारी ले सकते हैं.

पशु विशेषज्ञों का मानना है कि, बकरी पालन कम पूंजी और कम जगह में शुरू होने वाला ऐसा व्यवसाय है, जिससे नियमित आमदनी मिलती है. किसान परिवार इसे अपना कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं, तो दूसरी तरफ बेरोजगार युवक बकरी पालन की यूनिट लगा कर अपना रोजगार कर सकते हैं, जिसे आप आगे भी विस्तार दे सकते हैं.

Fish Farming : 90 फीसदी सब्सिडी के लिए मछुआरे तुरंत करें आवेदन

Fish Farming : मछलीपालन को नीली क्रांति का नाम भी दिया गया है. मछलीपालन का काम आज अनेक मछलीपालक बड़े पैमाने पर कर रहे हैं. बड़े पैमाने पर कारोबार करने के लिए सरकार द्वारा भी दी गई सब्सिडी इस कारोबार को कई गुना मुनाफेदार बना देती है, क्योंकि केवल 10 फीसदी रकम ही मछुआरों को अपने पास अदा करनी होती है, बाकी 90 फीसदी रकम की उसे सब्सिडी मिल जाती है. मछुआरों को नाव और जाल खरीद पर मिल रही है 90 फीसदी सब्सिडी. योजना का लाभ लेने के लिए तुरंत करें आवेदन और बनाएं अपने रोजगार को मजबूत.

नाव और जाल के लिए मिल रही 90 फीसदी सब्सिडी

मछलीपालन (Fish Farming ) के लिए नाव और मछली पकड़ने वाला जाल ही सबसे महत्वपूर्ण है और बिहार सरकार मछलीपालन से जुड़े मछुआरों को नाव और जाल के लिए 90 फीसदी सब्सिडी दे रही है. इस योजना के तहत मछुआरों को मछलीपालन से जुड़े अन्य आवश्यक उपकरण पर भी अनुदान पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं.

Fish Farming

सब्सिडी पर कैसे मिलेंगे नाव और जाल

मछलीपालन (Fish Farming) के व्यवसाय को प्रोत्साहित करने और मछुआरों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से बिहार सरकार द्वारा चलाई जा रही है. इस योजना के अंतर्गत कौन-कौन से उपकरण मिलेंगे, आइए जानते हैं-

• फिशिंग वुडन बोट पैकेज – 1,24,400 रुपए.
• फिशिंग एफआरपी (FRP) बोट पैकेज – 1,54,400 रुपए.
• कास्ट (फेंका) जाल पैकेज – 16,700 रुपए.

योजना का लाभ कैसे मिलेगा

मछलीपालन (Fish Farming ) से जुड़ी इस योजना का लाभ बिहार के मछलीपालकों को मिलेगा. यह योजना बिहार राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही है. इसके लिए प्रदेश के लाभार्थियों को https://fisheries.bihar.gov.inवेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करना होगा. आवेदन की अंतिम तिथि 31 दिसंबर निर्धारित की गई है, इसलिए आवेदन में न करें देरी, तुरंत करें आवेदन और योजना के लाभ लेकर अपने कारोबार को बनाएं अधिक लाभकारी.

आवेदन के लिए क्या कागजात जरूरी हैं

लाभार्थी आवेदन करते समय अपने बैंक खाते की पासबुक, आधार कार्ड, मत्स्यजीवी सहयोग समिति से संबंधित प्रमाण/अनुशंसा, मछलीपालन से संबंधित कार्य करने का प्रमाण, खुद का घोषणापत्र आदि की जरूरत होगी.

सरकार द्वारा मछलीपालकों के लिए चलाई जा रही यह योजना बहुत फायदेमंद है. अगर आप बिहार के निवासी हैं और मछलीपालन के व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो यह योजना आपके लिए एक शानदार अवसर है.

First Aid Box for Animals: पशुओं का करे जरूरी उपचार

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मवेशियों को किसी भी समय चोट, बीमारी या तकलीफ हो सकती है. लेकिन हर वक्त पशु अस्पताल पहुँचना संभव नहीं होता — क्योंकि न तो हर गाँव में वेटनरी हॉस्पिटल पास में होता है, न ही हमेशा डॉक्टर उपलब्ध रहते हैं.ऐसे में फर्स्ट एड बॉक्स ही काम आता है, जो आकस्मिक स्थिति में तुरंत उपचार करने में मदद करता है.

क्यों आवश्यक है फर्स्ट एड बॉक्स

पशुपालकों की आजीविका उनके मवेशियों पर निर्भर होती है. इसलिए पशुओं की सेहत और देखभाल अत्यंत महत्वपूर्ण है. मानव की तरह मवेशियों को भी छोटी-मोटी चोटें या हल्की बीमारियाँ होती रहती हैं. अगर घर में फर्स्ट एड बॉक्स मौजूद है तो किसान तुरंत उपचार कर सकता है और पशु का जीवन बचाया जा सकता है.

प्राथमिक उपचार

मवेशियों में अक्सर ये समस्याएँ देखने को मिलती हैं —
• कब्ज
• पेट फूलना
• दस्त
• घाव या चोट
• हड्डी टूटना
• सांप का काटना
• जहरीला चारा या कीटनाशक खा लेना
• लू या ठंड लगना

अगर इनका समय पर प्राथमिक उपचार (First Aid Treatment) न किया जाए, तो ये जानलेवा साबित हो सकती हैं.पशुपालकों को अपने मवेशियों की चाल, खानपान, मलमूत्र और दूध उत्पादन में बदलाव पर ध्यान देना चाहिए.

जख्म या चोट लगने पर क्या करें

• बर्फ या ठंडे पानी से चोट की सिंकाई करें.
• एंटीसेप्टिक क्रीम या टिंचर बैंजाइन लगाएँ.
• अगर घाव बड़ा या पुराना है तो तुरंत वेटनरी डॉक्टर से सलाह लें.

कब्ज या दस्त होने पर घरेलू उपचार

कब्ज होने पर:

60 ग्राम काला नमक + 60 ग्राम सादा नमक + 15 ग्राम हींग + 50 ग्राम सौंफ + 500 ग्राम गुड़ मिलाकर मवेशी को हर 2 घंटे पर दें.

दस्त होने पर:

गुड़, नमक और जौ के आटे का घोल पिलाएँ. इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होती.
इसके अलावा मांड़, छाछ और तरल पदार्थ भी दें.

बीमारी के खतरे को पहचानें

अगर मवेशी की त्वचा खींचने पर अपनी जगह पर आने में 6 सेकंड से ज़्यादा समय लेती है, तो यह डिहाइड्रेशन या गंभीर बीमारी का संकेत है. ऐसे में तुरंत डॉक्टर को बुलाएँ.

जहरीला चारा या कीटनाशक खाने पर क्या करें

यदि मवेशी ने गलती से जहरीला पदार्थ खा लिया है —

• तुरंत मुंह से पानी डालें ताकि जहर पतला हो जाए.
• नमक या पीसी सरसों का घोल बनाकर पिलाएँ, ताकि उल्टी हो सके.
• मैग्नीशियम सल्फेट (Magnesium Sulphate) पानी में घोलकर दें (बड़े मवेशी को 250 ग्राम, छोटे को 100 ग्राम) यह आंतों से जहर को बाहर निकालने में मदद करता है.

गले में कुछ अटकने पर उपचार

अगर मवेशी के गले में फल, आलू या कोई चीज़ फँस जाए —

• मवेशी बेचैन होकर लार बहाता है और निगलने की कोशिश करता है.
• गले पर हल्के हाथों से दबाव दें और सहलाएँ, ताकि वस्तु नीचे चली जाए.
• अगर सुधार न हो तो तुरंत डॉक्टर बुलाएँ.

अधिक खून बहने पर क्या करें

• खून बहने वाली जगह पर कपड़ा कसकर बाँधें.
• अगर बांधना संभव न हो, तो कपड़े को फिटकिरी के घोल में भिगोकर लगाएँ.
• यह डॉक्टर आने तक अस्थायी उपचार के रूप में असरदार होता है.

सांप काटने पर तुरंत उपचार

• डसे गए हिस्से से 4–5 इंच ऊपर डोरी कसकर बाँधें.
• नई ब्लेड से हल्का चीरा लगाकर जहर को बाहर आने दें.
• मवेशी को गरम पानी या चाय पिलाएँ ताकि उसे नींद न आए.
• जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाएँ.

लू या ठंड लगने पर देखभाल

लू लगने पर –

• मवेशी को ठंडी जगह पर रखें.
• ठंडे पानी से शरीर धोएँ और मीठा, नमकीन पानी बार-बार पिलाएँ.
• पुदीना और प्याज का अर्क लाभकारी है.

ठंड लगने पर –

• मवेशी कांपता है या नाक से पानी बहता है.
• कुनकुने पानी में गुड़ मिलाकर पिलाएँ.
• अजवायन, सेंधा नमक और अदरक गुड़ में मिलाकर दें.
• सरसों या तारपीन के तेल में कपूर मिलाकर मालिश करें.

क्या-क्या रखें फर्स्ट एड बॉक्स में

मवेशियों के फर्स्ट एड बॉक्स में जरूरी सामान रुई, फिटकिरीबांस की खपच्ची, टिंचर बैंजाइन, एंटीसेप्टिक क्रीम, नया ब्लेड, कारबोलिक एसिड, मैग्नीशियम सल्फेट, जमालगोटा, जौ का आटा, तारपीन का तेल, कपूर, मांड़ या डिटॉल / सेवलॉन, बोरिक एसिड जरुर रखें.

साथ ही नजदीकी पशु चिकित्सक का नंबर और अस्पताल का संपर्क विवरण भी बॉक्स में रखें ताकि आपातकाल में तुरंत मदद ली जा सके.

मवेशियों के लिए तैयार किया गया फर्स्ट एड बॉक्स हर पशुपालक के लिए अनिवार्य है.यह न केवल पशुओं का जीवन बचाता है, बल्कि किसान की आजीविका की सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है.थोड़ी सी सतर्कता और तैयारी से पशुपालक अपने मवेशियों को स्वस्थ और उत्पादक रख सकते हैं.

Livestock : भेड़, बकरी व खरगोशपालन तकनीकों पर सहयोग की नई पहल

Livestock : भाकृअनुप-केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर में आए अरुणाचल प्रदेश के कृषि, बागबानी, पशुपालन, मत्स्यपालन और खाद्य व उपभोक्ता कैबिनेट मंत्री गेब्रियल डी. वांगशु को उन की विभागीय टीम के साथ 14 अक्तूबर को संस्थान की उन्नत तकनीकियों व गतिविधियों की प्रदर्शनी का अवलोकन अविकानगर के निदेशक एवं वैज्ञानिकों द्वारा करवाया गया.

15 अक्तूबर को मंत्री गेब्रियल डी. वांगशु द्वारा अविकानगर के खरगोश, दुंबा, सिरोही बकरी, अविकालीन एवं अविशान सैक्टरों और ऊन प्लांट व फीड टैक्नोलौजी यूनिट पर आयोजित प्रदर्शनी के साथ पशुओं के फार्म का अविकानगर के निदेशक और संबंधित विभाग से विस्तार से चर्चा के साथ आवश्यक जानकारी लेते हुए अवलोकन किया गया.

दोपहर 12 से 1 बजे मंत्री गेब्रियल डी. वांगशु द्वारा अरुणाचल प्रदेश की वातावरण परिस्थिति, पशुधन संपदा (Livestock) एवं अपनी से अविशान, अविकालीन एवं खरगोशपालन को अरुणाचल प्रदेश में लाए जाने पर निदेशक डा. अरुण कुमार और वैज्ञानिकों की टीम से विस्तार से संवाद किया. मंत्री ने संस्थान के द्वारा किए जा रहे कार्य की प्रशंसा करते हुए अपनी ओर से संस्थान की सेवाओं को अरुणाचल प्रदेश के किसानों तक ले जाने के लिए निवेदन किया.

अविकानगर संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर द्वारा अपनी प्रेजेंटेशन में संस्थान की उपलब्ध तकनीकियों और भेड़, बकरी व खरगोशपालन (Livestock) देश के किसानों के लिए किए जा रहे प्रयासों पर मंत्री और उन की टीम को अवगत कराया और भविष्य में दोनों की ओर से अरुणाचल प्रदेश के लोगों के लिए मिल कर काम करने के लिए अपनी ओर से पूरा सहयोग करने के लिए आश्वासन दिया.

मंत्री गेब्रियल डी. वांगशु और उन की टीम को भविष्य में संस्थान के साथ मिल कर अपने राज्य के किसानों, वैटरनरी प्रोफेशनलों को प्रशिक्षण और सभी तरह के सहयोग के लिए अपनी ओर से आश्वासन दिया.

Livestockमंत्री गेब्रियल डी. वांगशु के साथ आई टीम के विभिन्न विषय के अधिकारियों द्वारा अविकानगर वैज्ञानिकों से विस्तार से चर्चा करते हुए भविष्य की कार्ययोजनाओं को ले कर संवाद हुआ. 2 दिवसीय भ्रमण कार्यक्रम का समन्वयक डा. रणजीत गोदारा, नोडल अधिकारी, नौर्थईस्ट रीजन और डा. अरविंद सोनी, कोनोडल अधिकारी द्वारा आयोजित निदेशक के मार्गदर्शन में करवाया गया.

मंत्री और उन की टीम का निदेशक अविकानगर एवं विभाग अध्यक्ष द्वारा स्वागत सम्मान किया गया. साथ में अरुणाचल प्रदेश की टीम द्वारा भी निदेशक का उन की टीम के साथ जोरदार स्वागत हुआ. इस 2 दिवसीय प्रदर्शनी, भ्रमण एवं संवाद कार्यक्रम को अविकानगर के विभाग अध्यक्ष डा. रणधीर सिंह भट्ट, डा. सिद्धार्थ सारथी मिश्रा, डा. अजय कुमार, डा. सत्यवीर सिंह डागी और समस्त अविकानगर वैज्ञानिकों द्वारा पूरे सहयोग के साथ आयोजित कराया गया.

Women Farmers Day : महिला किसान दिवस का आयोजन

Women Farmers Day : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद- राष्ट्रीय बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान में भी बड़े उत्साह से महिला किसान दिवस (Women Farmers Day) का आयोजन हुआ, जिस में निकटवर्ती गांवों की 35 महिला किसानों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. संस्थान के निदेशक, डा. ए. आनंदन ने महिला किसानों का स्वागत करते हुए बताया कि हमारे देश में कृषि एक रोजगार ही नहीं अपितु जीवन जीने का तरीका है जिस में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है. बोआई से ले कर बीज प्रसंस्करण तथा पशुपालन में एक महिला किसान का योगदान अभिन्न होता है. पर उन के कार्य के अनुरूप उन्हें पहचान नहीं मिली है. संस्थान द्वारा यह आयोजन महिला किसानों को प्रोत्साहित करने का एक प्रयास है.

प्रधान वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार सिंह ने अपने संबोधन में महिलाओं को परिवार के साथ खेत की भी रीढ़ बताया. उन्होंने महिला शिक्षा और सशक्तीकरण के बदलते परिवेश में महिला किसानों को उन के योगदान के लिए उन की भूरीभूरी प्रशंसा की.

निदेशक, डा. ए. आनंदन द्वारा महिला किसानों को गेहूं के बीज वितरित किए गए और उन्होंने महिला किसानों को खेती में अपने योगदान को बढ़ाने का आग्रह किया. वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. नंदिता बनर्जी ने महिला किसानों को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी. कार्यक्रम की समन्वयक वैज्ञानिक डा. पवित्रा वी. ने महिला किसानों के लिए लाभदायक सरकारी योजनाओं पर प्रकाश डाला. उन्होंने महिलाओं द्वारा किस प्रकार महिला स्वयंसहायता समूह बनाया जाए, इस पर विस्तार से बताया और महिला किसानों का उत्साह बढ़ाया.

वरिष्ठ तकनीशियन कुमारी निशा ने प्रसिद्ध महिला किसानों और महिला कृषक समूहों की सफलता की कहानियां साझा कीं. कार्यक्रम में संस्थान की महिला वैज्ञानिक और कार्मिक भी उपस्थित हुईं. कुमारी निशा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन दे कर महिला किसान दिवस (Women Farmers Day) कार्यक्रम का समापन हुआ.

Kisan Mela : किसान मेला में पशु प्रदर्शनी और प्रतियोगिता का आयोजन

Kisan Mela : सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ में 14 से 16 अक्तूबर, 2025 तक आयोजित अखिल भारतीय किसान मेला (Kisan Mela) एवं कृषि उद्योग प्रदर्शनी के अंतर्गत अखिल भारतीय पशु प्रदर्शनी और प्रतियोगिता का भव्य आयोजन पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय के तत्त्वावधान में किया गया. यह प्रतियोगिता 14 और 15 अक्तूबर, 2025 को 2 चरणों में पूरी हुई.

इस प्रदर्शनी में देश के विभिन्न राज्यों से कुल 119 पशुओं का पंजीकरण हुआ, जिन में 73 पशु राज्य स्तरीय और 46 पशु अखिल भारतीय स्तर की प्रतियोगिता में सम्मिलित हुए. कार्यक्रम में देशी व संकर नस्लों की गायों, सांड़ों, भैंसों और बछड़ों की विभिन्न श्रेणियों में प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं.
प्रतियोगिता के पहले दिन सौंदर्य और उपयोगिता आधारित 9 श्रेणियों में देशी और संकर नस्लों के सांड़, गाय, बछड़ी, सूखी गाय और दूध देने वाली गायों का मूल्यांकन हुआ, जबकि दूसरे दिन अन्य श्रेणियों की प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं.

प्रदर्शनी में राजा सांड़ (संजीव कुमार, बागपत), सरपंच गोयला सांड़ (मुजफ्फरनगर), बसंती गाय (बागपत), सुंदरी साहीवाल गाय और वेदिका गाय (हरियाणा) दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहीं.

Kisan Mela

विभिन्न वर्गों में चयनित विजेताओं में प्रमुख रहे

-2 बैलों की जोड़ी श्रेणी में दीपक कुमार (भूपसा, उत्तर प्रदेश) प्रथम स्थान पर रहे.

-देशी सांड़ (2-4 दांत) में दीपक कुमार ने ही पहला पुरस्कार प्राप्त किया.

-संकर सांड़ (4 दांत से ऊपर) वर्ग में हरियाणा के करमवीर सिंह प्रथम रहे.

-देशी गाय (2 दांत बछड़ी) में प्रियांशु राठी (साहीवाल नस्ल, मुजफ्फरनगर) प्रथम रहे.

-हरियाणा ड्राई (सूखी गाय) श्रेणी में अंजीत, करमबीर और मंजीत (हरियाणा) को क्रमशः प्रथम और द्वितीय स्थान प्राप्त हुए.

-देशी गाय (ड्राई) श्रेणी में आलोक मुखिया (मुजफ्फरनगर) ने साहीवाल नस्ल में प्रथम, गिर नस्ल में द्वितीय और हरियाणा नस्ल में तृतीय स्थान प्राप्त किया.

-दूध देने वाली देशी गाय में सुनील कुमार (हिसार) प्रथम और रिंकू द्वितीय स्थान पर रहे.

-संकर दूध देने वाली गाय में हरिओम (मवाना, मेरठ) प्रथम स्थान पर रहे.

भैंस वर्ग (मुर्रा और अन्य नस्लें)

-ड्राई मुर्रा भैंस श्रेणी में जितेंद्र कुमार (नैडरू, मेरठ) ने प्रथम, कपिल कुमार (औरंगनगर, रारधना, मेरठ) ने द्वितीय और हर्षित (बपर्सा, मेरठ) ने तृतीय स्थान प्राप्त किया.

-नो टीथ मुर्रा भैंस वर्ग में साहिल कश्यप प्रथम और वीरेंद्र द्वितीय स्थान पर रहे.

-नो टीथ भैंस श्रेणी में राहुल देवा (मुर्रा, मुजफ्फरनगर) प्रथम, संगीत कुमार (नीली रवि, मेरठ) द्वितीय और विजय खोक्खर (मुर्रा, बागपत) तृतीय स्थान पर रहे.

-मुर्रा सांड़ (2-4 दांत) वर्ग में नीरज (रोहतक, हरियाणा) प्रथम, यदविंदर सिंह (कर्नाल, हरियाणा) संयुक्त रूप से प्रथम, तथा प्रवीन कुमार (भिवानी) द्वितीय स्थान पर रहे.

-मुर्रा दूध देने वाली भैंस श्रेणी में जितेंद्र (हरियाणा) प्रथम एवं वीरेंद्र द्वितीय स्थान पर रहे.

-दूध देने वाली मुर्रा भैंस (अन्य नस्लें) वर्ग में प्रतीक (शामली, उत्तर प्रदेश) प्रथम, सत्यकरण (मवाना, मेरठ) द्वितीय और अजय कुमार (शामली) तृतीय स्थान पर रहे.

-मुर्रा सांड़ (4 दांत से ऊपर) वर्ग में करमवीर सिंह (कुरुक्षेत्र) प्रथम, बिजेंद्र (पानीपत) द्वितीय और अरुण (हिसार) तृतीय स्थान पर रहे, जबकि विजय खोक्खर (बागपत) और संजीव कुमार (बागपत) ने भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया.

Animal Husbandry : पशुपालन से जुड़े सामान का हुआ वितरण

Animal Husbandry : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर में 11 अक्तूबर को अनुसूचित जाति उपयोजना एवं मालपुरा परियोजना की अनुसूचित जाति उपयोजना में निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर, टोंक जिला परिषद सदस्य छोगालाल गुर्जर, कार्यक्रम समन्वयक डा. अजय कुमार, डा. पीके मलिक, डा. लीलाराम गुर्जर, डा. राजेश बिश्नोई, डा. रंगलाल मीना की उपस्थिति रही. इस में टोंक जिले के विभिन्न गांवों से आए एसी जाति के किसानों (Farmers) को उन्नत किस्म के बीज और पशुपालन (Animal Husbandry) से जुड़े जरूरी सामान का वितरण हुआ.

संस्थान निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने अपने संबोधन में सभी को संस्थान की उन्नत तकनीकियों को अपनाने की अपील करते हुए बताया कि भारत सरकार की मंशा के अनुसार संस्थान आप को कृषि और पशुपालन (Animal Husbandry) की जरूरी जानकारी व इनपुट आप तक पंहुचा रहा है, जिस से आप को वर्तमान परिवेश में नवीन तकनीकियों के समावेश से उत्पादन बढ़ा कर सीधे बाजार तक अपने उत्पादों व उस से मूल्य आधारित विभिन्न उत्पाद बना कर अपनी आजीविका बढ़ाने में मदद मिलेगी. आज हमारे शहरी क्षेत्र के लोगों में कृषि और पशुपालन (Animal Husbandry) आधारित उत्पादों की जबरदस्त मांग है, जिस को किसान सहकारी समिति के माध्यम से पूरा कर अच्छी आमदनी कमा सकते हैं.

कार्यक्रम में आए अथिति छोगालाल गुर्जर ने निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर द्वारा टोंक जिले के किसानों (Farmers) के साथ राजस्थान व अन्य राज्य के किसानों के लिए संस्थान की गतिविधियों से लाभान्वित करने के लिए धन्यवाद दिया और बताया कि डा. अरुण कुमार तोमर के कारण अविकानगर संस्थान पूरे भारत मे भेड़बकरी और खरगोशपालन की नवीन तकनीकियों के साथसाथ प्रचारप्रसार कर रहा है और भविष्य में भी क्षेत्र के सभी वर्गों के लिए इसी तरह लाभान्वित होने का निवेदन किया.

मालपुरा परियोजना के पीआई डा. पीके मलिक ने बताया कि टोंक जिले के 18 गांवों के मालपुरा भेड़ के रेवड़ रखने वाले 30 अनुसूचित जाति किसानों (27 पुरुष और 3 महिला) को निदेशक और अथिति की उपस्थिति में 500 लिटर की पीने के पानी की टंकी का वितरण किया गया.

संस्थान की अनुसूचित जाति उपयोजना के नोडल अधिकारी डा. अजय कुमार द्वारा भी बताया कि टोंक जिले के 400 अनुसूचित जाति किसानों (Farmers) को किचन गार्डन सब्जियों की किट और 19 एसी किसानों को पशुपालन (Animal Husbandry) से जुड़े जरूरी सामान (फीडिंग ट्रॉफ, मिनरल्स मिक्सचर ईंट, टौर्च, स्टील बालटी और पानी की बोतल आदि) का वितरण भी निदेशक की उपस्थिति में किया गया.

अविकानगर के मीडिया प्रभारी डा. अमर सिंह मीना ने इस सारे वितरण कार्यक्रम की जानकारी दी.

Veterinary Pathology : वेटनरी पैथोलौजी बचाए मवेशियों की जान

Veterinary Pathology : तमाम बीमारियों का पता लगाने के लिए पैथोलौजी जांच केवल इनसानों के लिए ही नहीं मवेशियों के लिए भी जरूरी है. वेटनरी पैथोलौजी (Veterinary Pathology) के जरीए मवेशियों की जान और किसानों की मेहनत की कमाई को बचाया जा सकता है.

पशुधन के नुकसान की सब से बड़ी वजह यह है कि किसानों और पशु पालकों को वेटनरी पैथोलौजी (Veterinary Pathology) के बारे में जरा भी जानकारी नहीं होती है, या फिर वे इस की जरूरत ही नहीं समझते हैं. मवेशियों के बीमार पड़ने या बीमारियों के लक्षण नजर आने पर पशु पालक घरेलू इलाजों में ही उलझे रह जाते हैं, जिस से मवेशी की तबीयत काफी बिगड़ जाती है.

पटना के नजदीक परसा बाजार गांव में डेरी का धंधा करने वाले मदन यादव कहते हैं कि जब कभी भी किसी मवेशी की चालढाल या खानपान वगैरह में बदलाव नजर आए, तो तुरंत ही डाक्टरों से उस की जांच करानी चाहिए. बीमारी के बढ़ने पर डाक्टरों को इलाज करने में परेशानी होती है और मवेशियों की जान जाने का खतरा भी बढ़ जाता है.

मदन ने बताया कि घरेलू इलाज के चक्कर में 7 साल पहले उस की 7 गायों की मौत हो गई थी, जिस से करीब 3 लाख रुपए का नुकसान हुआ था.

मवेशियों के डाक्टर सुरेंद्र नाथ कहते हैं कि पशुओं के लिए वेटनरी पैथोलौजी (Veterinary Pathology) समय की मांग है. इस से पशुधन को बचाने में मदद मिलती है. पशुधन की बरबादी के पीछे सब से बड़ी वजह घरेलू इलाज और झोलाछाप मवेशी डाक्टर ही हैं. वेटनरी पैथोलौजी बेजबान मवेशियों के दर्द और तकलीफ का पता लगाने का कारगर तरीका है. इस से समान लक्षण वाली बीमारियों में फर्क का पता चलता है और मवेशी का सही इलाज हो सकता है. सब से बड़ी बात यह है कि इस से पशुओं के इलाज पर पैसों की बरबादी नहीं होती है.

वेटनरी पैथोलौजी (Veterinary Pathology) के जरीए मवेशियों के मल, मूत्र, खून, ब्लड सीरम, दूध व लार वगैरह की जांच कर के वेटनरी डाक्टर आसानी से उन का सही इलाज कर सकते हैं. यह बात सभी पशु पालकों और किसानों को समझ लेनी चाहिए.

Veterinary Pathology

मवेशियों की पैथोलौजी जांच क्यों?

* मवेशियों के मल, मूत्र, दूध वगैरह का रंग कई बीमारियों में लाल या पीला हो जाता है. पैथोलौजी जांच से सही बीमारी का पता लगाया जा सकता है.

* अलगअलग इलाकों में अलगअलग जानवरों की बीमारियों के कीड़े पाए जाते हैं, जिन का असर भी मवेशियों पर अलगअलग होता है.

* बहुत सी बीमारियों के लक्षण जल्दी पता नहीं लगते हैं.

* गर्भ रोगों के लिए वेटनरी पैथोलौजी काफी जरूरी है. इस से बीमारियों के जीवाणु, विषाणु और फफूंदियों का आसानी से पता लगाया जा सकता है.

* पशु के सीरम में पोषक तत्त्वों के कम या ज्यादा होने की जानकारी ले कर खानपान में सुधार किया जा सकता है. अकसर होने वाले थनैला रोग में हर जानवर को एक ही दवा फायदा नहीं करती है, लिहाजा वेटनरी पैथोलौजी (Veterinary Pathology) में जांच कराने के बाद डाक्टर सही दवा तय कर पाते हैं.

Gaddi Breed of Sheep : लुप्त हो रही नस्ल – मिलेगा संरक्षण

Gaddi Breed of Sheep : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थान केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर के उत्तरी शीतोष्ण क्षेत्रीय केंद्र गड्सा, जिला कुल्लू, हिमाचल प्रदेश ने हिमाचल प्रदेश में गद्दी नस्ल की भेड़ लुप्त हो रही हैं, इसलिए गद्दी भेड़ की नस्ल के संरक्षण के लिए उन को नैटवर्क प्रोजैक्ट औन शीप इंप्रूवमैंट में निदेशक डा. अरुण कुमार के प्रयास से शामिल कर वैज्ञानिक शोध कार्य शुरू किए हैं.

निदेशक डा. अरुण कुमार ने बताया कि हिमाचल प्रदेश की गद्दी भेड़ (Gaddi Breed of Sheep) जो पहले राज्य के बहुत से जिलों में पाई जाती थी, वर्तमान में इस की आबादी बहुत ही कम हो गई है और सिमट कर कुछ ही इलाकों में रह गई है, के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए और इस के उत्पादन में सुधार करने के लिए अविकानगर संस्थान ने इस की भेड़पालन इकाई की स्थापना अपने क्षेत्रीय केंद्र गडसा पर निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर के मार्गदर्शन और अथक प्रयास में नैटवर्क प्रोजैक्ट के अंतर्गत शुरू की गई है.

क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी डा. आर. पुरुषोत्तम ने बताया कि हिमाचल प्रदेश की गद्दी भेड़ (Gaddi Breed of Sheep) ठंडे और पहाड़ी पर्वतीय इलाकों के वातावरण में पालन हेतु उपयुक्त है, जो विषम परिस्थिति और ठंडी जलवायु में भी अपनी उत्तरजीविता के साथ उत्पादन को बनाए रखती है. वर्तमान में विभिन्न विदेशी भेड़ मेरिनो आदि के क्रॉस के कारण गद्दी भेड़ की आबादी दिन ब दिन घटती जा रही है, जिस को वर्तमान मे संरक्षण एवं आनुवांशिक सुधार के लिए ध्यान देने की सख्त आवश्यकता है.

अविकानगर के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर के मार्गदर्शन एवं नेतृत्व में क्षेत्रीय केंद्र के वैज्ञानिक डा. अब्दुल रहीम चौधरी, डा. रजनी चौधरी, डा. पल्लवी चौहान द्वारा गद्दी भेड़ (Gaddi Breed of Sheep) की नस्ल पर पिछले 2-3 सालों से राज्य के अलगअलग जिले के किसानों के द्वारा सर्वे किया जा रहा है. उन्होंने पाया कि चंबा जिले के पांगी घाटी में इस नस्ल के शुद्ध पशु पाए गए हैं. वहां से क्षेत्रीय केंद्र मे चल रही डीबीटी परियोजना मे 80 गद्दी भेड़ के पशु खरीद कर केंद्र पर लाए गए हैं, जिन में निदेशक के मार्गदर्शन में गद्दी भेड़ पर नस्ल सुधार नैटवर्क प्रोजैक्ट के तहत गद्दी भेड़ के संरक्षण, आनुवांशिक सुधार एवं विभिन्न पहलुओं पर कार्य किया जाएगा और इस से जुड़े किसानों को इस सुधार का फायदा पहुंचाया जाएगा. साथ में गद्दी भेड़ के पालन से जुड़े किसानों को सीधे संस्थान की इकाई से जोड़ कर आनुवांशिक सुधार के साथ विभिन्न वैज्ञानिक पालन पर सलाह भी केंद्र के वैज्ञानिकों की टीम द्वारा दी जाएगी.